-- अचिन विनायक
( हिंदुस्तान में नागरिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले संगठनों में ज्यादातर ‘जनहित से सरोकार रखने वाले नागरिक’ शामिल हैं, न कि समाज के सबसे दबे-कुचले तबके के लोग. संविधान से मिले बुनियादी अधिकारों की हिफाजत में इनकी जो भूमिका है, उस पर सत्ताधारी भाजपा की तरफ से लगातार हमले तेज होते जा रहे हैं.)
दुनिया भर में लोकतंत्र कहलाने वाले देशों में भी दक्षिणपंथी और घोर दक्षिणपंथी ताकतों के उभार के साथ, मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठनों पर पहले से कहीं ज्यादा दबाव है. हिंदुस्तान में भी हालात ऐसे ही है, हालांकि हाल में काॅकरोच जनता पार्टी के कटाक्षपूर्ण नाम तले उठे युवाओं के अचानक उभरे आंदोलन की कामयाबी ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरीं और कुछ राहत की सांस दी.
यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में बड़े पैमाने पर हुई धांधली के खिलाफ शुरू हुआ, जिसने छात्रों के भविष्य और रोजगार की संभावनाओं को पटरी से उतार दिया. सत्तासीन भाजपा के कुछ नेताओं को राजनीतिक तौर पर संभलकर चलना पड़ा, क्योंकि इस आंदोलन में शामिल युवाओं की बड़ी तादाद भाजपा-समर्थक परिवारों से थी. इसके बावजूद भाजपा नेताओं ने यह दावा करने से गुरेज नहीं किया कि इस आंदोलन को देशद्रोही ताकतें और गुट भड़का रहे हैं, यानी दिल्ली और हिंदुस्तान के बाकी हिस्सों में इस आंदोलन का साथ देने वाले वामपंथी छात्र और नागरिक अधिकार संगठनों के लोग. अगर यह आंदोलन अपनी मुख्य मांग, यानी सरकारी जवाबदेही, पूरी न करा पाता और जुलाई के आखिर में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा न होता, तो इसमें कोई शक नहीं कि तथाकथित देशद्रोहियों को भारी कीमत चुकानी पड़ती.
यही वजह है कि अंकिता पांडे की हिंदुस्तान के नागरिक अधिकार संगठनों (सीएलजी) पर लिखी नई किताब इस दौर की जरूरत है. उन्होंने अब तक की सबसे मुकम्मल और गहरी पड़ताल हमारे सामने पेश की है, उन संगठनों की, जो न तो राजनीतिक पार्टियों के कब्जे में हैं और न ही राज्य या केंद्र सरकार के अधीन. जिस तरह अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन का इतिहास वहां के अलग-अलग प्रगतिशील सामाजिक आंदोलनों और संघर्षों से गढ़ा गया और वहां के संगठनों को एक खास चरित्र दिया, ठीक वैसे ही आजाद हिंदुस्तान के नागरिक अधिकार संगठनों के चरित्र को समझने के लिए भी यही बात लागू होती है.
‘एलाई एक्टिविज्म’ यानी साथ देने वाला संघर्ष, यह विचार पश्चिम में करीब दो दशकों से ज्यादा वक्त से मौजूद है, लेकिन हिंदुस्तानी समाज विज्ञान के अध्ययनों में इसका इस्तेमाल कम ही हुआ है. यह शब्द हिंदुस्तान के नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के लिए जाना-पहचाना नहीं है. मोटे तौर पर और आम समझ के हिसाब से इसका मतलब ऐसे साधन-संपन्न या अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त तबकों की सक्रियता से है, जो समाज के हाशिए पर मौजूद और कमजोर तबकों के साथ मिलकर आवाज उठाते हैं, भले ही उस मुद्दे में उनका अपना ‘कोई सीधा, निजी या भौतिक हित न जुड़ा हो.’ हिंदुस्तान में नागरिक अधिकार आंदोलनों के औपचारिक स्वरूप को समझने के लिए यह परिभाषा काफी हद तक सही बैठती है. लेकिन इसकी एक खास बात यह भी है कि भारत में नागरिक अधिकार संगठनों की शुरुआत करने वाले और उन्हें खड़ा करने वाले लोग मुख्य रूप से या तो संसदीय राजनीति से बाहर विभिन्न माओवादी पार्टियों व धाराओं से प्रभावित सचेत मार्क्सवादी रहे हैं, या फिर खुद को मध्यममार्गी समाजवादी मानने वाले लोग. बाद वाले इस तबके ने गांधीवादी परंपरा से प्रेरणा ली है, या फिर किसी जमाने में कम्युनिस्ट रहे एम. एन. राॅय के पार्टी-विरोधी विचारों से, जिनके ‘रेडिकल ह्यूमैनिज्म’ (मौलिक मानववाद) ने व्यक्तिगत आजादी, तार्किकता और लोकतांत्रिक सत्ता व शासन के विकेंद्रीकरण को सबसे ऊपर रखा था.
