-- क्रिस्टोफ जाफ्रलो
2014 से पहले का दौरः हिंदू-मुस्लिम दंगे एक राजनीतिक हथियार के बतौर
आजाद भारत में 2000 के दशक तक हिंदू और मुसलमानों के बीच होने वाली हिंसा का सबसे आम रूप दंगे ही थे. 1980 के दशक में जब अयोध्या आंदोलन शुरू हुआ, तो यह सिलसिला अपने चरम पर पहुंच गया. 1989 में राम मंदिर बनाने के लिए ईंटें ले जाने और समर्थन जुटाने के नाम पर हजारों शहरों और गांवों में जो शोभायात्राएं और रैलियां निकाली गईं, उनकी वजह से पूरे देश में दंगों की एक लहर दौड़ गई थी. फिर भी, उस दौर में हिंदू-मुस्लिम दंगे बीच-बीच में ही होते थे. कुछ समय बाद आग ठंडी पड़ती और हालात कमोबेश सामान्य हो जाते.
वजह यह थी कि हिंदू-मुस्लिम दंगे राजनीति का एक हिस्सा बन चुके थे और सत्ता के नफे-नुकसान को देखकर कराए जाते थे, जैसा कि पाॅल ब्रास ने अपने ‘संस्थागत दंगा तंत्र’ के अध्ययन में साफ दिखाया है. इस ढर्रे के कई रूप थे. कभी-कभी दंगा भड़काने वाले सत्ताधारी पार्टी यानी कांग्रेस के ही लोग होते थे, लेकिन वे उस गुट के होते थे जो अपने ही मुख्यमंत्री को कुर्सी से हटाना चाहता था. यह तरीका कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी को दिखाता था. रजनी कोठारी ने अपने ‘कांग्रेस तंत्र’ के विश्लेषण में कहा था कि कांग्रेस लंबे समय तक अपनी ही विपक्षी पार्टी बनी रही. कानून-व्यवस्था बिगड़ने के बहाने अपने ही नेता की जड़ें काटने के लिए कांग्रेसियों द्वारा दंगों का ऐसा इस्तेमाल 1990 में आंध्र प्रदेश में भी देखने को मिला था, ब्रास द्वारा इसके पहली बार अध्ययन किए जाने के कई साल बाद.
1980 के दशक से दंगों के इस राजनीतिक इस्तेमाल का एक नया रूप सामने आया. हिंदू-मुस्लिम हिंसा का इस्तेमाल समाज को धर्म के नाम पर बांटने के लिए होने लगा. समाज में इस बंटवारे से हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन को दो बड़े फायदे मिले. पहला फायदा यह हुआ कि हिंदू वोटर खुद को हिंदू धर्म का रक्षक बताने वालों को ज्यादा वोट देने लगे, क्योंकि हिंसा के माहौल ने उन्हें अपने ‘हिंदू’ होने का ज्यादा एहसास कराया. 1980 और 1990 के दशक के दंगों के पीछे के इस चुनावी खेल को स्टीवन विल्किंसन ने साबित किया था. उन्होंने आशुतोष वार्ष्णेय के साथ मिलकर 1950 से 1995 तक के दंगों के आंकड़ों पर काम किया और दिखाया कि ‘दंगे और उनमें होने वाली मौतें चुनाव से ठीक पहले के महीनों में अचानक बढ़ जाती हैं, और चुनाव खत्म होते ही तेजी से घट जाती हैं.’ 1989 में भागलपुर, जयपुर, इंदौर और दूसरी जगहों पर हुए दंगे इसी का साफ उदाहरण थे.
