वर्ष 35 / अंक - 39 / महिलाओं पर बढ़ती हिंसा व यौन हमले का स्रोत है भाजपा...

महिलाओं पर बढ़ती हिंसा व यौन हमले का स्रोत है भाजपा का मनुवाद

महिलाओं पर बढ़ती हिंसा व यौन हमले का स्रोत है भाजपा का मनुवाद

19 सितंबर की शाम बिहार के जमुई जिले में एक स्कूली छात्रा और उसका दोस्त शाम को जमुई से कुछ दूर स्थित मड़वा पहाड़ पर रील और वीडियो बनाने पहुंचे. वहां से जब वे स्कूटी से लौट रहे थे तो बीच सड़क पर 10-12 लम्पट लड़कों के झुंड ने उन्हें घेर लिया. दोनों एक साथ क्यों घूम रहे हैं, इस पर हंगामा करते हुए उनके साथ मारपीट और छेड़खानी किया. एक गुंडे द्वारा लड़की को उठाकर ले जाने की कोशिश हुई और उसके प्राइवेट पार्ट्स पर हमला किया गया.

24 सितंबर को एक दूसरी घटना सामने आई जिसमें समस्तीपुर के कर्पूरीग्राम थाना क्षेत्र में जगतसिंह बांध पर जब एक लड़का और लड़की कहीं जा रहे थे तब कुछ लड़कों द्वारा उन्हें रोका गया. गाली-गलौज करते हुए लड़की के साथ बदसलूकी की गई, उस पर यौन हमला किया गया.

21 सितंबर को दरभंगा में बाइक सवार दो लड़कों ने स्कूल जा रही एक लड़की का दुपट्टा खींचने और उससे बदतमीजी करने की कोशिश की.

23 सितंबर को मुजफ्फरपुर में पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही 22 वर्षीय लड़की ने आरोप लगाया कि एक व्यक्ति 15-20 दिनों से उसका पीछा कर रहा था. लड़की द्वारा उसे नजर अंदाज करने और ना कहने पर उस गुंडे ने बलात्कार और हत्या की धमकी दी और लड़की के घर में घुसकर हमला किया.

23 सितंबर को ही मुजफ्फरपुर में एक अन्य मामले में तीन नाबालिग बहनों को बार-बार परेशान करने और उनमें से एक को जबरन उठा ले जाने का विरोध करने पर मारपीट करने और उसके साथ बदतमीजी करने की कोशिश हुई.

6 दिनों के भीतर दर्ज हुई ये पांच घटनाएं इसलिए चर्चा में आईं कि इनका वीडियो वायरल हुआ, अन्यथा कितनी ही घटनाएं गुमनाम रह जाती हैं. इन घटनाओं का पैटर्न समझिए. – ये सभी कम उम्र लड़कियां हैं. अधिकांश मामलों में किसी लड़के-लड़की को एक साथ देखकर रोका गया और पूछताछ करने के बहाने हिंसा, यौन हमला व बदतमीजी की गई.

यहां हम सिर्फ जमुई की घटना के संदर्भ में ही बात करें तो यह किसी लड़की पर सिर्फ यौन हमला नहीं है. बल्कि यह किसी लड़की की आवाजाही और उसके निजी संबंधों पर सामाजिक नियंत्रण को सही ठहराने वाली सोच से फायदा उठाने का मामला है अन्यथा सार्वजनिक स्थान पर किसी लड़की को घेरने की हिम्मत उन लड़कों को नहीं होती. समाज और कानून का डर उन्हें नहीं था. वे इत्मिनान थे कि समाज और प्रशासन उनकी कार्रवाई पर सवाल नहीं उठायेगा.

इस मामले में एफआइआर भी तब दर्ज हुआ जब अपराधियों ने ही घटना का वीडियो वायरल किया. वीडियो के सामने आने के बाद आम लोगों में गुस्सा भड़का. पीड़ित छात्रा के पक्ष में जनसमर्थन से परिवार के लोग सामने आए और एफआइआर दर्ज करवाया अन्यथा यह मामला दब जाता. वीडियो वायरल नहीं होता तो बहुत संभव था कि परिवार “इज्जत बचाने के लिए” चुप रह जाता. लड़की किसी को कुछ बता नहीं पाती और आतंक, घुटन व दर्द अकेली झेलती रहती.



