वर्ष 35 / अंक - 41 / दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीतिक फिजा अब बद...

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीतिक फिजा अब बदलने वाली है: अरुंधति राय

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीतिक फिजा अब बदलने वाली है: अरुंधति राय

(अरुंधति राॅय से अल जजीरा के इमरान खान की बातचीत के संपादित अंश)


इमरान खान: आप खुद को कैसे देखती हैं? एक उपन्यासकार, लेखिका, राजनीतिक कार्यकर्ता? या फिर आप इन खांचों और दायरों के बारे में ज्यादा नहीं सोचतीं?

अरुंधति राॅय: देखिए, सच कहूं तो मैं खुद पर कोई ठप्पा लगाने से बचती हूं. मैं यह काम दूसरों पर छोड़ देती हूं, क्योंकि भला हम खुद को किसी दायरे में क्यों बांधें? यह तय करना दूसरों का काम है.

इमरान खान: आपकी अलग-अलग पहचानों को जोड़ने वाला एक धागा तंज है. वैसे तो आप कोई पेशेवर व्यंग्यकार नहीं हैं, लेकिन ‘द गाॅड ऑफ स्माॅल थिंग्स’ और ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ में आपने बड़े ही जोरदार तरीके से व्यंग्य का इस्तेमाल किया है. लेकिन यह हमेशा राजनीति के इर्द-गिर्द ही घूमता दिखता है. क्या यह कोई सोच-समझकर किया गया फैसला है?

अरुंधति राॅय: मुझे ऐसा नहीं लगता. मेरा मतलब है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप राजनीति किसे समझते हैं. मेरे लिए तो एक परियों की कहानी भी किसी न किसी रूप में राजनीतिक होती है. पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं किसी के सिर पर डंडा मारकर कोई बात थोपूं या अपना चुनावी घोषणापत्र लहराने लगूं. शायद मेरे बचपन और जिस माहौल में मैं पली-बढ़ी, उसी में आपके सवाल का जवाब छुपा है – कि मेरे लिए अपनी निजी जिंदगी और बाहर की दुनिया के बीच कभी कोई लकीर नहीं रही. बहुत छोटी उम्र से ही मुझे इन दोनों के बीच तालमेल बिठाना पड़ा. इसलिए लोग जिसे राजनीतिक कहते हैं और जिसे गैर-राजनीतिक मानते हैं, मुझे उसमें कोई फर्क नहीं दिखता. मेरे लिए यह सब एक ही बात है. चाहे घर की चारदीवारी की बात हो या सियासत के मैदान की, मैं दोनों के बारे में बिना किसी झिझक के लिखती हूं.

इमरान खान: चलिए, आपके हालिया लेखन की बात करते हैं. भारत और उसका राजनीतिक माहौल आपके काम का बड़ा हिस्सा रहा है. आपने भारत के ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ आंदोलन पर लिखा. यह नौजवानों का एक जमीनी आंदोलन है, जिन्होंने अपने लिए इस्तेमाल की गई एक गाली – ‘काॅकरोच’ – को ही अपना हथियार बना लिया. आपने अपने लेख की शुरुआत इन पंक्तियों से की थी: ‘ऐन उस वक्त जब उम्मीद दम तोड़ चुकी थी, तभी वो आ गए. बारिश की बूंदों पर सवार नौजवान काॅकरोच. एक जज और एक जोक के नापाक मिलन की औलादें...’  ये लाइनें कमाल की है. लेकिन आपको इस आंदोलन ने अपनी तरफ कैसे खींचा?

अरुंधति राॅय: दरअसल, मजे की बात देखिए कि जिस वक्त हम बात कर रहे हैं, उसी वक्त यहां एक बड़ा संकट पनप रहा है. काॅकरोच फिर से मैदान में उतर आए हैं और कह रहे हैं कि वे कुछ ही दिनों में पूरे देश में प्रदर्शन करेंगे. इसकी वजह एक अखबार का वो भंडाफोड़ है जिसमें बताया गया है कि भारत के चुनाव पूरी तरह से बेईमानी की भेंट चढ़ चुके हैं. यह बात हम सब पहले से जानते थे और सालों से लिख रहे थे, लेकिन अब इसके पक्के सबूत सामने आ गए हैं.

तो मुझे इस आंदोलन ने इसलिए खींचा क्योंकि नौजवानों का यह आंदोलन उमंग और गजब के मजाकिया अंदाज से भरा हुआ था. अपने इंस्टाग्राम रील्स वगैरह के जरिए बात रखने के उनके इस नए तरीके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुत जतन से गढ़ी गई छवि की हवा निकाल दी.

इमरान खान: क्या यह प्रधानमंत्री की तरफ से कोई चूक थी – यानी सोशल मीडिया और नौजवानों की तकनीक को न समझ पाना? और क्या इसका भारत पर कोई असर पड़ेगा?

अरुंधति राॅय: नहीं, मुझे नहीं लगता कि यह कोई नासमझी थी. वो और उनकी पार्टी (भाजपा) ही तो सबसे पहले सोशल मीडिया के मैदान में उतरे थे, वे तो बाकी सबसे पहले से वहां मौजूद हैं. बात दरअसल यह है कि एक के बाद एक इतनी सारी बातें होती चली गईं कि यह आंदोलन उस ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनका साबित हुआ.

