-- तनिका सरकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में राष्ट्रीय गीत ‘बंदे मातरम’ (‘मां को नमन’) की 150वीं सालगिरह को एक साल लंबा उत्सव मनाने का ऐलान किया है. इसे सबसे पहले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने एक स्वतंत्र गीत के रूप में लिखा था, और बाद में 1882 में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया
इस विषय पर लिखे अपने एक लंबे लेख में मैंने तर्क दिया है कि भले ही उस समय भी और आज भी ज्यादातर राष्ट्रवादी इस गीत को अपने-आप में एक स्वतंत्र रचना मानते हैं, लेकिन असल में उपन्यास और गीत एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं. उपन्यास के काल्पनिक ढांचे के बिना इस गीत का असली मकसद और अर्थ पूरी तरह सामने नहीं आता.
‘बंदे मातरम’ दरअसल मातृभूमि को एक देवी के रूप में पूजने का गीत है. यह देवी बंकिम की अपनी गढ़ी हुई कल्पना थी, जिसे उन्होंने नए सिरे से रचा. बहुत जल्दी यह देवी हिंदू देवी-देवताओं की दुनिया में एक केंद्रीय स्थान पर पहुंच गई. 1920 के दशक में जब जवाहरलाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के किसानों को यह समझाने की कोशिश की कि असली देश वे खुद हैं, तो किसानों ने इस बात का मजाक उड़ाया. उनका कहना था कि देश तो एक देवी है. गीत में पंक्ति थी – “तेरी ही मूरत हम मंदिरों में पूजते हैं”, और ये शब्द बहुत जल्दी हकीकत बन गए.
उपन्यास की कहानी हमें अठारहवीं सदी के आखिरी दौर में ले जाती है, जब बंगाल भयानक अकाल से तबाह हो चुका था. उस समय बंगाल पर एक कठपुतली नवाब का शासन था, जिसे लुटेरी ईस्ट इंडिया कंपनी का पूरा समर्थन हासिल था. कंपनी के अपने अफसरों के मुताबिक, बार-बार फसलें चौपट होने के बावजूद कंपनी ने किसानों से बेरहमी से लगान और सरप्लस वसूला, जिससे अकाल टालना नामुमकिन हो गया. लेकिन बंकिम ने इस तबाही की पूरी जिम्मेदारी मुस्लिम नवाब पर डाल दी. इतना ही नहीं, इस आरोप को आगे बढ़ाकर उन्होंने मुसलमानों को जन्मजात तौर पर बुरा और हिंसक दिखाने की एक डरावनी तस्वीर पेश की
उस दौर में एक तरफ नवाब और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाएं थीं, और दूसरी तरफ हथियारबंद हिंदू संन्यासी और मुस्लिम फकीर. इन टकरावों में फकीरों के विद्रोह भी शामिल थे. लेकिन बंकिम ने जानबूझकर फकीर विद्रोहों को अपनी कहानी से बाहर कर दिया.
