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एसआइआर, चुनाव आयोग और संकटों में घिरा भारत का लोकतंत्र

एसआइआर, चुनाव आयोग और संकटों में घिरा भारत का लोकतंत्र

असहमति जताने, सवाल उठाने और विरोध दर्ज करने की आजादी ही लोकतंत्र की जान है. जब किसी गणतंत्र में असहमति की आवाजों को दबाया जाता है और विरोध का दायरा सिमटता जाता है, तो लोकतंत्र का दम घुटने लगता है. और जब लोग इन पाबंदियों को तोड़कर अपनी आवाज बुलंद करते हैं, तो वे लोकतंत्र को नई जिंदगी देते हैं. जून और जुलाई के महीनों में दिल्ली का जंतर-मंतर विरोध और लोकतंत्र के उत्सव में तब्दील हो गया था. लेकिन अब जंतर-मंतर पर बैरिकेड लगाकर और दिल्ली में प्रदर्शन की इस इकलौती तयशुदा जगह को पुलिस छावनी में बदलकर मोदी सरकार सीधे लोकतंत्र को ही सलाखों के पीछे डालने पर उतारू है. हम देख रहे हैं कि हिंसा का एक नया ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ माॅडल तेजी से चल पड़ा है, जिसमें केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के जवान, कई बिना नेमप्लेट के और कई सादे कपड़ों में, सरकार-संरक्षित निजी लठैतों और गुंडों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.

आजाद भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि पूरे देश में आम जनता ने गांधी जयंती को इतने बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण सामूहिक जन-प्रतिरोध के दिन के तौर पर मनाया. फासीवादी बर्बरता और हिंसा के बीच गांधी जी की तस्वीर थामे शांत और बेखौफ डटी खड़ी एक अकेली महिला, बैरिकेड तोड़कर और पुलिस की धक्का-मुक्की झेलकर दिल्ली में हिरासत में लिए गए सैकड़ों लोग, और मुंबई में एक साथ राष्ट्रगान गाते हजारों प्रदर्शनकारी – ये तस्वीरें दशकों तक भारत के इतिहास में याद रखी जाएंगी. न तो ज्ञानेश कुमार ने और न ही उन्हें फरवरी 2025 में देश का मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने वाले मोदी और शाह ने कभी सोचा होगा कि उनके इस्तीफे की मांग को लेकर देश भर में ऐसा बड़ा जन-आंदोलन फूट पड़ेगा. सच तो यह है कि भारत ने इससे पहले किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ ऐसा भारी जनाक्रोश कभी नहीं देखा.

भारत के लोगों को वोटर लिस्ट के तथाकथित ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (एसआइआर) की तकलीफदेह मार झेलते हुए इस सामूहिक समझ तक पहुंचने में चौदह महीने लग गए. वोटर लिस्ट की ‘सफाई’ कर उसे दुरुस्त करने और यह पक्का करने के नाम पर कि उसमें दर्ज सभी लोगों को वोट देने का अधिकार है, चुनाव आयोग ने बड़े पैमाने पर लोगों को उनके वोट के अधिकार से वंचित करने का विनाशकारी अभियान शुरू कर दिया. यह उस सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की बुनियाद पर हमला है, जिस पर हमारी चुनावी व्यवस्था टिकी है. करोड़ों मतदाता मनमाने ढंग से और निशाना बनाकर सूची से बाहर किए जाने के शिकार हुए हैं. वोटर लिस्ट में किसी भी ‘तार्किक विसंगति’ यानी कथित लाॅजिकल डिस्क्रेपेंसी को पकड़ने के नाम पर ऐसे बेतुके पैमाने अपनाए गए कि बड़ी तादाद में उन वोटरों को भी संदेह और असुरक्षा के दायरे में डाल दिया गया, जिनकी पहचान पहले ही सत्यापित थी और जो वोट देने के पूरी तरह हकदार थे. पश्चिम बंगाल में ऐसे वोटरों की तादाद 60 लाख से ज्यादा थी, जबकि दिल्ली में लगभग हर दूसरे वोटर को किसी न किसी कथित ‘तार्किक विसंगति’ का शिकार बताकर संदेह के दायरे में डाल दिया गया.