दूसरा फायदा यह हुआ कि हिंदू-मुस्लिम दुश्मनी को हवा देकर हिंदू राष्ट्रवादियों को बहुसंख्यक हिंदू समाज को ‘दूसरों’ यानी मुसलमानों के खिलाफ एकजुट करने का मौका मिल गया. हिंदुओं को आपस में जोड़ने की यह जरूरत 1980 और 1990 के दशकों में इसलिए ज्यादा बढ़ गई थी क्योंकि हिंदू समाज के भीतर जातिगत तनाव उभर रहे थे. यह तनाव मुख्य रूप से आरक्षण के मुद्दे की वजह से था. तथाकथित ‘ऊंची’ जातियां आरक्षण के विरोध में सड़कों पर उतर आई थीं, क्योंकि वे इसे अपने साथ भेदभाव मानती थीं. यह सबसे पहले 1985 में गुजरात में देखा गया, जहां दबंग पटेल जाति और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के बीच हुई हिंसा में कई जानें गईं. लेकिन हिंदू राष्ट्रवादियों ने मुसलमानों को बलि का बकरा बनाकर इस झगड़े को ‘सांप्रदायिक’ रंग दे दिया. गुजरात के समाज में आए इस नए बंटवारे ने भाजपा के सत्ता में आने का रास्ता साफ किया. यही सब 1990 के दशक की शुरुआत में पूरे देश में दोहराया गया, जब वी. पी. सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कीं. इसके तुरंत बाद भाजपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और पार्टी नेता एल. के. आडवाणी ने पूरे देश में ‘रथ यात्रा’ निकाली. इस यात्रा का मकसद जातियों की आपसी दरार को पाटना था, और इस यात्रा के रास्ते में जगह-जगह दंगे भड़के.
चूंकि हिंसा का एक राजनीतिक मकसद होता था, इसलिए इसे बहुत लंबा नहीं खिंचने दिया जाता था, खासकर इसलिए कि भाजपा को उसका चुनावी फायदा मिलने से न चूक जाए. गुजरात जनसंहार के बाद हमने यही खेल देखा, जब नरेंद्र मोदी ने विधानसभा भंग कर दी और महीनों चली हिंसा से पैदा हुए जन-आक्रोश और भावनाओं का फायदा उठाने के लिए समय से पहले चुनाव करा दिए. मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान खुलकर इसका इस्तेमाल किया और भाषणों में कहा कि आम मुसलमानों और इस्लामी ताकतों से हिंदुओं को बड़ा खतरा है. और भाजपा भारी बहुमत से जीती, खास तौर पर उन इलाकों में जो हिंसा की सबसे ज्यादा मार झेल चुके थे. असल में, हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित तीन जिलों, पंचमहाल, दाहोद और वडोदरा, की 50 सीटों में से भाजपा ने 42 सीटें जीतीं (वडोदरा की तो सभी 13 विधानसभा सीटें जीत लीं). असीम प्रकाश के अध्ययन से पता चलता है कि सांप्रदायिक हिंसा से प्रभावित 13 जिलों में (जहां कुल वोटरों का 66% हिस्सा रहता था) भाजपा का प्रदर्शन जबरदस्त रहा: पार्टी को वहां 71% वोट मिले और 116 में से 91 सीटें मिलीं, यानी पिछली बार से 21 सीटें ज्यादा. इसके उलट, जिन जिलों में दंगे नहीं हुए थे, वहां कांग्रेस को बढ़त मिली (1998 के मुकबले 9% ज्यादा वोट और 17 ज्यादा सीटें), जबकि वहां भाजपा को नुकसान हुआ (3% कम वोट और 18 सीटें कम).
इस ध्रुवीकरण ने भाजपा को जातिगत झगड़ों को ठंडा करने और आम हिंदू जनता को अपने पाले में लाने में मदद की. अहमदाबाद के एक दलित व्यक्ति ने वार्ड बेरेनशाॅट को बताया था: ‘दंगों के बाद चुनाव हुए. उस वक्त वणकर और चमार भी ‘हिंदू’ बन गए थे, इसलिए उन्होंने एक हिंदू को वोट दिया. और इस तरह हिंदू जीत गया.’ एक एग्जिट पोल में सामने आया कि जहां 76% ‘ऊंची’ जातियों और 82% पटेलों ने भाजपा को वोट दिया, वहीं ओबीसी जातियों ने भी अपनी जाति के हिसाब से 54% से 61% तक भाजपा का समर्थन किया.