बिहार में महिलाओं पर लगातार हो रहे यौन हमले, बलात्कार और हिंसा की घटनाओं ने सरकार और पुलिस की भूमिका को कठघरे में खड़ा कर दिया है. हर दिन सामने आ रही ये घटनाएं दिखा रही हैं कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का महिलाओं की सुरक्षा के प्रति क्या रवैया है और नाबालिगों, लड़कियों की सुरक्षा के लिए जीरो टाॅलरेंस और अभया ब्रिगेड, स्कूटी वाली पुलिस दीदी से लेकर अन्य तमाम घोषणाओं का क्या हश्र है.

हमें यह भी समझना होगा कि इन घटनाओं में लगातार वृद्धि के पीछे कानून व्यवस्था की विफलता के साथ ही साथ भाजपा द्वारा नैतिक पहरेदारों को बढ़ावा देने की राजनीति भी है. इन घटनाओं पर खास तौर पर जमुई की घटना पर सत्ता में बैठे लोगों की जो प्रतिक्रियाएं सामने आईं उसमें सबसे महत्वपूर्ण है श्रेयसी सिंह का बयान जिन्होंने एक टीवी चैनल से बात करते हुए कहा ‘मोरल पोलिसिंग सभ्य और शालीन तरीके से की जानी चाहिए लेकिन लड़के-लड़की के साथ जो बदतमीजी और मारपीट हुई वह स्वीकार्य नहीं है’. जमुई की विधायक और मंत्री श्रेयसी सिंह कोई सामान्य घरेलू महिला नहीं हैं. वह एक चर्चित खिलाड़ी रही हैं और वर्तमान में भाजपा की तेज तर्रार युवा चेहरा हैं. जब वह नैतिक पहरेदारी की, औरतों को कंट्रोल करने की वकालत कर रही हैं तो मामला और भी गंभीर बन जाता है.

नैतिक पहरेदारी की संस्कृति को आरएसएस लंबे समय से पाल पोस रहा है. भाजपा-आरएसएस के क्रमशः ताकतवर होने और सरकार में दबदबा बढ़ने के साथ इस संस्कृति के रक्षक क्रमशः मजबूत होते गए हैं.

कुछ वर्ष पहले तक वैलेंटाइन डे पर पार्क में बैठे या घूमते जोड़ों को शर्मिंदा करने, पकड़ कर पीटने का काम घोषित रूप से बजरंग दल या बीजेपी से जुड़े युवा संगठन के लोग करते रहे हैं. इन संगठनों की इस गुंडागर्दी को भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर जायज ठहराया जाता रहा है. ये लड़के बड़े गर्व से यह गुंडागर्दी करते थे या अभी भी करते हैं. क्योंकि माना जाता है कि किसी लड़की को अपने भाई, पिता या अन्य पुरुष रिश्तेदार के साथ ही घर से बाहर निकलना चाहिए और जो ऐसा नहीं करती, जो अपनी पसंद या मर्जी से किसी पुरुष के साथ पार्क में, पब में या रेस्टोरेंट में बैठी हो या कहीं आ-जा रही हो वह ‘पश्चिमी संस्कृति’ के प्रभाव में है, वे बिगड़ी हुई औरतें हैं और बुरी, बिगड़ी औरतों को सबक सिखाने के लिए डंडे का प्रयोग या उन्हें अपमानित करना नैतिक पहरेदारों का नैतिक अधिकार है और नैतिक पहरेदारी ‘भारतीय संस्कृति’ की रक्षा के लिए जरूरी है.

फिर हमने देखा कि भाजपा की प्रत्यक्ष सरकारें बनीं. पुलिस प्रशासन का नियंत्रण सीधे उनके हाथ में आया और इन नैतिक पहरेदारों को आरएसएस की विचारधारा के साथ-साथ कानूनी संस्थाओं का भी संरक्षण और सहयोग मिलने लगा. उदाहरण के रूप में मोदी जी के चुनाव क्षेत्र में उनका मीडिया सेल संभालने वाले तीन लड़कों द्वारा बीएचयू की एक छात्रा जो शाम के वक्त कैंपस में घूम रही थी, को पकड़ कर उसके साथ हिंसा और तमाम तरह की यौन बदतमीजियां की गईं और वीडियो बनाया गया. इन अपराधियों को उत्तर प्रदेश सरकार का पूरा प्रश्रय मिला. हालांकि बीएचयू के छात्रों के आंदोलन के दबाव में अपराधी गिरफ्तार हुए लेकिन कुछ ही दिनों में उन्हें जमानत मिल गई और बाहर निकलने पर उनका धूमधड़ाके से स्वागत हुआ.