‘ऊंची’ जातियों के संन्यासियों का एक कल्पित गिरोह हिंदू गांव वालों को मुसलमानों की हत्या के लिए उकसाता है. ये दल हिंदू ग्रामीणों को भड़काता है कि वे मुसलमानों की हत्या करें, उनकी झोपड़ियों को लूटें, उनकी मस्जिदों को तोड़ें, उनकी औरतों को बंदी बनाएं और मृतकों के चेहरों को पैरों से रौंदें. युद्ध के दौरान ये संन्यासी जाति की ऊंच-नीच को कुछ समय के लिए स्थगित कर देते हैं, लेकिन जीत के बाद उसे फिर से बहाल करने का वादा करते हैं. अंग्रेज इस कहानी में तुलनात्मक रूप से छोटे खिलाड़ी हैं. उपन्यास के आखिरी संस्करण का अंत अंग्रेजों की जीत के साथ होता है. वहां एक अदृश्य आवाज विद्रोही नेता को दिलासा देती है कि अभी अंग्रेजों को मिटाने का समय नहीं आया है. पहले हिंदुओं को उनकी चालाकियां और हुनर सीखने होंगे. इसके उलट, मुसलमानों के खिलाफ खून-खराबा देवी द्वारा आदेशित सबसे बड़ा पवित्र कर्तव्य बताया गया है
मातृभूमि की देवी तीन देवियों – जगद्धात्री, काली और दुर्गा – का मिला-जुला रूप है, जो क्रमशः उसके बीते हुए वैभव, मौजूदा अपमान और भविष्य की महिमा की प्रतीक हैं, जब उसके बेटे दुश्मन को कुचल देंगे. गीत की शुरुआत पहले दो बंदों में बड़ी कोमलता और स्नेह से होती है, जहां भरपूर और शांत धरती का स्मरण संस्कृत के मुलायम और मधुर शब्दों में किया गया है. लेकिन जल्दी ही यह तलवारों की खनक में बदल जाता है, दुश्मन के विनाश का ऐलान करती गरजती आवाजों में ढल जाता है. धरती अब राक्षस-वध करने वाली देवी का रूप ले लेती है, जिसके दसों हाथों में घातक हथियार हैं. अब ध्वनियां भी कठोर, तीखी और झनझनाती हुई हो जाती हैं, जैसा कि एक युद्ध-घोष के लिए उचित है. कविता और गद्य – दोनों में – बंकिम की शब्दों पर बेजोड़ महारत झलकती है, और उनकी सघन ऊर्जा व जोशीली बयानबाजी पाठकों को बांध लेती है
इस गीत ने अलग-अलग दौर में अलग-अलग राजनीतिक ठिकाने पाए हैं. कांग्रेस ने इसे औपनिवेशिक शासन के खिलाफ आंदोलनों में नारे के रूप में इस्तेमाल किया, जबकि हिंदू राष्ट्रवादियों ने साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान इसका जाप किया. बंकिम के जीवनकाल में ही मुस्लिम आलोचकों ने उपन्यास और इस गीत को बेहद परेशान करने वाला पाया. उनकी आपत्तियां दो तरह की थीं. पहली, यह रचना गैर-हिंदुओं – खासकर मुसलमानों – को राष्ट्रवादी दायरे से लगभग बाहर कर देती है. इस्लाम में ईश्वर को इंसानी रूप में गढ़ने की सख्त मनाही है, इसलिए मुसलमानों को देशभक्ति के इस समुदाय से बाहर रहने के लिए मजबूर किया जाता है; वे इस ‘राष्ट्र’ का हिस्सा नहीं बन पाते. दूसरी ओर, देवी स्वयं युद्ध का आदेश देती है. इस कारण पूरा पाठ – उपन्यास और गीत – मुसलमानों के लिए गहरे तौर पर डरावना बन जाता है; ऊपर से उपन्यास में उन पर लगाए गए अपमानजनक आरोप उनकी पीड़ा को और बढ़ा देते हैं.
कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमंडलों का रिकॉर्ड हमेशा बेदाग नहीं रहा. जैसे-जैसे यह हकीकत सामने आई, मुसलमानों की बेचैनी बढ़ती गई. केंद्रीय प्रांतों में कांग्रेस सरकार ने अपने सरकारी स्कूलों में ‘बंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य कर दिया, यहां तक कि मुस्लिम छात्रों के लिए भी.
1930 के दशक में मुस्लिम लीग ने इस पर कड़ी आपत्तियां जतानी शुरू कर दीं. मशहूर बंगाली कवि जसीमुद्दीन ने भी रवींद्रनाथ टैगोर से अपनी गहरी पीड़ा जाहिर की. टैगोर ने 1894 में एक कांग्रेस अधिवेशन में ‘बंदे मातरम’ गाया था, जहां यह व्यवहार में राष्ट्रीय गीत की तरह स्थापित हो गया. लेकिन उसी समय उन्होंने इसके साम्प्रदायिक खतरे की ओर भी ध्यान दिलाया. अपने उपन्यास ‘घरे-बाइरे’ (1915) में टैगोर ने साफ कहा कि देश दरअसल जमीन और लोगों से मिलकर बनता है; उसे देवी के रूप में गढ़ना एक रहस्यमय और भ्रम पैदा करने वाली अमूर्तता है.