पश्चिम बंगाल में एसआइआर का पूरा तजुर्बा बेहद अपारदर्शी और शक के दायरे में रहा है. जिन 60 लाख वोटरों के नामों में कथित ‘तार्किक विसंगति’ पाई गई, उनकी जांच के लिए मामले न्यायिक अधिकारियों के पास भेजे गए. लेकिन इस जांच में सही पाए जाने के बाद भी करीब 20 लाख वोटरों की ‘पात्रता’ पर पश्चिम बंगाल के अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने ही दोबारा सवाल खड़े कर दिए. अपीलीय ट्रिब्यूनल की अगुवाई कर रहे कई जजों ने शिकायत की है कि विवादों के निपटारे और वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने की प्रक्रिया में तकनीकी अड़चनें खड़ी की जा रही हैं. गोवा से भी ऐसी ही खबरें सामने आई हैं. वहां राज्य के अपने चुनावी तंत्र ने 97 वोटरों को योग्य पाया, लेकिन केंद्रीकृत साॅफ्टवेयर सिस्टम की मनमानी के चलते वे वोटर लिस्ट में दर्ज नहीं हो सके.

इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट के खुलासे बताते हैं कि इस केंद्रीकृत व्यवस्था ने आयोग के भीतर के सामान्य कामकाज के तरीकों को ही ताक पर रख दिया. मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग के डिजिटल विभाग की प्रमुख सीमा खन्ना के साथ मिलीभगत से पूरा खेल अपने हाथ में ले लिया. इसके बाद चुनाव आयोग ने जो भी सफाई दी, वह असल में अपनी गलती कबूलने और एसआइआर प्रक्रिया की उन तमाम खामियों पर मुहर लगाने जैसी ही साबित हुई, जिन्हें इतने सारे लोग लंबे समय से उठा रहे थे. चुनाव आयोग के झूठ और आधे-अधूरे सच की पोल अब सुप्रीम कोर्ट ने भी खोल दी है. फाॅर्म 6 में बदलाव को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने का आयोग का दावा तो खुद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने झूठा करार दे दिया.

कानूनी सुरक्षा और सरकार के संरक्षण के बावजूद ज्ञानेश कुमार का पद पर बने रहना अब बिल्कुल नामुमकिन हो गया है. एसआइआर भी वोटर लिस्ट को बिना जायज वजह के, मनमाने तरीके से दोबारा बनाने की साजिश के तौर पर बेनकाब हो चुका है. इसलिए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआइआर को रद्द करने की मांगें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. इनके साथ तीन और मांगें स्वाभाविक रूप से जुड़ती हैं. पहली, एसआइआर से हुए नुकसान को पलटा जाए और जिन वोटरों के नाम गलत ढंग से काटे गए हैं, उन सभी का वोट देने का अधिकार बहाल किया जाए. दूसरी, 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए सभी चुनावों की समीक्षा की जाए और जहां जरूरी हो, वहां दोबारा चुनाव कराए जाएं. इसमें बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में संभवतः पूरे राज्य में फिर से चुनाव कराने का विकल्प भी शामिल हो. तीसरी, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को रद्द किया जाए. इस कानून ने मौजूदा सरकार को अपनी पसंद के चुनाव आयुक्तों का पैनल चुनने की खुली छूट दे दी है. साथ ही, चुनाव आयुक्तों को आजीवन कानूनी संरक्षण देकर उन्हें देश के कानून के दायरे से बाहर कर दिया है.

आजादी के साथ और संविधान को अपनाते हुए भारत ने हर वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार देने का सिद्धांत अपनाया. भारत की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत पर टिकी है. मौजूदा संकट दो बुनियादी खंभों पर दोहरे हमले से पैदा हुआ है: हर वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार और सत्ता के अलग-अलग अंगों के बीच शक्तियों का बंटवारा. दोनों पर गहरी चोट पहुंची है. चुनाव आयोग की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठते सवालों ने उसकी साख को भारी नुकसान पहुंचाया है. ‘वोट चोरी’ का मुहावरा अब आम बोलचाल में आ गया है, और यह सिर्फ इक्का-दुक्का चुनावी धांधली के आरोपों के लिए नहीं, बल्कि पूरी चुनावी व्यवस्था में धांधली के लिए इस्तेमाल हो रहा है. भारत का लोकतंत्र साख और जवाबदेही के इस संकट को बर्दाश्त नहीं कर सकता. ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा व्यवस्था को दुरुस्त करने और उसमें बुनियादी बदलाव लाने की दिशा में पहला कदम होना चाहिए. सरकार चुनने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ जनता का है. सरकार को यह इजाजत नहीं दी जा सकती कि वह तय करे कि कौन वोटर उसे चुनेगा और कौन नहीं.

( टाइम्स ऑफ इंडिया, 9 अक्टूबर 2026 से साभार )


10 October, 2026