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हमें दूसरी आजादी की लड़ाई की जरूरत है: दीपंकर भट्टाचार्य

हमें दूसरी आजादी की लड़ाई की जरूरत है: दीपंकर भट्टाचार्य

[ केरल में लगातार दो कार्यकाल तक सत्ता में रहने के बाद वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) की हार के साथ भारत में कई दशकों बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी भी राज्य में वामपंथी दलों की सरकार नहीं है. ‘फ्रंटलाइन’ को दिए एक इंटरव्यू में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों, वामपंथ के कमजोर पड़ने के असर, दक्षिणपंथ के उभार और धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक भारत के हित में वामपंथ के पुनरुत्थान की जरूरत पर खुलकर बात की.

दीपंकर भट्टाचार्य वामपंथ के कमजोर होने को लेकर चिंतित थे, लेकिन उससे भी ज्यादा उन्होंने चुनावी नतीजों के व्यापक राजनीतिक असर और फासीवाद-विरोधी प्रतिरोध में वामपंथ की भूमिका पर और भी जोर दिया. उन्होंने यह भी कहा कि 4 मई के नतीजों के बाद भाजपा-विरोधी सभी ताकतों के बीच एकता, सहयोग और समन्वय के सबसे व्यापक मंच के रूप में इंडिया गठबंधन की जरूरत और बढ़ गई है. यहां प्रस्तुत है इस इंटरव्यू के प्रमुख अंश: संपादक ]

सवाल: आप चुनावी नतीजों को समग्र रूप से कैसे देखते हैं, और खासकर वामपंथ के प्रदर्शन को? कई दशकों में पहली बार आज किसी भी राज्य में वामपंथ की सरकार नहीं है.

दीपंकर भट्टाचार्य: बेशक, वामपंथ को अपने चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा करनी होगी, लेकिन उससे भी बड़ी चिंता पूरे चुनावी नतीजों को लेकर होनी चाहिए. असम और पश्चिम बंगाल में भाजपा की भारी जीत, तथा भाजपा-विरोधी खेमे की दो प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों – द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) और तृणमूल कांग्रेस – की हार ने राजनीतिक संतुलन को भाजपा के पक्ष में और निर्णायक रूप से झुका दिया है.

अब और अधिक हौसलाअफजाई से भरी मोदी सरकार तथा संघ परिवार की ताकतें सत्ता के और अधिक केंद्रीकरण तथा देश की संपत्ति को गिने-चुने काॅरपोरेट घरानों के हाथों में और अधिक समेटने के अपने अभियान को तेज और आक्रामक रूप से आगे बढ़ाएंगी.

सवाल: वामपंथ के कमजोर पड़ने के इस दौर में प्रगतिशील ताकतों के सामने कौन-सी खास चुनौतियां हैं?

दीपंकर भट्टाचार्य: जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए, उनमें सिर्फ केरल में वामपंथ सत्ता में था. दस साल तक सरकार में रहने के बाद एलडीएफ की हार की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन हार का इतना बड़ा अंतर निश्चित रूप से चिंता की बात है.

पश्चिम बंगाल में, सिंगूर भूमि अधिग्रहण के दौर के बाद से सीपीएम ने कोई सबक सीखने और जरूरी सुधारात्मक कदम उठाने से इनकार किया है, इसलिए उसका गिरावट का सिलसिला अब तक नहीं रुका है.

मुझे उम्मीद है कि केरल में सीपीएम और वामपंथ की अन्य धाराएं ईमानदारी से आत्ममंथन करेंगी और अपनी दिशा में जरूरी सुधार लाएंगी.

दस साल पहले पश्चिम बंगाल में भाजपा के पास सिर्फ तीन सीटें और बहुत कम वोट थे. आज केरल में भाजपा लगभग उसी तरह की हालत में पहुंच चुकी है. मुझे भरोसा है कि केरल की प्रगतिशील ताकतें इससे सबक लेंगी और राज्य को पश्चिम बंगाल वाले रास्ते पर जाने से बचाएंगी.

सवाल: पूरे भारत में वामपंथ के असमान विकास के क्या कारण हैं?

दीपंकर भट्टाचार्य: ऐतिहासिक रूप से भारत में वामपंथ देश के उपनिवेश-विरोधी आजादी आंदोलन के एक अभिन्न हिस्से के रूप में उभरा. सामाजिक समानता और वैज्ञानिक-तार्किक चेतना की तलाश, सामंती व्यवस्था के खिलाफ जुझारू किसान संघर्ष, पूंजीवादी शोषण के खिलाफ उभरते मजदूर आंदोलनों और रियासती राज्यों के निरंकुश शासकों के खिलाफ जनविद्रोहों ने वामपंथ को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

उत्तर भारत की रूढ़िवादी सामंती-पितृसत्तात्मक जमीन आम तौर पर वामपंथी विचारधारा के विकास के प्रति कम ग्रहणशील या अधिक शत्रुतापूर्ण रही है. समय के साथ इसे एक तरह का स्थायी पैटर्न मान लिया गया. लेकिन जब हर स्थापित पैटर्न बदल सकता है, तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि जिन राज्यों में अब तक वामपंथ की मौजूदगी काफी हाशिये पर रही है, वहां वह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक धारा के रूप में न पनप सके.

