वर्ष 35 / अंक - 39 / वोट चोरी के खिलाफ अब जवाबदेही की लड़ाई

वोट चोरी के खिलाफ अब जवाबदेही की लड़ाई

वोट चोरी के खिलाफ अब जवाबदेही की लड़ाई

-- मनमोहन

ऐसे दौर में, जब आधुनिक लोकतंत्रों में तानाशाही के उभार के साथ नागरिक संस्थाओं में पारदर्शिता लगातार क्षीण हो रही है और सत्ता-परस्त माहौल में खोजी पत्रकारिता दम तोड़ रही है, तब इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा की दस महीने लंबी महत्वपूर्ण जांच ने भारत निर्वाचन आयोग के शीर्ष स्तर पर मौजूद गंभीर कानूनी अनियमितताएं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को दरकिनार किए जाने को सामने रखा है.

ज्ञानेश कुमार के आका नरेंद्र मोदी ने देश की एक-एक संस्था को ऊपर से नीचे तक तबाह कर दिया है. उसी राह पर चलते हुए ज्ञानेश कुमार अकेले दम पर चुनाव आयोग चला रहे थे. यही वजह है कि उन्होंने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की भी नहीं सुनी. मुख्य चुनाव आयुक्त बराबरी वालों में पहला होता है, कोई सुप्रीमो नहीं. इंडियन एक्सप्रेस की जांच साफ करती है कि उन्होंने अनधिकृत और गैरकानूनी कदम उठाए.

विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान जो कुछ हुआ, उससे नाराजगी सिर्फ विपक्ष, सिविल सोसाइटी और मीडिया तक सीमित नहीं थी. यह नाराजगी खुद चुनाव आयोग के भीतर थी. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार रिकाॅर्ड पर आपत्ति दर्ज की. कई मामलों में उनका कहना था कि फैसले और निर्देश उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना जारी किए गए.

फाॅर्म-6 का प्रसंग इसका सबसे साफ नमूना है. नए मतदाताओं के लिए इस फाॅर्म में ऐसे सवाल जोड़ दिए गए जिनका संबंध पिछली एसआईआर की मतदाता सूची से था. दोनों आयुक्त पहले ही दर्ज कर चुके थे कि नियमों में संशोधन के बिना फाॅर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता. संधू और जोशी का मानना था कि वे सवाल जोड़ने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन कानून के मुताबिक फाॅर्म बदलने का अधिकार सिर्फ सरकार के पास है. आयोग खुद कई मामलों में अदालतों के चक्कर काट रहा है, ऐसे में यह कदम गैरकानूनी होगा. ध्यान रहे, इसके लिए संसद में कानून बदलने की जरूरत भी नहीं थी. सरकार नियमों में संशोधन करके यह काम बहुत तेजी से कर सकती थी. संबंधित अधिकारी से कहा गया कि इन कानूनी पहलुओं को शामिल कर दोबारा प्रस्ताव पेश किया जाए. लेकिन इसके बावजूद, दो महीने बाद अचानक पता चला कि बदलाव लागू कर दिया गया है, वह भी तब जब आयुक्तों को लग रहा था कि इस पर चर्चा चल रही है. संधू ने फाइल पर हैरानी दर्ज की कि उन्हें इस फैसले की भनक अखबारों से लगी और जो हुआ, वह आपसी बातचीत के बिल्कुल उलट है. उनके शब्दों में ‘यह बदलाव अनधिकृत और गैरकानूनी है और इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए, क्योंकि इससे नए और युवा वोटरों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है.’ फिर भी बदलाव जारी रहा.

सीधा सवाल खड़ा होता है. अगर सारे फैसले आम सहमति से हो रहे थे, तो कोई वरिष्ठ अधिकारी फाइल पर यह क्यों लिखेगा कि उसे फैसले की जानकारी अखबार से मिली. चुनाव आयोग का दावा कि सब ठीक है और सब साथ हैं, फाइलों पर दर्ज इन कड़वी बातों के सामने खोखला है.

इसी दौरान मतदाता सूची के पूरे डेटाबेस को दिल्ली स्थित केंद्रीय नियंत्रण में ले जाया गया. मतदाता की पात्राता तय करने की कानूनी जिम्मेदारी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर की होती है, लेकिन केंद्रीकृत आईटी व्यवस्था ने जमीनी अधिकारियों की पहुंच और अधिकार सीमित कर दिए. गोवा में 97 ऐसे मतदाता सामने आए जिन्हें ईआरओ ने सभी शर्तें पूरी करने के बाद सूची में शामिल करने की मंजूरी दी, लेकिन केंद्रीय साॅफ्टवेयर ने नाम दर्ज नहीं होने दिए. यह तकनीकी गड़बड़ी नहीं है. सवाल यह है कि मतदाता सूची पर अंतिम नियंत्रण किसका है और उसमें किए गए हर बदलाव का जवाब कौन देगा?

पश्चिम बंगाल में एसआईआर ने इस संकट को और गंभीर बना दिया. करीब 60 लाख मतदाताओं को साॅफ्टवेयर से निकली तार्किक विसंगतियों के आधार पर चिन्हित किया गया और करीब 27 लाख नाम हटाए गए. हटाए गए मतदाताओं में से 22 लाख से अधिक ने अपने नाम वापस शामिल कराने के लिए अपील की. दूसरी ओर करीब 16.1 लाख अपीलें ऐसे मतदाताओं के नाम काटने के लिए दायर की गईं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने सूची में शामिल किया था. इन अपीलों को आयोग की ओर से किसने अधिकृत किया, यह सवाल चुनाव आयुक्त संधू ने स्वयं उठाया. और इसका जवाब आज तक नहीं मिला.

