2025 का साल अब ढलान पर है और इसके साथ ही भारत में संगठित कम्युनिस्ट आंदोलन अपनी शताब्दी पूरी कर रहा है. दिलचस्प यह है कि विचारधारा के दूसरे छोर पर खड़ा धुर-दक्षिणपंथी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी इसी साल 1 अक्टूबर को अपनी शताब्दी मना चुका है. यह संयोग स्वाभाविक रूप से एक सवाल खड़ा करता है : आखिर ऐसा क्या हुआ कि आज कम्युनिस्ट चुनावी राजनीति में हाशिये पर हैं, जबकि संघ सत्ता की चोटी पर पहुंच गया है? अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो पिछले सौ सालों के बड़े हिस्से में – खासकर शुरुआती 50 वर्षों तक – तस्वीर इसके बिल्कुल उलट थी. उस दौर में जहां संघ काफी हद तक अलग-थलग था, वहीं कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी राजनीति में एक स्पष्ट और महत्वपूर्ण उपस्थिति रखता था.
दोनों की ये दिशाएं बिल्कुल अलग भी हो सकती थीं. कम्युनिस्ट आंदोलन ने कई अहम मौके या तो गंवा दिए या उन्हें ठीक से नहीं संभाला, जबकि पिछले कुछ दशकों में घटनाओं के मोड़ से आरएसएस को जबरदस्त फायदा पहुंचा. जब तक कांग्रेस राजनीतिक मैदान में हावी रही, तब एक दौर ऐसा भी था जब वामपंथी और दक्षिणपंथी विपक्ष – दोनों – देश के अलग-अलग हिस्सों में साथ-साथ बढ़े. लेकिन खेल तब बिगड़ा जब लगभग पूरे नीतिगत स्पेक्ट्रम में दक्षिणपंथ की ओर झुकाव बढ़ता गया और कांग्रेस ने संघ परिवार की आक्रामकता के आगे घुटने टेक दिए. नतीजा सबके सामने है – 2014 के बाद से देश में भाजपा का लगभग एकछत्र राज कायम हो गया, जबकि कम्युनिस्ट आंदोलन की गति थम गई.
इतिहास के पन्ने पलटने पर हमें अनुभवों और सबकों का बड़ा खजाना मिलता है. लेकिन आज कम्युनिस्टों के सामने असली चुनौती यह है कि वे इन ऐतिहासिक सबकों का असरदार ढंग से उपयोग कर मौजूदा आंदोलन को आगे बढ़ाएं. दुनिया के कई पूर्व उपनिवेशों की तरह, भारत में भी कम्युनिस्ट आंदोलन औपनिवेशिक-विरोधी एक शक्तिशाली धारा के रूप में उभरा था. औपनिवेशिक शासन से आजादी के उस महा-संग्राम के व्यापक एजेंडे के भीतर, कम्युनिस्टों ने गणतंत्र के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक चरित्र के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता से एक अलग पहचान भी बनाई. साथ ही, सामंती व्यवस्था और जमींदारी प्रथा को जड़ से मिटाने, मजदूरों को उनके हक दिलाने और समाज को प्रगति के रास्ते पर ले जाने के लिए संघर्ष किया.
आजादी के आंदोलन की कोख से निकले भारतीय संविधान ने व्यापक रूप से इसी दिशा को बरकरार रखा. लेकिन जब देश इस नए संवैधानिक ढांचे को अपना रहा था, तब आरएसएस इसका खुला विरोध कर रहा था. हिंदुत्ववादी आतंकवादी द्वारा गांधीजी की हत्या के बाद, देश की आजादी की रक्षा के लिए पहले गृह मंत्री सरदार पटेल के पास आरएसएस पर पाबंदी लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. पटेल ने अपने संक्षिप्त बयान में दो-टूक कहा कि आरएसएस द्वारा फैलाए गए नफरत और हिंसा के माहौल ने ही गांधीजी की हत्या की जमीन तैयार की थी. उन्होंने इस संगठन को देश की आजादी के लिए खतरा करार दिया. बाद में, जब आरएसएस ने लिखित रूप में भरोसा दिया कि वह संविधान और तिरंगे को स्वीकार करेगी, तभी उसे एक ‘सांस्कृतिक संगठन’ के तौर पर काम करने की इजाजत मिली.