सामूहिक हिंसा से व्यवस्थागत हिंसा तक
2000 के दशक में जब कई राज्यों में भाजपा की सरकारें बनने लगीं, तो सांप्रदायिक हिंसा का तौर-तरीका बदलने लगा. एक तरफ तो पार्टी को चुनाव जीतने के लिए सिर्फ ध्रुवीकरण पर ही निर्भर रहने की जरूरत नहीं रही (क्योंकि सत्ता में होने की वजह से उसके पास सरकारी तंत्र और पैसे-रुपये के दूसरे साधन मौजूद थे). दूसरी तरफ, अगर अपनी ही सरकार रहते दंगे-फसाद होते रहते, तो यह संदेश जाता कि सरकार कानून-व्यवस्था संभालने में नाकाम है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी छवि खराब होने का डर था. आखिर 2002 के जनसंहार के बाद पश्चिमी देशों ने मोदी के आने पर पाबंदी जो लगा दी थी.
इसलिए सांप्रदायिक हिंसा ने एक नया रूप ले लिया, जो 2014 के बाद से कुछ खास तरीकों में ढल चुका है. इसमें मुसलमानों को अलग-अलग निशाना बनाया जाता है, लगभग रोजाना के ढर्रे पर, और इसका मकसद इस समुदाय को किसी न किसी तरह मिटा देना है. इसीलिए अब इसे ‘हिंदू-मुस्लिम हिंसा’ नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह सीधे तौर पर ‘मुस्लिम-विरोधी हिंसा’ है.
यह बदलाव माॅब लिंचिंग के आम हो जाने में साफ दिखता है, जैसा कि जफरुल इस्लाम खान की ताजा किताब ‘माॅब लिंचिंग इन इंडिया, अ रिकाॅर्ड: 2014-2024’ में दर्ज किया गया है. कई मामलों में गो-रक्षा ही इन लिंचिंग की जड़ है. कसाईखाने में गाय ले जाने के शक में किसानों को पीट-पीटकर मार डाला गया. इससे एक और खूनी सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें खुद को श्गौ रक्षकश् कहने वाले लोग हाईवे पर गश्त लगाते हैं और संदिग्ध ट्रकों को रोकते हैं. अगर ट्रक चलाने वाला मुसलमान हो और उसमें मवेशी लदे हों, तो पिटाई इतनी बेरहमी से होती है कि अक्सर जान चली जाती है.
इंडियास्पेंड के अनुमान के मुताबिक, 2017 में गाय से जुड़ी हिंसा की 34 घटनाएं हुईं, जबकि 2016 में 25, 2015 में 13, 2014 में 3, 2013 में 1 और 2012 में सिर्फ 1 घटना हुई थी. जून 2017 तक मारे गए 28 लोगों में से 24 मुसलमान थे. 2018 में इस वेबसाइट ने गो-रक्षा से जुड़ी लिंचिंग का हिसाब रखने के लिए एक अलग पोर्टल भी शुरू किया था, लेकिन थोड़े ही समय बाद उसे बंद करना पड़ा. आज जफरुल इस्लाम खान के रिकाॅर्ड के मुताबिक 2014 से 2024 के बीच लिंचिंग की 1,733 घटनाएं सामने आई हैं.