जून 2025 से अगस्त 2026 के बीच तीन चरणों में चलाए गए इस तथाकथित विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया द्वारा देश के 13.4 करोड़ नागरिकों को मसौदा मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया. यह किसी सफाई अभियान के नाम पर दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में मताधिकार का सबसे बड़ा संहार है.

यह सब इस वजह से हुआ कि आयोग ने मतदाता के अधिकार की रक्षा करने के बजाय उसे साबित करने की मनमानी शर्तें मतदाताओं पर थोप दीं. एसआइआर ने पूरी स्थापित प्रक्रिया के उलट रास्ता अपनाया. पहले नाम संदेह के घेरे में, फिर कागजों से अधिकार साबित करने की मांग, और इस बीच नाम सूची से बाहर. यह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की संवैधानिक भावना के खिलाफ है. भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी के पास जन्म और निवास के पुराने दस्तावेज नहीं हैं, नागरिकता का दावा तब तक स्वीकार किया जाना चाहिए जब तक उसके खिलाफ ठोस प्रमाण न हो. यही पूर्व न्यायमूर्ति मदन लोकुर का मानना है, और यही संविधान सम्मत बात है.

नागरिकता की जांच आयोग का मूल काम ही नहीं है. उसका काम मतदान के अधिकार को सुनिश्चित करना है. किसी के गैर-नागरिक होने का ठोस प्रमाण सामने आए, तब उसे मतदान से रोका जा सकता है. इस खतरनाक प्रक्रिया का असर चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा. आयोग की नागरिकता परीक्षा के नतीजे आगे राशन, पेंशन, पासपोर्ट और दूसरी सुविधाओं पर असर डालने के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं.

चुनाव आयोग की सफाई सवालों का जवाब नहीं देती. आयोग का कहना है कि अलग-अलग राय निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है. लेकिन इससे यह नहीं बताया गया कि फाॅर्म-6 में बदलाव किसने किया, दोनों आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद वह क्यों जारी रहा, मतदाता सूची के केंद्रीय डेटाबेस पर नियंत्रण किस अधिकार से बदला गया और दोनों आयुक्तों की लगातार आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई. चुनाव आयुक्तों ने जो गड़बड़ियां उजागर की हैं, वे उन्हीं आपत्तियों की पुष्टि करती हैं जो वामदलों समेत कई लोग बार-बार उठाते रहे हैं. इन्हें आधी-अधूरी तस्वीर या भीतरी विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा कहकर टाल देना अक्षम्य को बचाने की घटिया लीपापोती है.

याद रहे, ये सवाल विपक्ष या नागरिक समाज ने नहीं उठाए. इन्हें आयोग के भीतर से दो चुनाव आयुक्तों ने रिकाॅर्ड पर उठाया है. जब संवैधानिक संस्था के दो सदस्य दर्ज करें कि महत्वपूर्ण निर्देश उनकी मंजूरी के बिना जारी हुए, तब आंतरिक मतभेद कहकर बच निकलना संभव नहीं है. खास तब, जब वही प्रक्रिया करोड़ों नागरिकों के मतदान के अधिकार को प्रभावित कर रही हो.

अब जवाबदेही का वक्त है. आयोग बताए कि दोनों सदस्यों की आपत्तियों के बावजूद फैसले कैसे लिए गए, राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों और ईआरओ की पहुंच किसने सीमित की, केंद्रीय डेटाबेस में बदलावों की ऑडिट ट्रेल क्या है, दोनों आयुक्तों की शिकायतों पर कैबिनेट सचिवालय ने क्या जवाब दिया. और सबसे अहम, अगर मुख्य चुनाव आयुक्त अपने सहयोगियों की राय दरकिनार कर सकता है, तो संस्थागत नियंत्रण का तंत्र क्या है?

चुनाव आयोग किसी सरकार का विभाग नहीं है. वह जनता के वोट की रक्षा करने वाली संवैधानिक संस्था है. उसकी पहली जिम्मेदारी सरकार बनाना नहीं, जनता के वोट की हिफाजत करना है.

सुप्रीम कोर्ट ने पहले समुचित हस्तक्षेप किया होता तो यह नौबत नहीं आती. अब जब आयोग के भीतर से ही गंभीर सवाल उठे हैं, तो अदालत को सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी नागरिक का नाम मनमाने ढंग से सूची से न हटे. जिन एसआईआर प्रक्रियाओं में कानून और आयोग की सामूहिक प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है, उनकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए. और एसआईआर की प्रक्रिया के बाद हुए चुनावों की वैधता भी रद्द होनी चाहिए. साथ ही मतदाता सूची का ऑडिट होना चाहिए और गलत तरीके से बाहर किए गए हर मतदाता का नाम तुरंत बहाल किया जाना चाहिए.

इन घटनाओं  के आलोक में भाकपा(माले) ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर ये मांगें रखी हैं. ज्ञानेश कुमार के खिलाफ तुरंत महाभियोग चलाया जाए. एसआइआर प्रक्रिया तुरंत रोकी जाए. हर उस मतदाता का अधिकार बहाल हो जिसे गलत तरीके से बाहर किया गया. एसआइआर शुरू होने के बाद हुए चुनाव रद्द होकर संबंधित राज्यों में नए चुनाव हों. और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भावना के अनुरूप संवैधानिक संशोधन हो, ताकि आयोग के कामकाज में निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके.

साथ ही देश भर में 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक विरोध कार्यक्रम आयोजित करने का आह्वान किया गया है. लोकतंत्र की ये लड़ाई अब जनता की है.


26 September, 2026