पांडे ने जिस खास तरीके से ‘आवाज बुलंद करने की राजनीति’ यानी ‘पाॅलिटिक्स ऑफ एम्प्लिफिकेशन’ की अवधारणा गढ़ी और उसे लागू किया है, वह इसी हकीकत को जाहिर करता है. चैरिटी और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के उलट, हिंदुस्तान के नागरिक अधिकार संगठन महज सेवा देने वाली संस्थाएं नहीं हैं, जो अक्सर विदेशी फंड देने वालों की मर्जी और पूर्वाग्रहों की मोहताज होती हैं और सत्ता को नाराज न करने की फिक्र में रहती हैं. अपने बूते आर्थिक संसाधन जुटाने वाले स्वैच्छिक संगठन होने के नाते, यह कहा जा सकता है कि भारतीय नागरिक अधिकार संगठनों के पास कहीं ज्यादा राजनीतिक स्वायत्तता है और वे अमेरिका जैसे अन्य देशों के अपने हमरुतबा की तुलना में आम तौर पर ज्यादा वामपंथी रुझान रखते हैं. ये सामाजिक आंदोलनों से अलग हैं, जिनके नेता किसी खास सामाजिक तबके की नुमाइंदगी करते हैं और जिन्हें अपनी मांगें मनवाने के लिए बड़े पैमाने पर लामबंद होना पड़ता है, यानी जितनी बड़ी तादाद और जितना लंबा वक्त, उतना ही बेहतर! आवाज बुलंद करने की यह राजनीति ‘प्रतिनिधित्व की राजनीति’ और सीधे संघर्ष से बिल्कुल अलग है. जैसा पांडे बिल्कुल सही कहती हैं, ‘साथ देने वाला संघर्ष अपनी साख को आगे बढ़ाता है, तादाद को नहीं.’
बहरहाल, भारतीय नागरिक अधिकार संगठनों का वैचारिक जुड़ाव इस बात को जरूर तय करता है कि वे शोषितों और उनके सवालों के साथ किस तरह एकजुटता दिखाते हैं या उनसे कैसे जुड़ते हैं. यही वैचारिकी शायद उन्हें पीड़ित तबकों की मांगों को महज उनके कहने पर उठाने के बजाय, उनकी ओर से पूरी बेबाकी और मजबूती से आवाज उठाने की ताकत देती है. भारतीय नागरिक अधिकार संगठन सामाजिक आंदोलनों के साथ अस्थायी मोर्चे बनाते हैं और मुद्दों के एक बहुत बड़े दायरे में काम करते हैं, क्योंकि उनकी कार्रवाई किसी खास घटना के आधार पर राज्य और पुलिसिया दमन के अलग-अलग रूपों के खिलाफ होती है. फिर भी इन्होंने समाज के भीतर की नाइंसाफियों, जैसे सांप्रदायिक हिंसा और बड़े जमींदारों की जमीन हड़पने की कार्रवाइयों में हुए अत्याचारों पर भी जवाब दिया है.
ढांचा, गठन और विविधता
हिंदुस्तान के नागरिक अधिकार संगठनों के प्रांतीय और राष्ट्रीय स्वरूप असल में 1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक में उभरे. पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश राज्यों के दो शुरुआती क्षेत्रीय संगठनों के सदस्य-कार्यकर्ता बड़ी तादाद में वे नौजवान थे, जो ग्रामीण गरीबों की तरफ से चलाए जा रहे नक्सली आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखते थे. वे इन कार्यकर्ताओं की जेल से रिहाई चाहते थे और चाहते थे कि सरकार उन्हें अपराधी नहीं, बल्कि राजनीतिक बंदी माने.
