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2026 का आह्वान : नफरत और अन्याय के अपराधियों के लिए कोई माफी नहीं

2026 का आह्वान : नफरत और अन्याय के अपराधियों के लिए कोई माफी नहीं

क्रिसमस से लेकर नए साल के दिन तक का समय दुनिया भर में हंसी-खुशी का जश्न-भरा मौसम होता है. लेकिन मोदी के जमाने में लगता है कि नफरत ही फासिस्ट ब्रिगेड के लिए हर मौसम का सबसे बड़ा जश्न या खेल बन गया है. महज सांता क्लाउज का चिन्ह ही स्वघोषित हिंदुत्ववादी योद्धाओं की ‘भावना को आहत’ करने और उन्हें तोड़-फोड़ व हिंसा के लिए उकसाने लगता है. जहां हिंदुत्ववादी ग्रुपों ने क्रिसमस की सजावटों और उत्सवों को अपना निशाना बनाया, वहीं भाजपा-शासित राज्यों में सरकारों ने भी क्रिसमस की छुट्टियों को रद्द करके अपना एजेंडा आगे बढ़ा दिया है. ईसाइयों पर इस सर्व-व्यापी हमले के माहौल में प्रधान मंत्री मोदी ने यह दिखाने का प्रयास किया कि सब कुछ तो ठीकठाक ही है – वे नई दिल्ली में रिडेंपशन कैथेड्रल चर्च गए, लेकिन उन्होंने अपने समर्थकों की ईसाई-विरोधी मुहिम की कोई भर्त्सना नहीं की. इसमें हैरत नहीं कि क्रिसमस की सजावटों की तोड़फोड़ करने वाले बजरंग दल के सदस्यों को न केवल जमानत पर रिहा कर दिया गया, बल्कि उनकी रिहाई पर वीर नायकों की तरह उनका स्वागत भी किया गया.

ईसाइयों पर हमले तो ज्यादातर क्रिसमस के दौरान दिखे, लेकिन मुस्लिमों पर हमले तो भारत के बड़े हिस्से में रोजाना का मामला बन गया है. बंगला-भाषी मुस्लिम प्रवासी मजदूर खुद को बिल्कुल असहाय स्थिति में पाते हैं, क्योंकि भीड़ हत्या अब सर्व-भारतीय परिघटना बन चुकी है. हाल के सप्ताहों में भाजपा-शासित ओडिशा राज्य में ऐसे अनेक मामले देखने को मिले हैं. खास चिंता की बात यह है कि केरल में छत्तीसगढ़ के एक प्रवासी मजदूर को बंगलादेशी होने के संदेह में पीट-पीटकर मार डाला गया. बजरंग दल के सदस्यों ने एक रेस्तरां में बरेली की एक युवती की जन्मदिन पार्टी पर हमला कर दिया, महज इसलिए क्योंकि जिन अतिथियों को उसने आमंत्रित किया था उनमें उसके दो मुस्लिम दोस्त भी शामिल थे. संघ-भाजपा प्रतिष्ठान द्वारा प्रोत्साहित बहुलतावादी उद्दंडता और नफरत-भरा आक्रामक हिंदुत्व आज देश के अंदर नस्लवादी हमले भी भड़काने लगा है.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में नस्लवादी दुर्व्यव्यहार के खिलाफ प्रतिवाद करने के लिए त्रिपुरा के एक एमबीए छात्र एंजेल चकमा की हत्या ने एक बार फिर भारत में नस्लवाद के मुद्दे को सामने खड़ा कर दिया है. पूर्वोत्तर भारत के लोगों को काफी पहले से नस्लवादी अपमान और हमले का शिकार बनाया जाता रहा है, और अब मोदी के ‘न्यू इंडिया’ युग में नस्लवादी बदसलूकी के खिलाफ प्रतिवाद के लिए उन्हें भीड़ हत्या का भी सामना करना पड़ रहा है. एंजेल चकमा की ‘मृत्यु’ की भर्त्सना करने की जिम्मेदारी मोदी के कैबिनेट मंत्री अरुणाचल निवासी किरण रिजिजू पर डाल दी गई; जबकि उत्तराखंड के मुख्य मंत्री पुष्कर धामी ने अपनी सरकार को निर्दोष साबित करने के व्यर्थ प्रयास में एंजेल चकमा के पिता तरुण चकमा, जो मणिपुर में बीएसएफ के जवान हैं, को काफी देर से फोन किया और फिर उस कॉल को जन संपर्क विभाग के हवाले कर दिया. गौरतलब बात यह है कि एफआइआर दर्ज कराने में कई दिन गंवा दिए गए और उत्तराखंड सरकार व पुलिस नस्लवादी नफरत के उस नजरिये को ही दबा देने में मशगूल हैं जिसकी वजह से यह हत्या हुई है.

सामाजिक जीवन में लगातार जारी नफरत से लेकर राष्ट्रीय राजधानी में दमघोंटू हवा के वातावरण और मध्य प्रदेश के इंदौर में, जो सरकारी रेकॉर्ड में भारत का ‘सबसे साफ-सुथरा’ शहर माना जाता है, अब तक कम से कम 10 लोगों की जान लेने वाले सरकारी सप्लाई के दूषित जल तक – ये सब निस्संदेह भारत के राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र से आती सड़ांध के चिन्ह हैं. यह सड़ांध तब और भी गहरी हो जाती है जब न्यायपालिका – जिस पर न्याय के संवैधानिक उसूलों और कानून के राज की गारंटी करने की जिम्मेदारी है – नफरत, लूट, अन्याय और हिंसा के अपराधियों को अभयदान देने लग जाती है. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश, जिससे अरावली पर्वत शृंखला के बड़े हिस्से को रियल इस्टेट (जमीन खरीद-बिक्री) कारोबार में बदल देने का रास्ता खुल जाता, और बलात्कार व हत्या के अभियुक्त भाजपा नेता कुलदीप सिंह सेंगर को दी गई सजा पर स्थगन लगाने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले ने स्वाभाविक तौर पर न्याय की प्रणाली पर से ही लोगों का भरोसा हिला दिया है.

अरावली को बचाने और पूर्व के कुख्यात उन्नाव विधायक को दी गई राहत को रद्द कराने के लिए प्रतिवाद शुरू हो गए हैं. एक बार तो सर्वोच्च न्यायालय ने सड़कों पर उतरे लोगों की आवाज पर काफी जल्द और सकारात्मक जवाब दिया. अरावली आदेश को निरस्त कर दिया गया है और मामले को विशेषज्ञ समिति के पास भेज दिया गया, जबकि उच्च न्यायालय द्वारा कुलदीप सिंह सेंगर को दी गई राहत भी स्थगित कर दी गई है. इन दो मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय के सुधारात्मक कदमों से 2026 के महत्वपूर्ण वर्ष में स्वतंत्र भारत के संकटापन्न लोकतंत्र के लिए और ठगी गई जनता के मन में उम्मीद जगी है. इसीलिए जनता की सावधानी और सक्रियता निश्चय ही बरकरार रहनी चाहिए, ताकि फासीवादी हमलों के सामने प्रतिरोध की मजबूत दीवार खड़ी की जा सके.

10 January, 2026