आज भारत सरकार आरएसएस को दुनिया का सबसे बड़ा ‘एनजीओ’ बताकर महिमामंडन कर रही है. उसकी शताब्दी मनाने के लिए सरकारी खजाने से सिक्के और डाक टिकट जारी किए जा रहे हैं. सच तो यह है कि भाजपा सरकार और मुख्यधारा का मीडिया आरएसएस को ‘नए भारत’ की विचारधारा के बतौर थोप रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, शिक्षा, शोध, नीति-निर्माण और प्रशासन तक, हर सरकारी संस्थान में संघ द्वारा नियुक्त लोगों की सीधी पैठ लगातार बढ़ती जा रही है. नतीजा यह है कि आज भारत के कानूनी और संस्थागत ढांचे को जड़ से पलटा जा रहा है. विडंबना देखिए – भारत की संवैधानिक नींव और संस्थागत ढांचे को ध्वस्त करने के इस पूरी कवायद को ‘डीकोलोनाइजेशन’ (उपनिवेशवाद से मुक्ति) का नाम देकर जनता के सामने पेश किया जा रहा है.
जब ‘डीकोलोनाइजेशन’ (उपनिवेशवाद से मुक्ति) के नाम पर औपनिवेशिक-विरोधी विरासत को ही मिटाया जा रहा हो, तब चुनौती सिर्फ संविधान और संसदीय लोकतंत्र को बचाने की नहीं रहती, बल्कि आजादी के उसी जज्बे को फिर से जगाने की बन जाती है. भारतीय राष्ट्रवाद की साम्राज्यवाद-विरोधी बुनियाद को फिर से मजबूत करना और संविधान की प्रस्तावना में दर्ज ‘आधुनिक भारत’ के सपने को दोबारा जिंदा करना – अपनी लंबी यात्रा की दूसरी सदी में कदम रखते हुए कम्युनिस्टों के सामने यही सबसे बड़ी वैचारिक चुनौतियां हैं. लोकतंत्र को बचाने के लिए भारत को एक ‘दूसरी आजादी’ की लड़ाई लड़नी होगी, और आने वाले दिनों में यही संघर्ष कम्युनिस्ट आंदोलन का सबसे जरूरी एजेंडा होगा.
यह लड़ाई कई मोर्चों और कई स्तरों पर लड़ी जानी है. करोड़ों मेहनतकशों के लिए यह सीधे-सीधे जिंदा रहने की लड़ाई है, जिन्हें कॉरपोरेट जंगलराज के ‘हायर एंड फायर’ (रखो और निकालो) वाले दौर में ज्यादा काम, कम मजदूरी और असुरक्षा में धकेल दिया गया है. जिन किसानों ने कॉरपोरेट कब्जे वाले तीन काले कानूनों को रद्द कराया था, वे आज भी पूरी तरह असुरक्षित हैं. शिक्षा लगातार महंगी होती वस्तु बनती जा रही है और पक्की नौकरी एक सपना बन चुकी है. ऐसे में देश का नौजवान आज गहरी बेचैनी और अनिश्चितता में जी रहा है. रही-सही कसर यूएपीए (गैरकघनूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) जैसे काले कानूनों और एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) व ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’(SIR) जैसे दमनकारी अभियानों ने पूरी कर दी है, जिन्होंने असहमति रखने वाले नागरिकों और हाशिये पर खड़े समूहों के लिए नागरिक अधिकारों को एक तरह की ‘विलासिता’ बना दिया है.