यह आंकड़ा दिखाता है कि यह चलन किस कदर फैल चुका है, जिसे सोशल मीडिया और बढ़ावा देता है, क्योंकि इन हमलों के वीडियो बनाए जाते हैं और लोगों में खौफ पैदा करने के लिए इंटरनेट पर डाले जाते हैं. इसका मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर मानसिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर गहरा असर पड़ा है. कई किसानों ने मवेशी पालना छोड़ दिया है, और आम मुसलमान अब टोपी पहनने, दाढ़ी रखने या सार्वजनिक जगहों पर उर्दू बोलने से भी कतराने लगे हैं. इसके साथ ही, मुसलमान अब अपनी सुरक्षा के लिए अपनी ही बस्तियों में सिमटने को मजबूर हो रहे हैं, क्योंकि मिले-जुले मोहल्लों में उन्हें किराए पर लेने या खरीदने के लिए मकान मिलना लगभग नामुमकिन हो गया है.
इसकी वजह यह है कि मुस्लिम-विरोधी हिंसा का मकसद अब बदल चुका है. अब बात सिर्फ वोटों के लिए समाज को बांटने की नहीं है, बल्कि ‘दूसरे’ समुदाय को सार्वजनिक जीवन से, यहां तक कि इंसानियत के दर्जे से ही, मिटा देने की है. सत्ता में बैठे लोगों की मंशा अब सिर्फ राजनीतिक चालबाजी तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी तरह वैचारिक बन चुकी है.
नरेंद्र मोदी का दावा है कि वह मुस्लिम आक्रमणों से शुरू हुई 1,200 साल की ‘गुलामी’ के दौर को खत्म करना चाहते हैं. और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का कहना है कि अब इतिहास से बदला लेने का वक्त आ गया हैः
‘हमारे गांव जलाए गए. हमारी सभ्यता नष्ट की गई. हमारे मंदिर लूटे गए और हम बेबस होकर तमाशा देखते रहे. यह इतिहास आज हमारे सामने एक चुनौती पेश करता है, जिसके लिए भारत के हर नौजवान के सीने में आग होनी चाहिए. ‘बदला’ शब्द शायद सही न लगे, लेकिन बदले की भावना अपने आप में बहुत बड़ी ताकत होती है. हमें अपने इतिहास का बदला लेना ही होगा.’
बदले की यह सोच, जो हिंसा को जायज ठहराती है, कई रूपों में दिखती है. इसमें वोट का अधिकार छीनकर मुसलमानों को नागरिकता से बेदखल करना, उनकी आर्थिक कमर तोड़ना, उन्हें अलग-थलग बस्तियों में धकेलना और उन पर शारीरिक जुल्म ढहाना शामिल है. लेकिन इस हिंसा की क्रूरता एक और पहलू दिखाती है: उन्हें इंसान मानने से ही इनकार कर देना.
आलम यह है कि किसी का मुस्लिम दिखना ही उसकी जान लेने के लिए काफी समझा जाने लगा है. नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में जून 2014 में जो पहली हत्या हुई, वह इसी का उदाहरण थी: 24 साल के कंप्यूटर इंजीनियर मोहसिन सादिक शेख को पुणे में मस्जिद से लौटते वक्त सिर्फ इसलिए पीट-पीटकर मार डाला गया ‘क्योंकि उसने जालीदार टोपी पहन रखी थी और दाढ़ी रखी हुई थी’. इससे भी हैरान करने वाली बात यह थी कि ‘बाॅम्बे हाईकोर्ट ने माना कि मुस्लिम दिखना एक तरह का उकसावा था, और इसलिए हत्यारों को आंशिक रूप से बरी करते हुए जमानत पर छोड़ दिया गया... क्योंकि मोहसिन को मारने की उनके पास इसके अलावा कोई और वजह नहीं थी.’
ऐसे जुर्म अब आए दिन होने लगे हैं. मिसाल के तौर पर, उत्तर प्रदेश के एक छोटे कस्बे से तीन मौलवी जामा मस्जिद और निजामुद्दीन दरगाह जाने के लिए ट्रेन से दिल्ली जा रहे थे, तो उसी डिब्बे के यात्रियों ने उन पर हमला कर दिया, क्योंकि उनकी ‘टोपी और स्कार्फ देखकर वे चिढ़ गए थे’.