सवाल: चुनावी राजनीति में धनबल और बड़े संसाधनों के बेजा असर का मुकाबला वामपंथ कैसे कर सकता है?

दीपंकर भट्टाचार्य: वामपंथ बड़ी पूंजी और बड़े मीडिया की शातिर पकड़ का मुकाबला केवल जनता की ताकत को संगठित करके और वैकल्पिक मीडिया की संभावनाओं का पूरा इस्तेमाल करके ही कर सकता है. जनसंचार और जनसंगठन के हर उपलब्ध माध्यम का अधिकतम उपयोग करना होगा.

हमें आजादी के साथ संविधान और संसदीय लोकतंत्र भी विरासत में मिले थे. आज जब फासीवाद हमारी लोकतांत्रिक उपलब्धियों और संस्थाओं को भीतर से खोखला करने पर आमादा है, तब हमें एक दूसरी आजादी की लड़ाई से कम किसी चीज की जरूरत नहीं है. ऐसी लड़ाई, जो जनता के लिए और अधिक अधिकार हासिल करे और हमारे जनतंत्र को ज्यादा मजबूत, भागीदारीपूर्ण और समतावादी बनाए. वामपंथ को इस फासीवाद-विरोधी एजेंडे का नेतृत्व करना होगा – विचार के स्तर पर भी और पहल के स्तर पर भी.

सवाल: तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता के लिए हाथ बढ़ाए. लेकिन पश्चिम बंगाल में वामपंथ और कांग्रेस ने तृणमूल के साथ अपने तनावपूर्ण रिश्तों के कारण उस पहल को ठुकरा दिया. क्या आपको लगता है कि सीट-बंटवारे और वोट-ट्रांसफर के उलझे सवालों को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एक एकजुट मोर्चा संभव है?

दीपंकर भट्टाचार्य: अखिल भारतीय स्तर पर तृणमूल कांग्रेस इंडिया गठबंधन का हिस्सा रही है और आज भी है. इसका प्रमाण हाल ही में संसद के विशेष सत्र में देखने को मिला, जब पूरे विपक्ष ने एकजुट होकर खतरनाक परिसीमन विधेयक के खिलाफ मतदान किया.

हालांकि पश्चिम बंगाल में, जहां तृणमूल पिछले 15 सालों से सत्ता में है, राज्य के भीतर भाजपा के खिलाफ कोई एकजुट विपक्ष नहीं था क्योंकि वाम और कांग्रेस को भ्रष्टाचार और कुशासन के दूसरे पहलुओं जैसे मुद्दों पर तृणमूल का भी विरोध करना था.

केरल और पंजाब जैसे राज्यों में भी इंडिया गठबंधन के घटकों के बीच राज्य स्तर पर कोई समन्वय नहीं रहा है. तमिलनाडु में भी राजनीतिक समीकरणों में कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

भारत की विविध और जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में ऐसे तनाव लगभग अपरिहार्य हैं. लेकिन पश्चिम बंगाल की बदली हुई राजनीतिक स्थिति में भाजपा-विरोधी विभिन्न विपक्षी ताकतों के बीच संबंध समय के साथ नए सिरे से परिभाषित होंगे. बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि तृणमूल कांग्रेस इस नई परिस्थिति में खुद को किस तरह पुनर्गठित और पुनर्परिभाषित करती है.

सवाल: कुछ लोग इंडिया गठबंधन का मृत्युलेख लिख रहे हैं, खासकर इसलिए कि इसके घटक दल अब कई राज्यों में सत्ता से बाहर हो गए हैं. क्या यह आकलन सही है?

दीपंकर भट्टाचार्य: इंडिया गठबंधन आज की राजनीतिक परिस्थितियों की उपज है, जहां सत्तारूढ़ भाजपा भारत को विपक्ष-मुक्त एकदलीय राज्य में बदलने पर आमादा है. इंडिया गठबंधन का उभार जमीन पर चले शक्तिशाली जन आंदोलनों की बदौलत संभव हुआ. उदाहरण के तौर पर, रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या और जेएनयू सहित अन्य विश्वविद्यालयों पर हमलों के खिलाफ छात्रों का उभार, विभाजनकारी और भेदभावपूर्ण नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ समान नागरिकता के लिए ऐतिहासिक जन लामबंदी, तथा कृषि पर काॅरपोरेट कब्जे की कोशिशों के खिलाफ किसानों का जबर्दस्त आंदोलन – बस तीन उदाहरण ले लीजिए.

चुनावी धांधली और मतदाता सूचियों के शुद्धीकरण के नाम पर देशभर में चल रहे लोकतंत्र-विरोधी अभियानों, अमेरिका-इजराइल धुरी के सामने सरकार के घुटने टेकने, और गहराते आर्थिक संकट के बाद यह राजनीतिक संदर्भ और भी अधिक तीखा और जरूरी हो गया है. यही संकट अब भारत को उस स्थिति की ओर धकेल रहा है जिसे मोदी स्वयं ‘आपदाओं का दशक’ कह रहे हैं.