पांडे की किताब में राज्य स्तर के नागरिक अधिकार संगठनों का तफसील से ब्योरा है, लेकिन इसका मुख्य फोकस, जो बड़े और सम्पूर्णता में आकलन के लिए एक खाका भी मुहैया कराता है, दो राष्ट्रीय संगठनों पर है: पीपुल्स यूनियन फाॅर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) और पीपुल्स यूनियन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर), जिनका मुख्यालय दिल्ली में है. लेखिका ने इन संगठनों के कई कार्यकर्ताओं और पुराने सदस्यों (इन संगठनों की स्थापना पहली बार 1976 में हुई थी) के ढेरों इंटरव्यू लिए हैं और इनके 250 से ज्यादा रिपोर्टों व दस्तावेजों का गहराई से अध्ययन किया है. इसमें आपातकाल का दौर (1975-77) सबसे अहम मोड़ है. यह एक ऐसा निर्णायक मोड़ था, जिसने हिंदुस्तान के उदार जनतांत्रिक व्यवस्था के संवैधानिक वादे की पोल खोलकर रख दी, और जिसने बाद में पीयूसीएल और पीयूडीआर के उभरने में एक बड़ी ताकत का काम किया.
भूमिका और निष्कर्ष के बीच किताब पांच अध्याय हैं, जो सिलसिलेवार तरीके से इन बातों की पड़ताल और आकलन करते हैं:
- (क) नागरिक अधिकार संगठनों की सदस्यता और उनका राजनीतिक सफर;
- (ख) वे राजनीतिक पार्टियों से किस तरह का रिश्ता रखते हैं;
- (ग) उनके काम करने के तौर-तरीके और मुख्य जिम्मेदारियां;
- (घ) इन संगठनों के भीतर और आपस में चलने वाली वैचारिक बहसें, जो इनके बुनियादी काम-काज को गढ़ती हैं; और (ङ) किस तरह ये संगठन ‘जागरूक नागरिकता’ की एक खास संगठित रूप के तौर पर (जैसे चैरिटी, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और एनजीओ जैसे दूसरे रूप भी हैं.) सिविल सोसाइटी की तरफ से सरकार को चुनौती देते हैं.
आखिर नागरिक अधिकार संगठनों के सदस्य कौन हैं? ये ज्यादातर मध्यवर्गीय, ‘इज्जतदार’ पेशों से आते हैं, जैसे वकील, अध्यापक-शोधकर्ता, पत्रकार, समाजसेवी, और कला-मनोरंजन जगत की कभी-कभार आने वाली मशहूर हस्तियां वगैरह. इस बात ने भी अवाम के बीच उनके हस्तक्षेपों को एक खास तरह की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता दी. पुराने और लंबे समय से काम कर रहे नागरिक अधिकार संगठनों के पास, जैसे कुछ क्षेत्रीय संगठनों और जाहिर तौर पर पीयूसीएल और पीयूडीआर के पास कार्यकर्ताओं का एक ऐसा पक्का और नियमित दायरा रहा है, जो उन तदर्थ समूहों से बिल्कुल अलग है जो किसी बड़ी घटना के होने पर अचानक उठ खड़े होते हैं, अपनी रिपोर्ट निकालते हैं और फिर गायब हो जाते हैं. ये कोशिशें भी इस बात का सबूत हैं कि ‘आवाज बुलंद करने की राजनीति’ का दायरा कितना बड़ा और फैला हुआ है.
कई जाने-माने विद्वानों ने इन नागरिक अधिकार संगठनों को ‘गैर-दलीय राजनीतिक मंच’ कहकर परिभाषित किया है, जिसे पांडे ने सही तौर पर आलोचना का निशाना बनाया है, क्योंकि यह समझ इन संगठनों और राजनीतिक पार्टियों के बीच के ज्यादा पेचीदा रिश्ते को नजरअंदाज करती है. पार्टियों के प्रति वफादार बहुत से लोग (जिनमें वामपंथी और धुर-वामपंथी धाराएं, कांग्रेस और गैर-कांग्रेसी विपक्षी दोनों शामिल हैं, मगर सांस्कृतिक तौर पर संकीर्ण और वर्चस्ववादी भाजपा शामिल नहीं) नागरिक अधिकार संगठनों में सक्रिय सदस्य के तौर पर स्वीकार किए गए. लेकिन ज्यादातर मामलों में, प्रक्रिया और तादाद दोनों के लिहाज से उन्हें इतनी गुंजाइश नहीं मिली कि वे इन संगठनों को अपनी पार्टी का मोहरा बना सकें.
