– सूर्याे
आधुनिक भारतीय शहर प्रवासी मजदूरों के बिना नहीं चल सकते. 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश और बिहार ऐसे दो सबसे बड़े राज्य थे जहां से सबसे ज्यादा लोग दूसरे राज्यों में गए थे; उस समय उत्तर प्रदेश के लगभग 83 लाख और बिहार के 63 लाख लोग दूसरे राज्यों में रह रहे थे. पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड से भी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों में जाते हैं. तब से भारत में कोई जनगणना नहीं हुई है, और भारत में प्रवासी मजदूरों की गिनती हमेशा से ही बहुत कम रही है. जानकारों का अनुमान है कि आज भारत में लगभग 10 करोड़ ऐसे प्रवासी मजदूर हो सकते हैं जो थोड़े समय के लिए काम की तलाश में दूसरी जगह जाते हैं.
मजदूरों का यह पलायन भारत में मौजूद भारी भौगोलिक असमानताओं की वजह से होता है. प्रति व्यक्ति आय के अंतर को ही देख लीजिए. 2024-25 में बिहार का ‘प्रति व्यक्ति नेट स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट’ (राज्य की कुल आय को उसकी जनसंख्या से भाग देने पर मिलने वाली रकम) 69,321 रुपये थी. वहीं, तेलंगाना में यह आंकड़ा लगभग 3.88 लाख रुपये, कर्नाटक में 3.81 लाख रुपये और दिल्ली में 4.93 लाख रुपये था. ये आंकड़े बताते हैं कि अलग-अलग राज्यों में आय और रोजगार के मौकों में कितना बड़ा अंतर है. दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय बिहार की तुलना में सात गुना से भी ज्यादा थी. मजदूरी के आंकड़े भी कुछ ऐसी ही कहानी बताते हैं. 2024-25 में, ग्रामीण इलाकों के एक पुरुष निर्माण मजदूर की औसत दैनिक मजदूरी केरल में लगभग 923 रुपये थी, जबकि बिहार में यह 389 रुपये और मध्य प्रदेश में 308 रुपये थी. ये आंकड़े दिखाते हैं कि एक ही तरह के काम में मजदूरी के स्तर में कितना बड़ा अंतर है. बिहार का कोई निर्माण मजदूर जब दूसरी जगह जाता है, तो उसे अपने गृह राज्य के मुकाबले कहीं ज्यादा मजदूरी मिल सकती है. लेकिन, शहरों में रहने का किराया, खाने-पीने का खर्च, आने-जाने का किराया और बिना काम के बिताए गए समय को देखते हुए, यह मजदूरी शायद ही कभी ‘उचित’ या ‘पर्याप्त’ होती है. फिर भी, अपने गृह राज्यों की बेहद खराब आर्थिक स्थिति मजदूरों को सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर जाने पर मजबूर कर देती है, जहां उन्हें मिलने वाली मजदूरी अक्सर उनके शोषण का ही एक रूप होती है.
औद्योगीकरण के साथ पलायन एक आम बात रही है. इतिहास गवाह है कि शहरों का विस्तार गांवों और कम औद्योगिक क्षेत्रों से आने वाले मजदूरों के दम पर ही हुआ है. भारत में एक खास समस्या क्षेत्रीय असमानता का बड़ा पैमाना और उसका लगातार बने रहना है. पूंजी, बुनियादी ढांचा और सुरक्षित रोजगार कुछ ही शहरी और औद्योगिक केंद्रों तक सीमित हैं, जबकि देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो केवल श्रम (मजदूर) की आपूर्ति करने वाले पिछड़े क्षेत्रों के रूप में रह गया है. भारत में कोई ऐसा राष्ट्रीय श्रम बाजार नहीं है जहां पूंजी और रोजगार समान रूप से फैले हों. इसके बजाय, यहां पूंजी के कुछ ऐसे केंद्र हैं जो उन विशाल क्षेत्रों से जुड़े हैं, जहां से लगातार श्रमिक पैदा होता है और बाहर भेजा जाता है. नीति आयोग के अनुसार, भारत के शहर देश के कुल क्षेत्रफल का केवल 3% हिस्सा हैं, लेकिन देश की जीडीपी में इनका योगदान लगभग 60% है. 2011 की जनगणना के समय, बिहार में शहरीकरण केवल 11.3% था, जबकि महाराष्ट्र में 45.2%, तमिलनाडु में 48.4% और केरल में 47.7% था.
औद्योगिक नीति के कारण उत्पादक निवेश का समान रूप से बंटवारा नहीं हो पाया है, जिससे बिहार जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर कम रोजगार, कम उत्पादकता वाला काम और बहुत कम वेतन जैसी समस्याएं पैदा हो गई हैं. ऐसे में, अमीर इलाकों के नियोक्ता मजदूरों के इस बड़े भंडार से लोगों को काम पर रख सकते हैं. एक प्रवासी मजदूर, जिसके पास अपने गृह राज्य में बहुत कम विकल्प होते हैं, वह शायद ऐसे वेतन, काम के घंटों और शर्तों को भी मान ले, जिन्हें कोई स्थानीय मजदूर (जिसके पास वहां मजबूत सहारा हो) मानने से इनकार कर सकता है. ठेकेदार भर्ती, परिवहन, रहने की जगह और वेतन भुगतान पर अपना नियंत्रण रखकर इस असंतुलन को और बढ़ा देते हैं. असल में, कई प्रवासी मजदूरों के पास अपने गंतव्य शहर में रहने के लिए कोई पक्की जगह भी नहीं होती; वे अक्सर उन्हीं निर्माण स्थलों पर रहते हैं, जहां वे काम करते हैं. कम कानूनी वेतन, नियमों का ठीक से लागू न होना, औपचारिक अनुबंधों का न होना, और ट्रेड यूनियनों पर लगी कानूनी या गैर-कानूनी पाबंदियां मजदूरों की मोलभाव करने की क्षमता को और कम कर देती हैं.