इंडिया गठबंधन में शामिल सभी वैचारिक धाराओं और राजनीतिक दलों को इस चुनौती का जवाब देना होगा. कांग्रेस, गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते और देशव्यापी उपस्थिति रखने के कारण, स्वाभाविक रूप से इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभाएगी.

क्षेत्रीय दलों के अंत की भविष्यवाणी करना या कांग्रेस के किसी भव्य पुनरुत्थान का सपना देखना – दोनों ही समय से पहले की बातें होंगी. एकदलीय वर्चस्व का जवाब एक तरफ बहुदलीय जनतंत्र और संघीय ढांचे की जोशीली दावेदारी के रूप में आना होगा, तो वहीं दूसरी ओर भारत के राष्ट्रवाद की साम्राज्यवाद-विरोधी और समावेशी मूल भावना को एक नए जन-जागरण के रूप में.

सवाल: सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के उभार को आप कैसे देखते हैं? तमिलनाडु में इस पार्टी ने प्रभावी रूप से डीएमके-नेतृत्व वाले धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन को हाशिए पर पहुंचा दिया है, जिसमें वामपंथ भी शामिल था.

दीपंकर भट्टाचार्य: तमिलनाडु में टीवीके के जबर्दस्त उभार ने राज्य के सुस्थापित राजनीतिक ढांचे में एक बड़ी दरार डाल दी है. भाजपा निश्चित रूप से इस बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में अपने लिए एक बड़ा अवसर देख रही होगी. वामपंथ को इस दौर में बेहद सावधानी और सूझबूझ के साथ आगे बढ़ना होगा ताकि तमिलनाडु हमारे गणतंत्र के धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और संघीय चरित्र के सबसे मजबूत गढ़ों में बना रहे.

लेकिन भारत के लोकतंत्र और वामपंथ के लिए सबसे गंभीर और विनाशकारी निहितार्थ असम और पश्चिम बंगाल में भाजपा के अभूतपूर्व चुनावी उभार से जुड़े हैं. असम में परिसीमन और पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने भाजपा की भारी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसके साथ ही चुनाव आयोग की खुली पक्षधरता और चुनावों के दौरान बनाया गया सैन्यीकृत माहौल भी इस नतीजे के बड़े कारण रहे हैं.

जब लोकतंत्र की पहले से ही कमजोर संस्थाएं फासीवाद के मजबूत होते जाने और बढ़ते हमले का मुकाबला करने में असमर्थ साबित हो रही हैं, तब कम्युनिस्टों और सभी फासीवाद-विरोधी ताकतों को जनता की ताकत पर भरोसा करना होगा और फासीवादी हमले का प्रतिरोध करने के लिए भारत की प्रगतिशील जनतांत्रिक विरासत का आह्वान करना होगा.

जनता के साथ और गहरा जुड़ाव, उनके रोजमर्रा के जीवन, आजीविका और सम्मान से जुड़े संघर्षों पर अधिक ध्यान, और तमाम लड़ाकू ताकतों की व्यापक एकता ही आगे का एकमात्र रास्ता है.

भारत की आजादी की लड़ाई में और स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र के विस्तार तथा जनता के अधिकारों को गहरा करने की प्रक्रिया में वामपंथ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. आज फासीवाद-विरोधी प्रतिरोध के इस दौर में वामपंथ को स्वयं को फिर से जीवंत और पुनर्गठित करना होगा.

सवाल: तमिलनाडु में कांग्रेस के डीएमके-नेतृत्व वाले गठबंधन से अलग होने के बाद यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि इंडिया गठबंधन बिखरने की ओर बढ़ रहा है. क्या आप इससे सहमत हैं?

दीपंकर भट्टाचार्य: इंडिया गठबंधन एक ऐसा व्यापक एकता मंच बनकर उभरा था, जिसमें वे दल भी शामिल थे जो कुछ राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति करते थे. पश्चिम बंगाल में अब राजनीतिक उद्देश्य और रणनीति को लेकर अधिक स्पष्टता और समानता दिखाई दे सकती है, जबकि तमिलनाडु में भाजपा-विरोधी खेमे के भीतर कुछ तनाव मौजूद हैं. लेकिन 4 मई के चुनावी नतीजों के बाद भाजपा-विरोधी सभी ताकतों के बीच एकता, सहयोग और समन्वय के सबसे व्यापक मंच के रूप में इंडिया गठबंधन की जरूरत पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है.

कांग्रेस न केवल इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा घटक है, बल्कि इस गठबंधन से सबसे अधिक राजनीतिक लाभ पाने वाली पार्टी भी रही है. इसलिए उसकी जिम्मेदारी है कि वह इस गठबंधन को आगे बढ़ाने में लगातार प्रतिबद्ध, जिम्मेदार और सक्रिय भूमिका निभाए.

06 June, 2026