फैक्ट-फाइंडिंग की ताकत और एक अहम फर्क
मौके पर जाकर सच्चाई की पड़ताल के लिए फैक्ट-फाइंडिंग अभियान नागरिक अधिकार संगठनों की सबसे मुख्य गतिविधि रही हैं. अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए इन रिपोर्टों को, जैसे कश्मीर में पुलिस की नाजायज हिंसा पर बनी रिपोर्टों को, कानूनी प्रक्रिया की तर्ज पर निष्पक्षता दिखानी पड़ती है, जिसमें चश्मदीदों के बयानों समेत ठोस सुबूतों को जुटाना शामिल होता है. इनका मकसद सरकारी फैसलों और दावों में कमियों और मुमकिन लीपापोती को उजागर करना है. इससे स्थानीय, राज्य और केंद्र स्तर पर सत्तारूढ़ पार्टियों के भीतर और बाहर, दोनों जगह हमदर्दी रखने वालों की मदद के लिए भी गुंजाइश बनती है.
मुख्यधारा का मीडिया अक्सर ऐसी फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्टों के नतीजों पर ही ध्यान टिकाए रखता है, चाहे उन्हें बदनाम करने के लिए या फिर किसी हद तक उनका समर्थन करने के लिए. लेकिन इससे आगे, ऐसी मुहिमों ने आम नागरिकों की गवाहियों को जायज ठहराने में मदद की है, जिन्हें सरकारी अमला नजरअंदाज करता रहा है, क्योंकि उसका उच्च-वर्गीय और सवर्ण जुड़ाव उसे सच को कुचलने के लिए उकसाता है.
नागरिक अधिकार संगठनों के काम को आपातकाल के बाद जन-हित याचिका (पीआईएल) की शुरुआत से भी बड़ी मदद मिली है. इसके जरिए आम नागरिकों और नागरिक समूहों को यह कानूनी अधिकार मिला कि वे गरीबों और वंचितों की तरफ से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाकर सरकारी या वर्चस्ववादी आख्यानों के मुकाबले वैकल्पिक जांच और फैसले की मांग कर सकें. नागरिक अधिकार संघर्ष के इस तरह ‘न्यायिकीकरण’ को देखते हुए, इसमें कोई हैरानी नहीं कि कुछ समर्पित वकील नागरिक अधिकार संगठनों के लिए बिना फीस लिए काम करते हैं, और इस तरह के साथ देने वाले संघर्ष का अहम हिस्सा बनते हैं.
प्रक्रिया और अमल में यह कानूनपरस्ती सभी ऐसे संगठनों में आम है. फिर भी, पीयूसीएल और पीयूडीआर के बीच (और कुछ हद तक बाकी संगठनों के बीच और उनके भीतर भी) एक अहम वैचारिक फर्क बना रहता है, न सिर्फ काम करने की प्रेरणा के स्तर पर, बल्कि उनके बुनियादी राजनीतिक और पैरोकारी के रुख में एक गहरा वैचारिक फर्क मौजूद है. जमीनी तौर पर, कानूनी दायरे में काम करने वाली मध्यममार्गी उदारवादी-वामपंथी धारा का मकसद राज्यसत्ता को इस बात के लिए मजबूर करना है कि वह मौजूदा उदार लोकतांत्रिक संविधान की बेहतरीन मंशा के मुताबिक काम करे. ज्यादा रैडिकल वामपंथी धारा एक व्यापक वैकल्पिक विमर्श खड़ा करना चाहती है, जिसे पांडे ‘विमर्शगत टकराव’ कहती हैं, ताकि जनता को संविधान के दायरे से आगे बढ़कर सामाजिक व्यवस्था के ‘क्रांतिकारी बदलाव’ की जरूरत पर सोचने के लिए तैयार किया जा सके.