हालांकि, समस्या यह नहीं है कि प्रवासी मजदूर अपनी मर्जी से स्थानीय मजदूरों की नौकरियां छीन लेते हैं. नियोक्ता मजदूरों की अलग-अलग और कमजोर परिस्थितियों का फायदा उठाकर उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देते हैं. जहां ट्रेड यूनियनें कमजोर हों और वेतन के कोई तय मानक न हों, वहां बड़ी संख्या में आसानी से बदले जा सकने वाले मजदूरों की उपलब्धता, प्रवासी और स्थानीय दोनों तरह के मजदूरों के वेतन और काम की स्थितियों पर दबाव डालती है. इससे राज्यों के बीच का अंतर मुनाफे और पूंजी जमा करने का एक जरिया बन जाता है. पूंजीपति वर्ग गृह राज्यों में मौजूद बेरोजगार या कम रोजगार वाले मजदूरों के बड़े भंडार का फायदा उठाता है, और गंतव्य राज्यों में प्रवासी मजदूरों से उन्हें बदल देने की धमकी देकर वेतन को कम रखने का काम करता है.
ज्यादातर मामलों में, प्रवासी मजदूरों को अनुबंध पर रखा जाता है. मुख्य नियोक्ता एक उप-ठेकेदार को काम पर रखता है, जो फिर मजदूरों की भर्ती करता है. इस तरह मजदूर ठेकेदार से बंध जाते हैं, और मुख्य नियोक्ता अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को दूसरों पर टाल देता है. लिखित अनुबंध या रोजगार के सबूत न होने, और न्यूनतम वेतन के नियमों को ठीक से लागू न किए जाने के कारण, मजदूरों को कानूनी रूप से तय न्यूनतम वेतन से भी कम पैसा मिलता है. प्रवासी मजदूर इन कम वेतन वाली शर्तों को मानने के लिए मजबूर होते हैं, क्योंकि उनके पास कोई और चारा नहीं होता. साथ ही, भले ही उन्हें बहुत कम वेतन मिल रहा हो, लेकिन यह उनके गृह राज्य में मिलने वाले वेतन से शायद ज्यादा ही होता है. नियोक्ता अन्य जिम्मेदारियों को भी दूसरों पर टाल देते हैं, जैसे कि गंतव्य राज्य में मजदूरों के रहने की व्यवस्था करना. प्रवासी मजदूर अक्सर अपने गंतव्य राज्य में बहुत ही दयनीय स्थितियों में रहते हैं – कई मजदूर छोटी-छोटी जगहों को साझा करके रहते हैं, या कभी-कभी उसी निर्माण स्थल पर रहते हैं जहां वे काम करते हैं.
स्थिति तब और खराब हो जाती है, जब इन प्रवासी मजदूरों के पास अपने गंतव्य राज्य में कोई सामाजिक सुरक्षा या राजनीतिक ताकत नहीं होती, क्योंकि उनके राशन कार्ड और वोट देने के अधिकार उनके मूल राज्य से जुड़े होते हैं, न कि उस राज्य से जहाँ वे काम कर रहे हैं. इसलिए, गंतव्य राज्य में प्रवासी मजदूरों का कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं होता. इनमें से ज्यादातर पुरुष होते हैं, जबकि उनके परिवार उनके मूल राज्यों में ही रहते हैं. इससे मूल राज्यों में रहने वाली महिलाओं पर घरेलू जिम्मेदारियों का बहुत बड़ा बोझ आ जाता है, जिसमें बच्चों की देखभाल और घर के बुजुर्गों की देखरेख शामिल है. चूंकि पुरुष मजदूर इन जिम्मेदारियों से मुक्त होते हैं, इसलिए उनसे गंतव्य राज्य में कठिन परिस्थितियों में और लंबे समय तक काम करवाया जा सकता है. इस तरह, गांव के लोग बिना किसी वेतन के घरेलू काम की भारी जिम्मेदारी उठाकर शहरों में पूंजी जमा करने में मदद करते हैं, और एक तरह से शहरों को सब्सिडी (आर्थिक मदद) देते हैं.
इस व्यवस्था के तर्क को मिल्टन फ्रीडमैन ने समझाया था, जो मुक्त-बाजार पूंजीवाद (फ्री-मार्केट कैपिटलिज्म) के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे. अमेरिका में मैक्सिकन मजदूरों के बारे में बात करते हुए, फ्रीडमैन ने तर्क दिया था कि आप्रवासन तभी तक फायदेमंद है, जब तक वह अवैध बना रहे. उनका तर्क था कि ऐसे मजदूर (जिनके पास कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं होते) नियोक्ताओं की जरूरत के काम तो कर देते हैं, लेकिन उन्हें कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा का कोई लाभ नहीं मिलता. भारत में, अलग-अलग राज्यों के बीच जाने वाले प्रवासी मजदूर, संवैधानिक रूप से तो समान अधिकारों वाले नागरिक ही हैं. फिर भी, भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था उनके रोजगार को ‘अनौपचारिक’ बनाए रखकर वैसा ही फायदा उठाती है. ये प्रवासी मजदूर शहर बनाने, कारखाने चलाने और सामान पहुंचाने के लिए तो ‘कानूनी’ माने जाते हैं, लेकिन उन्हें अनुबंध, सामाजिक सुरक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और वेतन चोरी या नौकरी से निकाले जाने के खिलाफ सुरक्षा देने के मामले में ‘अनौपचारिक’ मानकर वंचित रखा जाता है.
(लिबरेशन, नवंबर 2026 से साभार)