उलगुलान के महानायक धरती आबा बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और झारखंड के 25वें स्थापना दिवस के अवसर पर 15 नवंबर 2025 को बिरसा नगर, अंबवा टांड़, हेहल, रामगढ़ (झारखंड) में एक व्यापक जन-सहभागी कार्यक्रम आयोजित किया गया.
यह कार्यक्रम आदिवासी संघर्ष मोर्चा और बिरसा मुंडा प्रतिमा निर्माण समिति के संयुक्त तत्वावधान में सम्पन्न हुआ, जिसमें झारखंड संस्कृति मंच ने भी शिरकत की. इसमें सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा देते हुए सामुदायिक एकजुटता को मजबूत आधार प्रदान किया.
कार्यक्रम की शुरुआत बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर आदिवासी परंपरा व संस्कृति के साथ धूप-धूमन और माल्यार्पण के साथ हुई. इसका नेतृत्व समिति के प्रमुख नागेश्वर मुंडा ने किया. इसके बाद बाटेश्वर मुंडा, बृज नारायण मुंडा, जगु मुंडा, नीता बेदिया, सीता देवी, अमर मुंडा, नारायण मुंडा, मदन प्रजापति, कनोज मुंडा, मनोज मुंडा, कैलाश मुंडा, झारखंड जन संस्कृति मंच के सुरेन्द्र कुमार बेदिया, भरत बेदिया, दिनेश करमाली, बालेश्वर करमाली, टुकू दास, अफसर अंसारी, शिवनारायण बेदिया, मोतीलाल बेदिया समेत सभी उपस्थित ग्रामीणों ने पुष्पांजलि अर्पित की.
इसके बाद सरना मंडली द्वारा स्वागत गीत के साथ सुजीत मुंडा के संचालन में उलगुलान संकल्प सभा की शुरुआत हुई. इस दौरान जन संस्कृति मंच, झारखंड के सभी कलाकारों को आदिवासी गमछा देकर सम्मानित भी किया गया.
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और आदिवासी संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय सहसंयोजक देवकीनंदन बेदिया ने कहा कि वर्तमान समय में फासिस्ट नीतियों, कॉरपोरेट लूट, निजीकरण और विस्थापन की प्रक्रियायें तेज हो रही हैं. इसके खिलाफ रोजगार, अधिकार और पर्यावरण की लड़ाई को मजबूत करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा की जयंती समाज को संघर्ष की नई ऊर्जा देती है, जिसे अब उलगुलान की दिशा में संगठित करने का समय है.
बेदिया ने स्पष्ट रूप से कहा कि पेसा कानून लागू किए बिना किसी भी प्रकार का भूमि अधिग्रहण नहीं किया जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने रामगढ़ और हजारीबाग जिलों को अनुसूचित क्षेत्र (Scheduled Area) में शामिल करने की मांग भी रखी.
भूमि बैंक नीति और मौजूदा भूमि अधिग्रहण व्यवस्था की आलोचना करते हुए मुख्य वक्ता ने कहा कि इन नीतियों के कारण सार्वजनिक, सामुदायिक, खुंटकटी, भुइंहरी और वन क्षेत्रों की जमीनें प्रशासनिक नियंत्रण में चली गई हैं, जिनका बाद में कम दामों पर कॉरपोरेट हितों में उपयोग किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि इससे किसानों और आदिवासी समुदायों की जमीनें छीनी जा रही हैं, जबकि बदले में न तो नौकरी मिल रही है और न ही उचित मुआवजा.
नागेश्वर मुंडा ने आदिवासी संघर्ष मोर्चा द्वारा निकाले गए पर्चा का पाठ करते हुए सवाल उठाया कि जहां सोना, कोयला, लोहा, वन-सम्पदा और पानी की प्रचुर मात्रा मौजूद हो, वहां के मूल निवासियों को ही अपनी आजीविका के लिए भटकना पड़े. यह बिरसा के सपनों और संघर्ष की भावना के विपरीत है.
नीता बेदिया ने अपने संबोधन में कहा कि आज सबसे बड़ी जरूरत है कि हम धरती आबा बिरसा मुंडा द्वारा दिखाए गए रास्ते पर दृढ़ता से चलें. उन्होंने बताया कि झारखंड जैसी खनिज-सम्पदा और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध भूमि पर रहते हुए भी लोग रोजी-रोजगार के लिए पलायन करने को मजबूर हैं. यह स्थिति केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि शासन-व्यवस्था की गंभीर विफलता को भी उजागर करती है.
अमोल घोषाल ने जोर देकर कहा कि बिरसा मुंडा का रास्ता आत्मसम्मान, स्वशासन और संसाधनों पर समुदाय के अधिकार की लड़ाई का रास्ता है, और जब तक राज्य के लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और सुरक्षित जीवन नहीं मिलेगा, तब तक संघर्ष जारी रहेगा. इसके अलावे जगु मुंडा, मदन प्रजापति सहित कई सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए.
