वर्ष 35 / अंक - 41 / एसआइआर की मतदाता सूची तथा मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्...

एसआइआर की मतदाता सूची तथा मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त के रहते स्वतंत्र व स्वच्छ जनादेश संभव नहीं

एसआइआर की मतदाता सूची तथा मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त के रहते स्वतंत्र व स्वच्छ जनादेश संभव नहीं

-- लाल बहादुर सिंह

इस समय देश के मुख्य चुनाव आयुक्त और मोदी-शाह देश के लोकतांत्रिक जनमत के निशाने पर हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर देश में अभूतपूर्व जन आंदोलन छिड़ा हुआ है जिसकी आंच मोदी और शाह तक भी पहुंचने लगी है. 6 अक्टूबर को 19 पार्टियों के 150 सांसदों ने चुनाव आयोग की ओर ‘लोकतंत्र बचाओ’ मार्च किया और अनेक सांसदों ने गिरफ्तारी दी. 1 नवंबर को इंडिया ब्लाॅक की पार्टियां दिल्ली के राम लीला मैदान में  बड़ी रैली करने जा रही हैं और उसके पहले महीने भर तक पूरे देश में जन जागरण अभियान चलेगा.

दरअसल चुनाव आयोग ने एसआइआर के माध्यम से देश के लगभग 15 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काट दिए हैं. इसके खिलाफ देश के कोने-कोने में आंदोलन फूट पड़ा है. इसमें विपक्षी दल, इंडिया गठबंधन के तमाम घटक तो साथ हैं ही, मोदी भाजपा सरकार जिन बैसाखियों पर टिकी है, उन दलों ने भी नाराजगी जाहिर की है.  राजनीतिक दलों के अलावा नागरिक समाज तथा काॅकरोच जनता पार्टी भी इसमें शामिल हैं. सबसे बढ़कर इन सब के आह्वान पर आंदोलन में जेन जी की स्वतःस्फूर्त भागीदारी हो रही है जो इस बात का सबूत है कि आंदोलन युवाओं के साथ स्वाभाविक जुड़ाव बनाने में सफल हुआ है. सरकार  न्यायोचित मांगे मानने के बजाय दमन का सहारा ले रही है जिसकी और तीव्र प्रतिक्रिया हो रही है. इस जंतर मंतर 2.0 आंदोलन का सबसे सशक्त चेहरा बन कर उभरी हैं – आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद उन्होंने पूरे देश का तूफानी दौरा किया और निर्भीकता से हर जगह अपनी बात रखी. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में, जो मुख्यमंत्री योगी का गढ़ माना जाता है, उन्होंने उन्हें गुंडा, दंगाई और लंपट कहा और उनसे शिक्षा में सुधार की उम्मीद न करने की बात कही. इसके बाद कई जगह भाजपा समर्थकों ने उनके खिलाफ तहरीर दी. लेकिन सरकार ने कहीं भी एफआइआर  दर्ज नहीं करवाया. यह इस बात का सुबूत है कि सरकार डरी हुई है कि कहीं इसकी प्रतिक्रिया में युवाओं का और बड़ा आंदोलन खड़ा न हो जाये. जंतर मंतर के पिछले आंदोलन ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की बलि ली थी. इससे सीख लेते हुए सरकार ने अबकी बार जंतर मंतर पर पुलिस और केंद्रीय बलों की कई लेयर की ऐसी चाक-चौबंद व्यवस्था की थी कि वहां परिन्दा भी पर न मार सके.

