इधर पिछले कुछ वर्षों में भारत का अन्न भंडारण अब भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के हाथ से निकलकर देश के बड़े कारपोरेट समूहों के हाथों में खिसकता जा रहा है. मोदी सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए तय देश की 60 लाख मेट्रिक टन (LMT) अनाज भंडारण क्षमता में से 45.5 लाख मेट्रिक टन अनाज के भंडारण का ठेका 30 वर्ष के लिए देश की दो बड़ी कारपोरेट कंपनियों को दे दिया है. इनमें सबसे बड़ा हिस्सा मोदी राज के ‘राष्ट्रीय सेठ’ अडानी की कम्पनी का है. एफसीआई की ‘हब एंड स्पोक’ साइलो योजना के तहत दो चरणों में नीलामी की योजना लाई गयी. मोदी सरकार के नीति आयोग की मेहरबानी से ‘अडानी एग्री लाॅजिस्टिक्स लिमिटेड (AAL)’ और ‘लीप इंडिया फूड एंड लाॅजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड (LIFL)’ ने मिलकर 134 में से 110 साइलो अनुबंध हासिल कर लिए. दो चरण में हुए इन टेंडर में पहले चरण में 80 साइलो के लिए बोली लगी, इनमें से 70 अकेले अडानी ग्रुप की कम्पनी को मिले. कुल 11,915 करोड़ रूपये की इस नीलामी में अडानी समूह की कम्पनी का हिस्सा 87.5 प्रतिशत यानी 9,713 करोड़ रूपये था. अदानी के ये साइलो पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश और जम्मू कश्मीर में हैं.
दूसरे नम्बर पर रही लीप इंडिया यानी (LIFL) को 40 साइलो का अनुबंध मिला. कुल 20,000 करोड़ रूपये की इस योजना में से इन दो कम्पनियों को मिला हिस्सा 16,500 करोड़ रुपये से अधिक है. जबकि एफसीआई ने खुद एक एकाधिकार विरोधी नियम प्रस्तावित किया था. जिसके तहत एक बिडर/कंपनी को एक ही बंडल/प्रोजेक्ट तक सीमित रखने का प्रावधान था, ताकि कोई एक कंपनी पूरी योजना पर हावी न हो सके. एफसीआई ने एक प्रोजक्ट को 800 से 1000 करोड़ तक ही सीमित किया था. एफसीआई द्वारा प्रस्तावित इस नियम के तहत पहले चरण में जीतने वाले दूसरे चरण में फिर से आवेदन कर सकते थे. इस नियम का उद्देश्य किसी एक कम्पनी के एकाधिकार को रोकना, कई वेंडर्स को काम देना, जोखिम कम करना और छोटे/मध्यम प्लेयर्स को मौका देना था. मगर 2022 में पीपीपीएसी (Public Private Partnership Appraisal Committee) की बैठक में, जिसमें नीति आयोग, डीईए (Department of Economic Affairs) आदि की भागीदारी भी थी, एफसीआई द्वारा बनाए गए इस नियम को हटा दिया गया.
नीति आयोग और डीईए का तर्क था कि भंडारण की भारी कमी (240 LMT गैप) है, इसलिए बड़े खिलाड़ियों को बिना रोक-टोक के काम करने दो और बाजार की ताकतें काम करें इसके लिए बड़े बंडल्स (800-1000 करोड रूपये से अधिक) बनाओ, ताकि इस काम में योग्य कंपनियां (राष्ट्रीय सेठ) आएं. इसके बाद बड़े बंडल्स, जिनमें कुछ 3900 करोड़ रूपये तक भी थे, बनाए गए. नीति आयोग और डीईए द्वारा योजना में लाया गया यह बदलाव केवल बड़ी कंपनियों खासकर अडानी समूह के लिए ही था. इस अनुबंध में निजी कंपनियां अपनी इक्विटी पर 15 प्रतिशत का रिटर्न कमाएंगी. जबकि बैंक से लिए गए कर्ज की लागत लगभग 9 प्रतिशत होगी. सीएजी ने चेतावनी दी थी कि इस बड़े अंतर से सरकार पर लंबे समय तक आर्थिक बोझ पड़ेगा. उसने इक्विटी रिटर्न को घटाकर 11 प्रतिशत करने की सिफारिश की थी, जिसपर नीति आयोग और डीईए ने बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया. यह बढ़ा-चढ़ा कर तय किया गया गारंटीशुदा रिटर्न है, जिनका भुगतान एफसीआई द्वारा तीन दशकों तक किया जाएगा. यह सत्ता के चहेते कारपोरेट घरानों को वह सार्वजनिक निधियां लुटाना है, जिनका इस्तेमाल MSP बढ़ाने और ग्रामीण बुनियादी ढांचा विकसित करने में होना चाहिए था.