लेकिन बात सिर्फ दूसरे को अदृश्य कर देने तक नहीं है; उसे तड़पाना और यातना देना भी इसका हिस्सा है. कुछ मामलों में तो चाकू या गोली से सीधे जान ले ली जाती है, लेकिन कई मामलों में अंतहीन यातना दी जाती है और उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला जाता है, जैसे पहलू खान, तबरेज अंसारी और रकबर खान के मामलों में हुआ. मेवात में दूध की डेयरी चलाने वाले किसान रकबर और उनके साथी असलम अलवर जिले से दो दुधारू गायें लेकर आ रहे थे, तभी खुद को ‘गौ रक्षक’ बताने वाले पांच हथियारबंद लोगों ने उन पर हमला बोल दिया. इस हमले में बच गए असलम ने हमलावरों को आपस में यह कहते सुना था: ‘विजय, इसकी टांगें तोड़; धर्मेंद्र, सिर पर जोर से मार; और नरेश, तू इसके हाथ तोड़.’
रिटायर्ड पुलिस अधिकारी एन. सी. अस्थाना ने इस मानसिकता की तुलना नाजियों से की. उनका कहना है कि दोनों ही मामलों में मकसद सिर्फ खत्म करना नहीं, बल्कि आबादी के एक हिस्से को पूरी तरह झुकाना और उन्हें ‘हारे हुए लोग’ तथा हिटलर की भाषा में ‘इंसान से भी घटिया दर्जे का जीव’ (Untermensch) बनाकर रख देना है.
अगर मुसलमानों को ऐसा तबका मान लिया गया है जिसे पैरों तले दबाकर रखना है, तो इससे यह समझ आता है कि बच्चों तक पर इतनी ज्यादती क्यों की जाती है. क्योंकि सोच यह बन गई है कि इस पूरे समुदाय के हर सदस्य को भुगतना चाहिए, खासकर तब जब उन्हें इंसान समझा ही नहीं जा रहा हो. जैसे, मोबाइल चोरी के आरोप में एक 11 साल के मुस्लिम बच्चे को नंगा किया गया और उसकी चार उंगलियां काट दी गईं.
बच्चों के साथ-साथ मुस्लिम औरतें भी खास निशाना हैं. उनके साथ होने वाले बर्ताव के तरीके चाहे जो हों, हर जगह उन्हें बेइज्जत करने और नीचा दिखाने की कोशिश साफ दिखती है. प्रतीकात्मक हिंसा की बात करें तो मुस्लिम महिलाओं को ‘सुल्ली’ (मुस्लिम महिलाओं के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला अपमानजनक शब्द) बताकर उनकी ऑनलाइन ‘नीलामी’ की गई, जिसने सबको हिलाकर रख दिया. समाज में पहचान रखने वाली 80 से ज्यादा महिलाओं, जिनमें पत्रकार, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थीं, के नाम और तस्वीरें गिटहब (GitHub) पर बने ‘सुल्ली डील्स’ नाम के ऐप पर डाल दी गईं. इस घिनौनी हरकत का शिकार हुई एक महिला ने बताया: ‘लोग पांच रुपये और दस रुपये की बोली लगा रहे थे, जिस्म के अंगों पर नंबर दे रहे थे, यौन क्रियाओं का ब्योरा लिख रहे थे और बलात्कार की धमकियां दे रहे थे.’
बलात्कार मुस्लिम महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ शारीरिक हिंसा का सबसे आम रूप बन चुका है. हिंदू राष्ट्रवादी नेता, जिनमें महिला नेता भी शामिल हैं, खुलेआम मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ हिंसा की अपील करने लगे हैं. 2019 में उत्तर प्रदेश के रामकोला की भाजपा महिला मोर्चा अध्यक्ष सुनीता सिंह गौर ने यहां तक कहा था: ‘इनका (मुसलमानों का) एक ही इलाज है. हिंदू भाई 10-10 की टोली बनाकर खुलेआम सड़कों पर इनकी माताओं-बहनों से सामूहिक बलात्कार करें... और फिर उन्हें बीच बाजार में लटका दें ताकि सब देखें.’
