3 सितंबर 2025
बाढ़, बादल फटने और भूस्खलन के चलते तबाही झेल रहे पंजाब, जम्मू कश्मीर, हिमालय प्रदेश और उत्तराखंड के लोगों के साथ भाकपा (माले) एकजुटता जाहिर करती है और संकट की इस घड़ी में पार्टी उनके साथ है. हम उन सबके प्रति अपनी संवेदना प्रकट करते हैं, जिन्हों अपने करीबियों को खो दिया और उनकी पीड़ा में भागीदार हैं, जिनके घर,खेत और आजीविका, इस आपदा में नष्ट हो गए.
पंजाब पिछले चार दशक की सर्वाधिक भीषण बाढ़ झेल रहा है, जिससे सभी 23 जिले प्रभावित हैं. 1000 हजार से ज्यादा गांव बाढ़ग्रस्त हैं और 61000 हेक्टेयर खेती की जमीन डूबी हुई हैं, जिससे 14 लाख वाशिंदे प्रभावित हैं. लंबे समय भारत की खाद्य सुरक्षा का केंद्र रहे राज्य में इस तबाही ने आने वाले समय में संभावित खाद्य वस्तुओं की कमी, आपूर्ति श्रृंखला के बाधित होने और कीमतों के बढ़ने, जैसी आशंकाओं को जन्म दिया है, जिससे सिर्फ उसी हालत में बचा जा सकता, जबकि तत्काल राहत और पुनर्वास के उपाय किये जाएं.
यह त्रासदी उत्तराखंड के धराली में हुई उस तबाही के कुछ दिन बाद आई है, जिसने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की अत्याधिक संवेदनशीलता को प्रकट किया. जम्मू की तवी नदी में बाढ़, किश्तवाड़ में बादल फटने की घटना और पूरे हिमाचल प्रदेश व अन्य हिमालयी राज्यों में भारी तबाही पुनः याद दिला रही है कि यह क्षेत्र कितना नाजुक और संकट ग्रस्त हो गया है. ये बार-बार आने वाली आपदाएं उस खतरे की ओर इंगित कर रही हैं, जो अवैज्ञानिक तरीके से सड़कें काटने, विनाशकारी निर्माण, संसाधन लूटता अनियंत्रित माफिया, पहाड़ों को अस्थिर करती बड़ी परियोजनाओं के चलते असंख्य जिंदगियों को खतरे में डालने वाला सिद्ध हो रहा है. सैकड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले जोशीमठ भूधंसाव ने पहले ही हिमालय में बेलगाम अवैज्ञानिक परियोजनाओं के के दुष्परिणामों को लेकर चेता दिया था.
जलवायु संकट ने इन खतरों को और गंभीर बना दिया है. बढ़ता वैश्विक तापमान, भयानक रूप से हिमालयी ग्लेशियरों को पिघला रहा है जिससे अस्थिर ग्लेशियल झीलें बन रही हैं. अप्रत्याशित मॉनसून और भारी बारिश, अचानक आने वाली बाढ़ (फ्लैश फ्लड) व बादल फटने की मारक घटनाओं को जन्म दे रहे हैं. केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट है कि उसकी निगरानी वाली 100 में से 34 ग्लेशियल झीलों के जल फैलाव क्षेत्र में वृद्धि हो रही है, जिससे ग्लेशियल झीलों के फूटने से पैदा होने वाली बाढ़ की आशंका गहराती जा रही है. बेतरतीब विकास से पैदा हुए खतरों को जलवायु परिवर्तन कई गुना बढ़ा रहा है, जिसकी भारी कीमत पर्वतीय समुदायों को चुकानी पड़ रही है.
जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियल बाढ़ों और अवैज्ञानिक ढांचागत परियोजनाओं के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एक उच्च स्तरीय वैज्ञानिक आयोग बनाया जाना चाहिए, जो बिगड़े हालत को दुरुस्त करने और सतत या टिकाऊ योजनाओं के लिए जरूरी उपायों की संस्तुति करे. जब तक पूरी तरह रास्ते को बदला नहीं जायेगा, तब तक आपदाओं की तीव्रता बढ़ेगी ही. हिमालय में विकास- विज्ञान, पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों के जीवन के अनुकूल होना चाहिए ना कि कॉरपोरेट लालच और विध्वंसकारी माफियाओं के अनुसार.
भाकपा (माले) मांग करती है कि भारत सरकार, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की स्थितियों को राष्ट्रीय आपदा घोषित करे, तत्काल राहत व पुनर्वास सुनिश्चित करे और एक समग्र आपदा राहत पैकेज की घोषणा करे. पंजाब के लिए विशेष बाढ़ राहत पैकेज की भी घोषणा हो, जिसमें फसलों के नुकसान के लिए तत्काल राहत, प्रभावित परिवारों का पुनर्वास, कृषि भूमि को पूर्ववर्ती स्थिति में लाना और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में राज्य के महत्वपूर्ण योगदान को सुरक्षित करना शामिल हो.
केंद्रीय कमेटी, भाकपा (माले) लिबरेशन