दो सौ साल की औपनिवेशिक गुलामी की बेड़ियां तो टूटीं, लेकिन देश का बंटवारा आधुनिक भारत की सबसे बड़ी त्रासदी बनकर सामने आया. इसने भारतीयों को स्थायी घाव की यादें और ‘अखंड भारत’ के सपने दिए – और आरएसएस ने इन्हीं सपनों को अपने आक्रामक एजेंडे का हथियार बना लिया. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बंटवारे के बाद भी भारत अपनी तमाम विविधताओं, जटिलताओं और विशालता के साथ महाद्वीप जैसे आकार वाला देश है. इस विशाल विविधता को बुलडोजर से रौंदकर एक अति-केंद्रीकृत एकरूपता में ढालने की संघ की सनक देश को भीतर से और ज्यादा बांट रहा है. संविधान के 42वें संशोधन ने प्रस्तावना में सिर्फ ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ – ये दो विशेषण ही नहीं जोड़े थे, बल्कि ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ का वाक्यांश भी जोड़ा था. आज की संघ-भाजपा की सत्ता व्यवस्था धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के हर जिक्र को मिटाना चाहती है, लेकिन वह यह समझ नहीं पाती कि हमारे जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज में धर्मनिरपेक्षता और समाजवादी कल्याण व्यवस्था के बिना कोई देश एक राष्ट्र के रूप में एकजुट नहीं रह सकता.
1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के बाद से, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कम्युनिस्टों की कई पीढ़ियों को अनजाने रास्तों पर चलना पड़ा है और ऐसे हालात से जूझना पड़ा है जिनका पहले कोई अंदाजा नहीं था. फिर भी, कुछ बुनियादी सरोकार हमेशा केंद्र में रहे हैं – जैसे वर्ग-संघर्ष को सामाजिक बदलाव की मुख्य ताकत मानना, पूंजी का सामाजीकरण करना (यानी संसाधनों पर मुट्टी भर लोगों के बजाय पूरे समाज का हक), और मेहनतकश वर्ग को एक ऐसी राजनीतिक शक्ति के रूप में खड़ा करना जो राष्ट्र का नेतृत्व कर सके. इन सब का अंतिम लक्ष्य इंसान को गुलामी और शोषण की हर बेड़ी से आजाद कराकर एक सच्ची मानवीय मुक्ति हासिल करना है. किसी भी कीमत पर विस्तार करने की अपनी अंधी हवस में, पूंजी ने न केवल दुनिया को युद्धों और तबाही की आग में झोंक दिया है, बल्कि पर्यावरण के साथ हो रहे लगातार खिलवाड़ और बढ़ते जलवायु संकट ने आज खुद इस धरती के अस्तित्व को ही दांव पर लगा दिया है.
भारत के बदलते हालात में कम्युनिस्ट इन सवालों से कैसे निपटेंगे? यही आज का असली प्रश्न है. वर्ग संघर्ष की समझ और उसकी राजनीति को सिर्फ आर्थिक लड़ाइयों या किताबी परिभाषाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता. ‘वर्ग’ का कोई मतलब नहीं है, अगर वह जनता के वास्तविक सामाजिक अस्तित्व और उनकी पहचान को अपने भीतर न समेट सके, और अगर वह सत्ता के सवाल से न टकराए –फिर चाहे वह पूंजी की ताकत हो या राज्य की शक्ति. संगठित आंदोलन के पहले सौ सालों के तमाम अनुभवों को समेटते हुए, क्या भारत के कम्युनिस्ट वर्ग-संघर्ष का ऐसा प्रतिमान विकसित कर सकते हैं, जो जातिगत उत्पीड़न को सीधी चुनौती देने में कभी न हिचके और सांस्कृतिक विविधता का जश्न मनाए, और जिसमें जेंडर जस्टिस की धड़कन हो और जो नई पीढ़ियों की आकांक्षाओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करे? कठिन समय हमसे विश्वसनीय जवाबों की मांग करता है.
(The Right In The Left: Lessons And Limits, आउटलुक इडिंयाए 16 दिसंबर 2025 https://www.outlookindia.comèknationalèkthe-right-in-the-left)