विश्व व्यापार संगठन की शर्तों को लागू करने की प्रक्रिया में ‘निजी उद्यमी गारंटी योजना’ (PEG स्कीम) को सन् 2000 में एनडीए की अटल सरकार लाई थी. बताया गया कि एफसीआई के पास कम आर्थिक संसाधन होने के चलते अनाज खुले में ही रह जाता है, इसके कारण बारिश और चूहों से अनाज का भारी नुकसान होता है. इस नुकसान को रोकने और अनाज के बेहतर रख रखाव के लिए निजी क्षेत्र की कम्पनियों को इस क्षेत्र में मौका दिया जाये. इसे ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप’ (पीपीपी) के तहत शुरू किया गया. इसके बाद यूपीए सरकार से 2005 में अडानी ग्रुप को इस योजना के तहत कुछ स्टोरेज प्रोजेक्ट मिल गए. 2024-25 आते-आते तक 20 राज्यों में 152 लाख मीट्रिक टन (LMT) क्षमता के निजी साइलो गोदाम स्वीकृत हो चुके थे, जिसमें से 147 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा क्षमता के साइलो बनकर तैयार हो चुके हैं. पीपीपी माॅडल के तहत प्राइवेट कंपनियां इन साइलो को बनाती हैं, फाइनेंस करती हैं, उन्हें चलाती हैं और 30 साल तक उनकी व्यवस्था देखती हैं, एफसीआई भूमि उपलब्ध कराता है. कई जगह सम्बन्धित कंपनी खुद भी भूमि की व्यवस्था करती हैं.
कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय निगमों के हित में लाए गए ‘तीन कृषि कानूनों’ के खिलाफ 2020-21 में हुए 13 माह के ऐतिहासिक दिल्ली घेराव किसान आन्दोलन के दबाव में मोदी सरकार को उन कानूनों को वापस लेना पड़ा था. पर उसके बाद मोदी सरकार किस्तों में भारत की खेती और खाद्य सुरक्षा पर कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे की नीतियों को परदे के पीछे से लागू करती जा रही है. पहले मोदी सरकार कृषि व्यापार (विपणन) नीति फ्रेमवर्क लाई, इसके तहत कृषि व्यापार और विपणन व्यवस्था के लिए अब तक बनी सरकारी कृषि मंडियों के निजीकरण और इन मंडियों के समानांतर निजी मंडियों की व्यवस्था लाने का प्रावधान रखा गया. उसके बाद मोदी सरकार बीज विधेयक 2025 लेकर आ गयी. पहले से ही भारत के बीज बाजार के लगभग 75 प्रतिशत हिस्से पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की इजारेदारी कायम हो चुकी है. इस नए बिल में किसानों द्वारा अब तक बचाए गए अपने बाकी परम्परागत बीजों के उत्पादन और उसके विपणन पर प्रतिबन्ध लगाने के प्रावधान हैं ताकि भारत के पूरे बीज बाजार पर बहुराष्ट्रीय और कारपोरेट कम्पनियों का एकाधिकार हो सके.
इधर अमेरिका के साथ हो रहे व्यापार समझौते के साथ ही ब्रिटेन व अन्य कई देशों के साथ हुए हाल के व्यापार समझौतों में कृषि, कुक्कड़ और दुग्ध उत्पादों को शामिल करना भारत की खेती-किसानी पर अब तक का सबसे बड़ा हमला है. इन व्यापार समझौतों के बाद भारी सब्सिडी पाने वाले अमेरिका और यूरोप के किसानों के सस्ते उत्पाद भारत के बाजार में आ जाएंगे. यही नहीं, अमेरिका में उत्पादित जीएम उत्पाद और उनसे बनी अन्य वस्तुएं जैसे पशु और कुक्कड़ आहार, दुग्ध उत्पाद तथा खाद्य तेल भारत के नागरिकों और पशुओं के स्वास्थ्य व अनुवांशिकी के लिए भारी खतरा पैदा कर देंगे. इन सस्ते उत्पादों के आगे बढ़ती उत्पादन लागत की मार के चलते पहले से ही घाटे की खेती के लिए मजबूर भारत के किसान कहीं भी नहीं टिक पाएंगे. दूसरी तरफ एफसीआई जैसे बड़े सार्वजनिक भंडारण संस्थानों को धीरे-धीरे खत्म कर देश के अन्न भंडारण को निजी हाथों में सौंपने की राह पर मोदी सरकार तेजी से बढ़ रही है. यह कार्यवाहियां भविष्य में एमएसपी पर फसलों की खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये देश के गरीबों की खाद्य सुरक्षा पर बड़ा हमला साबित होंगी. ऐसे में खेती से तौबा करने और अपनी जमीनों को कारपोरेट के हाथों सौंपने के अलावा भारत के गरीब और माध्यम किसानों के लिए कोई और रास्ता नहीं बचेगा.