स्वाभाविक रूप से, पहली धारा (उदारवादी-वामपंथी) इस बात का कम समर्थन करती है कि शोषक तबकों या राज्य की खुली और ‘संस्थागत’ हिंसा के खिलाफ शोषित लोग या उनके पैरोकार (धुर-वामपंथी संगठन) हथियार उठाएं, यानी वे उनकी हिंसा को जायज ठहराने या उसका बचाव करने से बचते हैं, भले ही उस संगठन ने इस पर कोई खुला एलान न किया हो. अगर इसे आसान शब्दों में समझें, तो अधिकारों के विमर्श में चार बड़े सवाल या बहसें रही हैंः
- अधिकारों की बुनियाद क्या हो: क्या वे पूरी दुनिया के लिए एक जैसे (सार्वभौमिक) हों या स्थानीय संस्कृति के हिसाब से तय हों?
- व्यक्ति के अधिकार बड़े हैं या पूरे समुदाय/समूह के?
- नागरिक और राजनीतिक अधिकारों बनाम आर्थिक और सामाजिक अधिकारों का सवाल: क्या बुनियादी जरूरतों की पर्याप्त और समान पूर्ति, बुनियादी आजादी की समानता जितनी ही महत्वपूर्ण नहीं है, या उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है? और
- अधिकारों के दायरे को कितना बढ़ाया जाए.
असल में इन्हीं आखिरी दो सवालों को लेकर सक्रियता की इन दोनों धाराओं के बीच गहरे मतभेद हैं, भले ही इन्हें आमतौर पर उस रूप में पहचाना या समझा न जाता हो.
निशाने पर ‘जागरूक नागरिक’
अपने आखिर से पहले वाले अध्याय में, पांडे नागरिक अधिकार संगठनों के जरिए निभाए जाने वाले ‘जागरूक नागरिकता’ का जिक्र करती हैं. नए आयामों को सामने लाने के लिए उनकी यह किताब खासी तारीफ की हकदार है. यह पाठकों के भीतर इस बात की गहरी समझ और सम्मान पैदा करेगी कि भारत में जनवादी अधिकारों की हिफाजत करने और समाज के सबसे वंचित तबकों तक इन अधिकारों की पहुंच बनाने में इस तरह की ‘एलाई एक्टिविज्म’ कितनी अहम भूमिका निभाती है.
उनकी किताब छपने के बाद एक और हालिया घटनाक्रम सामने आया है, जिसे उनकी किताब में जगह मिलना जाहिर तौर पर मुमकिन नहीं था. इससे जनतांत्रिक आजादियों पर पहले से हो रहे हमले को और तेज होने का खतरा है. क्योंकि नरेंद्र मोदी की सरकार ने एलान किया है कि कोई एक दस्तावेज या दस्तावेजों का कोई सेट ऐसा नहीं है, जो अपने आप में और बिना शक किसी को हिंदुस्तानी नागरिक साबित करता हो. यहां तक कि पासपोर्ट भी काफी नहीं होगा.
आज की दुनिया में, किसी भी तरह के अधिकार पाने के लिए आपका नागरिक होना पहली शर्त है. नागरिक होने के बाद ही इंसान उन तमाम अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है, जिनका दायरा हर देश के हिसाब से अलग-अलग होता है. लेकिन जब सरकार के पास यह मनमाना अधिकार हो कि वह किसी के नागरिक होने के दर्जे पर ही सवाल उठाए और फैसला करे, तब नागरिक अधिकारों की आवाज उठाने जैसी ‘जागरूक नागरिकता’ की सकारात्मक भूमिका निभाने की ताकत का क्या होगा?
अब तक, अदालत की तरफ से इस सरकारी दावे को खारिज नहीं किया गया है. यह कहना मुश्किल है कि ऐसा होगा भी या नहीं. अब पहले से कहीं ज्यादा, पार्टियों, आंदोलनों और नागरिक अधिकार संगठनों को इस हिंदुत्ववादी और इसलिए असल में देशद्रोही सरकार के खिलाफ मिलकर लड़ना होगा.
(अचिन विनायक एक लेखक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, दिल्ली यूनिवर्सिटी में पूर्व प्रोफेसर रहे हैं, और ट्रांसनेशनल इंस्टीट्यूट, एम्स्टर्डम के दिल्ली स्थित एसोसिएट फेलो हैं. हिंदी अनुवाद – मनमोहन)