आंदोलनकारियों ने भी अपनी रणनीति बदल दी. वे जगह-जगह से जंतर मंतर की ओर बढ़ते थे और पुलिस जहां रोकती थी, वहीं प्रदर्शन शुरू कर देते थे. वहीं एक नया जंतर मंतर बन जाता था. उन्होंने घोषित जगह से प्रदर्शन न कर दूसरे स्थान से मार्च शुरू कर पुलिस को कई बार छकाया. उदाहरण के लिए 3 अक्टूबर  को उन्होंने अचानक कंस्टीट्यूशन क्लब से नागरिक मार्च शुरू कर दिया. इस नागरिक मार्च में कपिल सिब्बल, वृंदा ग्रोवर और प्रशांत भूषण जैसे उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील भी शामिल थे. फिर अगले दिन इंडिया गेट पर जुटने का ऐलान कर नेहा के साथ हुजूम आंध्र कैंटीन से निकल पड़ा. 2 अक्टूबर को सीजेपी के लोगों ने मुंबई के शिवाजी पार्क में बड़ा प्रदर्शन किया जिसे इंडिया गठबंधन के उद्धव ठाकरे गुट का भी समर्थन प्राप्त था. 4 अक्टूबर को ठाकरे बंधुओं ने अपनी पार्टी के बैनर से मुम्बई में विशाल रैली की. इंडिया ब्लाॅक ने महीने भर के आंदोलनात्मक कार्यक्रम का ऐलान किया है. उधर तीन महिला पत्रकारों ने पुलिस कर्मियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं. इनमें से एक ने एसीपी विवेक भगत पर यौन हमले का आरोप लगाया है और उनके खिलाफ एफआइआर के लिए तहरीर दी है. ताजा जानकारी के अनुसार उक्त अधिकारी को प्रोन्नति दे दी गई है. यह बेशर्मी की पराकाष्ठा है और दिखाता है कि मोदी-शाह को जनता की राय की कितनी कम परवाह है.

इससे पहले भी 20 जुलाई को जंतर मंतर पर काॅकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में दिल्ली पुलिस के एक उच्च अधिकारी पर एक महिला को अकारण थप्पड़ मारने, एक इंस्पेक्टर द्वारा एक महिला के पिछवाड़े में डंडा खोंसने तथा एक अन्य कर्मचारी द्वारा एक महिला प्रदर्शनकारी को बैड टच करने के आरोप लगे थे. परंतु हैरानी की बात है कि उन अधिकारियों के विरुद्ध आज तक कोई भी जांच अथवा दंड देने की जानकारी प्राप्त नहीं हुई है.

इधर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत ने स्पष्ट किया है कि उच्चतम न्यायालय ने नए नाम शामिल करने के लिए फाॅर्म 6 के किसी संशोधित प्रारूप को अनुमोदित नहीं किया है. दरअसल यह संसद द्वारा कानून में परिवर्तन के बिना संभव ही नहीं है. उधर दो चुनाव आयुक्त भी फाॅर्म 6 के सवाल पर अपनी आपत्ति जता चुके हैं. इसतरह यह दिन के उजाले की तरह साफ है कि यह गैर कानूनी कदम मुख्य चुनाव आयुक्त ने मोदी-शाह को खुश करने के लिए मनमाने ढंग से खुद उठाया ताकि युवाओं के – जो सरकार के खिलाफ होते जा रहे हैं – वोट काटे जा सकें. उच्चतम न्यायालय के जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने कहा है कि ‘किसी भी प्रक्रिया द्वारा थोक भाव में लोगों के मतदान के अधिकार को छीन लेना संविधान का उल्लंघन होगा, किसी इधर-उधर की बात से इसे न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता.....यह शरीर से आत्मा को निकाल लेने के बराबर होगा....वोट का अधिकार छीन लेना नागरिकों को दोयम दर्जे के नागरिक में बदल देना है. यह उस संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन है जिसकी व्यवस्था संविधान में की गई है.’

इस तरह ज्ञानेश कुमार चारों ओर से घिरते जा रहे हैं और इस सबकी आंच मोदी-शाह तक भी पहुंचती जा रही है. जाहिर है मोदी-शाह के राजनीतिक फायदे के लिए ही ज्ञानेश कुमार ने एसआइआर का असंवैधानिक कदम उठाया है और करोड़ों नागरिकों को उनके वोट देने के बुनियादी अधिकार से वंचित किया है. स्वाभाविक है प्रत्येक नागरिक के वोट देने के अधिकार की रक्षा करना दरअसल संविधान, लोकतंत्र और आजादी को बचाना है. इसीलिए इसके योद्धा दरअसल आज दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं. विपक्षी दलों तथा लोकतांत्रिक ताकतों को आंदोलन के बल पर यह सुनिश्चित करना होगा कि अब एसआइआर की मतदाता सूची तथा वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में कोई चुनाव न हो. केवल तभी स्वच्छ जनादेश सुनिश्चित किया जा सकता है.

10 October, 2026