इस तरह के जहरीले प्रचार ने बलात्कार जैसी वारदातों को यकीनन बढ़ावा दिया, खासकर तब जब बलात्कार को हिंदू धर्म के कथित अपमान की ‘सजा’ बताकर सही ठहराया गया. जैसे 2016 में हरियाणा के मेवात इलाके में एक 20 साल की युवती और उसकी 14 साल की चचेरी बहन के साथ चार आदमियों ने गोमांस खाने का आरोप लगाकर बलात्कार किया, और उन लड़कियों के चाचा-चाची को पीट-पीटकर मार डाला. यहां तक कि मासूम बच्चियों को भी नहीं बख्शा गया, जिसका सबूत 2018 में जम्मू-कश्मीर में एक 8 साल की बच्ची के साथ हुआ बलात्कार है.
आज भारत में हम जो मुस्लिम-विरोधी हिंसा देख रहे हैं, वह विरोधाभासी है. एक तरफ तो इसमें 2014 से पहले हुए जनसंहारों और दंगों की तुलना में कम जानें जाती हैं. लेकिन दूसरी तरफ, इसने पूरे समुदाय की पहचान और वजूद को ही मिटाने वाला ऐसा भयानक रूप ले लिया है जो पहले कभी नहीं दिखा. आजाद भारत में 2000 के दशक की शुरुआत तक यह हिंसा राजनीति के नफे-नुकसान का खेल थी, इसलिए इसकी एक हद तय होती थी. तब यह कभी-कभार भड़कती थी, राजनीतिक मकसद से होती थी और सामूहिक होती थी. लेकिन 2014 के बाद से यह बिल्कुल अलग रास्ते पर चल रही है: बदले की भावना के रास्ते पर, एक ऐसा बदला जो हर मुसलमान से लिया जाना है, चाहे वह औरत हो, मर्द हो या बच्चा. मकसद यह है कि पूरा समुदाय भुगते और उस जगह से बेदखल हो जाए जिसे सिर्फ हिंदुओं का देश यानी ‘हिंदू राष्ट्र’ बताया जा रहा है. लिंचिंग और यहां तक कि दंगे भी अब इसी बदले की भावना को पूरा करने का जरिया हैं: 2020 का दिल्ली दंगा चुनाव से पहले वोट बांटने के लिए नहीं, बल्कि चुनाव में भाजपा की हार के बाद ‘सबक सिखाने’ के लिए कराया गया था. इसलिए आज की मुस्लिम-विरोधी हिंसा रोजमर्रा की आदत बन चुकी है, नस्लीय सफाए की मंशा रखती है और लिंचिंग के जरिए एक-एक व्यक्ति को चुनकर निशाना बनाती है.
हिंसा का यह तरीका हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों ने शुरू किया था. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आम जनता के भीतर भी घर कर रहा है, जैसा कि ‘माॅब लिंचिंग’ (भीड़ द्वारा हिंसा) की घटनाओं से लगता है? अगर ऐसा हुआ, तो देश उस मोड़ पर पहुंच जाएगा जहां से वापसी मुमकिन नहीं होगी, ठीक वैसा ही जैसा भारत के कुछ पड़ोसी देशों में हो चुका है.
‘द वायर’ से साभार (हिन्दी अनुवाद: मनमोहन)
(लेखक पेरिस के सीईआरआई-साइंसेज पो/सीएनआरएस में सीनियर रिसर्च फेलो, किंग्स काॅलेज लंदन में भारतीय राजनीति और समाजशास्त्र के प्रोफेसर, कार्नेगी एंडोमेंट फाॅर इंटरनेशनल पीस में नाॅन-रेजिडेंट स्काॅलर और ब्रिटिश एसोसिएशन फाॅर साउथ एशियन स्टडीज के अध्यक्ष हैं.)