1915 में इस गीत ने गांधी को प्रेरित किया था, लेकिन 1946-47 की साम्प्रदायिक हिंसा के बाद 1947 में गांधी ने अपनी उस सराहना को वापस ले लिया. नेहरू ने 1937 में आनंदमठ पढ़ना शुरू किया और जैसे-जैसे वे परेशान होते गए, उन्होंने टैगोर से पूछा कि इस गीत और उपन्यास की क्या है सियत होनी चाहिए. टैगोर ने सलाह दी कि चूंकि पहले दो बंद सिर्फ देश की खूबसूरती की प्रशंसा करते हैं, इसलिए उन्हें कांग्रेस के अधिवेशनों में गाया जा सकता है, लेकिन बाकी हिस्सों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. आखिरकार 1951 में संविधान सभा ने ‘बंदे मातरम’ के उन्हीं दो बंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में बनाए रखा, जबकि टैगोर के ही ‘जन गण मन’ को – उनके निधन के काफी बाद – राष्ट्रीय गान का दर्जा दिया गया.
स्पष्ट है कि बदले हुए हालात ने गांधी और नेहरू के नजरिए को भी बदल दिया था. जब उन्होंने गीत के साथ-साथ उपन्यास को पढ़ा, तो उन्हें इसके भीतर छिपी साम्प्रदायिक आशंकाएं साफ दिखाई देने लगीं. लेकिन एक हालिया लेख में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता राम माधव इन बदलावों के पीछे मुस्लिम हाथ देखते हैं. उनका शक है कि कांग्रेस नेताओं ने 1937 के चुनावों में मुस्लिम वोट पाने के लिए मौकापरस्ताना ढंग से अपना रुख बदला. वे कांग्रेस की प्रतिक्रिया को साम्प्रदायिक करार देते हैं, जबकि जिस उपन्यास में यह गीत शामिल है, उसके भीतर मौजूद खुले और कट्टर साम्प्रदायिक अंशों पर वे पूरी तरह खामोश रहते हैं.
भाजपा का हालिया फैसला कि इस गीत को बड़े-बड़े आयोजनों के साथ मनाया जाए, बिल्कुल स्वाभाविक है. धार्मिक और साम्प्रदायिक जुनून को एक-दूसरे में मिलाकर, और उसे ‘सच्ची देशभक्ति’ के रूप में पेश करते हुए, यह गीत काफी हद तक संघ परिवार के एजेंडे का पहले से ही खाका खींच देता है.
इतना ही नहीं, यह गीत और उपन्यास देवी-भक्त के पारंपरिक रिश्ते को भी उलट देते हैं, जहां आम तौर पर पवित्र प्रेरणा देवी से भक्त तक जाती है. यहां उलटा होता है – देवी के बेटे उसकी खोई हुई महिमा को बहाल करने के लिए युद्ध पर जाते हैं. यानी देवता को बचाने वाले उसके भक्त बन जाते हैं, न कि देवता भक्तों का रक्षक. यह बात ‘हिंदुत्व’ की सोच से गहरे तौर पर मेल खाती है, जहां राम के भक्तों को उनका जन्मस्थान ‘लौटाने’ का दायित्व सौंपा जाता है.
लेकिन बंकिम का दिमाग काफी जटिल था और आनंदमठ साम्प्रदायिक इतिहास पर उनका आखिरी शब्द नहीं था. उनका अंतिम उपन्यास सीताराम एक ऐसे हिंदू राज्य की कल्पना करता है, जिसे एक वीर और आदर्शवादी राजा स्थापित करता है और अपने मुस्लिम दुश्मनों को हराता है. लेकिन आगे चलकर वही राजा उन तमाम बुराइयों का प्रतीक बन जाता है – बल्कि उनसे भी आगे निकल जाता है – जो आम तौर पर मुसलमानों के सिर मढ़ी जाती रही हैं. उसके हिंदू साथी भी उसे छोड़ देते हैं. आखिर में एक निर्मल-हृदय फकीर उसे छोड़ते हुए दुख के साथ कहता है कि अब हिंदू राज्य में रहना संभव नहीं रह गया है.