इस घटना से दोनों पक्षों के लिए संदेश स्पष्ट था – लड़कियों को शाम के वक्त अकेले या फिर मित्र के साथ नहीं घूमना चाहिए और ऐसी लड़कियों को सबक सिखाने वाले अपराधियों का मनोबल बढ़ाया जाना चाहिए.

भारतीय संस्कृति के नाम पर भाजपा-आरएसएस जिस संस्कृति और परंपरा की बात करते हैं, उसका स्रोत है मनुस्मृति जिसमें परिवार के पुरुषों को निर्देश देते हुए साफ-साफ कहा गया है कि औरत को कभी भी स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाना चाहिए और स्त्री को निर्देश दिया गया है कि बालिका, युवा, वृद्धा वह कोई भी हो उसे घर के भीतर भी कोई कार्य अपनी मर्जी से नहीं करना चाहिए. स्त्रियों को उनके पुरुषों द्वारा दिन-रात स्वतंत्रता से रहित रखना चाहिए, नियंत्रण में रखना चाहिए अन्यथा वे विषय भोगों में आसक्त हो सकती हैं.

कुछ लोग मनुस्मृति की इस व्यवस्था से इंकार करते हुए भी औरतों को कंट्रोल करने की वकालत उनकी सुरक्षा के नाम पर करते हैं. लेकिन, वास्तविक सुरक्षा औरतों पर पाबंदी लगा कर नहीं हो सकती, बल्कि बिना पाबंदी स्त्री के जीने के अधिकार की स्वीकृति से ही वह सुरक्षित हो सकती है. आज स्थितियां बदल रही हैं. पढ़ना और रोजगार करना अब महिलाओं की स्वायत्तता के लिए जरूरी तो है ही, यह परिवारों की आर्थिक-सामाजिक जरूरत भी बनती जा रही है. जाहिर है इससे सार्वजनिक स्थानों पर औरतों की दखल लगातार बढ़ रही है. सार्वजनिक जीवन में औरतों की दखल जीतनी बढ़ेगी, पितृसत्ता का उनपर नियंत्रण उतना ही कमजोर पड़ेगा. पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर लड़कियां हर दिन चोट कर रही हैं और इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बचाने के लिए संस्कृति के ठेकेदारों को पूरा जोर लगाना पड़ रहा है.

जमुई मामले में इन लंपट लड़कों का मनोबल बढ़ाने वाले अन्य कारण भी हैं. यह गिरोह बालू की तस्करी में लगा हुआ है. गिरोह के मुखिया का भाजपा के बड़े नेताओं से निकटता है. भाजपा के एक केन्द्रीय मंत्री उसके रिश्तेदार हैं. इसलिए ये गुंडे जानते हैं कि पुलिस और सरकारी तंत्र उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. स्वतंत्र भारद्वाज की हाल में हुई गिरफ्तारी और तुरंत जमानत जैसी घटनाएं उनका मनोबल बढ़ाने के लिए पहले से मौजूद हैं.

स्वेछा से जीवन जीने का अधिकार और सार्वजनिक स्थानों पर बिना भय महिलाओं की उपस्थिति की गारंटी वाली सुरक्षा व कानून व्यवस्था के जरिए ही महिलाओं की वास्तविक सुरक्षा हो सकती है. लेकिन, भाजपा के रहते संभव यह नहीं है. भाजपा न केवल महिलाओं की सुरक्षा पर हमला करने वाले अपराधियों की जमात है बल्कि हर दिन ऐसे अपराधियों को पैदा करने वाली फैक्ट्री बन गई है. इसलिए भाजपा-आरएसएस की सरकार और उसकी विचारधारा दोनों के खिलाफ लड़ना जरूरी है.


26 September, 2026