उलगुलान सभा के माध्यम से महत्वपूर्ण मांगें की गईं – पांचवी-छठी अनुसूची और सीएनटी-एसपीटी कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए. माओवाद के नाम पर आदिवासियों पर होने वाले दमन और हिंसा को बंद किया जाए. स्थानीय नीति लागू कर 75% रोजगार स्थानीय लोगों को सुनिश्चित किया जाए. सभी आदिवासी-बहुल क्षेत्रों को अनुसूचित क्षेत्र में शामिल किया जाए. झारखंड में आदिवासी/विस्थापन आयोग का गठन किया जाए.
कार्यक्रम का समापन बिरसा मुंडा के विचारों पर चलने और उलगुलान की परंपरा को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ किया गया
– सुरेन्द्र कुमार बेदिया
सांस्कृतिक कार्यक्रम में जीवंत हुई झारखंड की पीड़ा
इस मौके पर एक सांस्कतिक कार्यक्रम भी आयोजित हुआ. झारखंड जन संस्कृति मंच के भरत बेदिया और दिनेश करमाली ने भावपूर्ण स्वर में गीत ‘एक बार फिर से जन्म लेउ रे बिरसा, फिर से करूं उलगुलान रे’ प्रस्तुत किया. यह गीत पूरी सभा का भाव और संघर्ष दोनों प्रकट करता है.
गीत का आशय यह है कि आज भी समाज जिन चुनौतियों – शोषण, विस्थापन, बेरोजगारी और जल-जंगल-जमीन के संघर्ष से गुजर रहा है, वे वही परिस्थितियां हैं जिनके विरुद्ध बिरसा मुंडा ने ऐतिहासिक उलगुलान किया था.
गीत की इस पंक्ति में सांस्कृतिक प्रस्तुति एक प्रतीकात्मक पुकार थी कि अगर आज बिरसा मुंडा फिर से जन्म लें, तो समाज के भीतर नई चेतना, प्रतिरोध और संगठित संघर्ष की आग एक बार फिर धधक हो उठेगा. गीत ने यह संदेश दिया कि बिरसा मुंडा सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि आज भी संघर्ष, अस्मिता और परिवर्तन की जीवंत प्रेरणा हैं, जिनकी परंपरा को आगे बढ़ाना ही नए उलगुलान का आधार है.
अन्य लोकगीतों में रोजगार के अभाव में होनेवाले पलायन की पीड़ा को और उसकी वजह से महिलाओं पर घर और खेत की सभी जिम्मेदारियांं के बढ़ते बोझ को और इसके साथ ही महिलाओं की चिंता, प्रतीक्षा और भीतर की बेचैनी का गहरा चित्रण और उसे मानवीय स्तर पर उजागर करने की कोशिश दीखी. ये चीजें झारखंड के ग्रामीण जीवन में आज भी व्यापक रूप से अनुभव की जाती हैं,
लोकगीत की इस प्रस्तुति ने कार्यक्रम में उपस्थित लोगों का ध्यान इस महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे की ओर खींचा कि खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड में आज भी रोजगार के अभाव के कारण बड़े पैमाने पर पलायन जारी है, जिसका सबसे बड़ा असर ग्रामीण परिवारों और विशेष रूप से महिलाओं पर पड़ता है.
“नागपुर कर कोरा नदी नाला टाका टुकू वन रे पतरा भरील खोंसा कांसी फूल डींडा समय झुलाझूल रेलू”
सिर्फ एक लोकगीत नहीं, बल्कि पूरे झारखंड की प्रकृति, संस्कृति, पहाड़-नदी, जंगल और ग्रामीण जीवन का गहन चित्रण है. इस गीत में झारखंड की भौगोलिक सुंदरता, जीवनशैली और सामुदायिक भावनाओं का जीवंत दृश्य उभरता है. यह गीत बताता है कि झारखंड सिर्फ खनिजों का प्रदेश नहीं, बल्कि नदियों, पहाड़ों, जंगलों, परंपराओं, त्योहारों, और सामुदायिक जीवन से भरी एक जीवंत सांस्कृतिक धरती है.
कार्यक्रम की सांस्कृतिक प्रस्तुति को उत्कृष्ट बनाने में वाद्य कलाकारों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही. झारखंड संस्कृति मंच के मोतीलाल बेदिया ने ढोलक पर, शिवनारायण बेदिया ने नगाड़ा पर तथा अफसर अंसारी ने बैंजू पर अपनी दमदार प्रस्तुति दी. वहीं बालेश्वर करमाली ने आर्गेन पर अपनी उंगलियों की तेज और सधी हुई थिरकन से पूरा माहौल जीवंत कर दिया. कार्यक्रम में आधुनिक वाद्ययंत्र ऑक्टापैड (एक इलेक्ट्रॉनिक ताल-वाद्य) की प्रस्तुति भी विशेष आकर्षण रही, जिसे टुकू दास ने स्टिक से ड्रम का ताल देकर कुशलता से बजाया. टुकू दास की तेज, सधी और रचनात्मक थिरकन ने प्रस्तुति में आधुनिकता और ऊर्जा का संचार किया,
इन कलाकारों की जुगलबंदी ने सांस्कृतिक मंच को उत्साह, ताल और लय से भर दिया, जिससे सांस्कृतिक प्रस्तुति और भी प्रभावशाली हो उठी.