शुरुआत तो इसी बात से हुई कि 2024 के चुनाव में मोदी को पूरा बहुमत नहीं मिला. फिर जो मंदिर बनाया गया था, उसके ट्रस्ट में पैसों की चोरी का बड़ा घोटाला सामने आ गया. फिर चुनावों में धांधली के आरोप, फिर इम्तिहानों में पेपर लीक का मामला, और ऊपर से भयानक बेरोजगारी. इन सबने मिलकर एक तीखा और गंभीर जनाक्रोश पैदा कर दिया. मैं इन नौजवानों की बातें बड़े ध्यान से सुनती रही हूं, और मुझे उनकी किसी भी बात में कोई खोट नजर नहीं आई. यह देखकर हैरानी होती है कि वे उम्र के हिसाब से कितने समझदार हैं.

इमरान खान: आप एक हिंदुस्तानी के तौर पर अंग्रेजों की हुकूमत के साए में बड़ी हुईं. मैं एक पाकिस्तानी प्रवासी का बेटा होने के नाते उसी साए में पला-बढ़ा, लेकिन बिल्कुल अलग ढंग से. मैं भारत पर बात करना चाहता हूं क्योंकि आपकी रचनाओं में भारत की गहरी छाप है. सरकारी तौर पर भारत कहता है कि हम आर्थिक तरक्की की मिसाल हैं, दुनिया के अगुआ हैं. लेकिन आपकी नजर में आज का भारत क्या है?

अरुंधति राॅय: आज का भारत एक बेहद अमीर मुल्क है, जो बेहद गरीब लोगों से भरा पड़ा है. मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कोई ऐसा देश होगा जहां लोग इतनी भयंकर गरीबी और जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. ऐसे में इसे ‘आर्थिक महाशक्ति’ कहना शर्मनाक है, क्योंकि जैसा कि मैं बार-बार कहती हूं, यह देश बेतहाशा गरीब है. बेशक, यहां मुट्टी भर बेहिसाब अमीर उद्योगपति हैं जिनका सब चीजों पर कब्जा है, लेकिन उनकी दौलत की एक बूंद भी गरीबों तक नहीं पहुंचती.

और आज हम देख रहे हैं – मैं हमेशा कहती हूं कि पचास और साठ के दशक में लोग जमीन के बंटवारे और बराबरी के अधिकार के लिए लड़ रहे थे. सत्तर और अस्सी के दशक में उस लड़ाई को कुचल दिया गया. फिर लोग बांधों और बड़ी परियोजनाओं की वजह से अपनी जमीनों से बेदखल किए जाने के खिलाफ लड़ने लगे. फिर जब लगा कि हम नहीं जीत सकते, तो लड़ाई इस बात पर आ गई कि क्या हमें गांव में कम से कम मनरेगा (रोजगार गारंटी) के तहत तीन महीने की दिहाड़ी मिल सकती है? यानी साल भर की कुल कमाई उतनी, जितनी कोई अमीर या खाते-पीते घर का आदमी किसी महंगे होटल में एक वक्त के खाने पर उड़ा देता है. अब तो उसे भी खत्म किया जा रहा है. फिर नए नागरिकता कानून के जरिए अल्पसंख्यकों को अपने हक की लड़ाई लड़नी पड़ी. और अब यह हाल है कि देश के करीब दसवें हिस्से की आबादी को वोटर लिस्ट से ही गायब कर दिया गया है, उनके वोट देने का अधिकार छीन लिया गया है. ऐसे में जब आम जनता इतनी बेबस हो, तो इस देश को महाशक्ति कहना एक मजाक ही है.

इमरान खान: लेकिन अक्सर इस पूरी बात का ठीकरा अंग्रेजों की गुलामी पर फोड़ा जाता है कि भारत और पाकिस्तान की सारी मुसीबतें उसी पुराने दौर की देन हैं. क्या आप इस दलील से इत्तेफाक रखती हैं?

अरुंधति राॅय: अब नहीं. एक दौर था जब यह बात सही थी, लेकिन आज हम देख रहे हैं कि हमारी अपनी सरकार हालात को बद से बदतर बना रही है, यहां तक कि आजादी के मायने ही छीन लिए गए हैं. कल ही मैं कुछ नौजवानों से बात कर रही थी और मैंने उनसे कहा कि गांधी, अंबेडकर, मौलाना आजाद और नेहरू जैसे लोगों ने अंग्रेजों के जमाने में जो बातें कहीं और लिखी थीं, आज कोई उन्हें दोहरा भी नहीं सकता, क्योंकि सीधे जेल में डाल दिया जाएगा.

कितने ही छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और वकील लगातार जेलों में सड़ रहे हैं. हम पर आतंकवाद-विरोधी कानूनों (यूएपीए) का खौफ मंडराता रहता है. इस बार 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से मोदी ने कहा कि देश के लिए सबसे बड़ा खतरा ‘दिमागी नक्सल’ हैं – यानी बुद्धिजीवी, जिसमें जाहिर है हम सब शामिल हैं – और हमें समाज से अलग-थलग करना होगा. तो अब अंग्रेजों के नाम का रोना रोना बेकार की बात है.

इमरान खान: अच्छा हुआ आपने माओवादियों का जिक्र किया, क्योंकि आपने नक्सलियों के साथ कई हफ्ते गुजारे थे. इस साल की शुरुआत में सरकार ने ऐलान किया कि छह दशकों से चला आ रहा माओवादी विद्रोह लगभग खत्म हो गया है और इलाके ‘नक्सल-मुक्त’ हो गए हैं. लेकिन जिन मुद्दों के लिए नक्सली लड़ रहे थे, वे तो आज भी वैसे ही खड़े हैं. क्या यह सिर्फ कागजी शांति है?

अरुंधति राॅय: बिल्कुल. आखिर नक्सली कौन थे और वे किस बात के लिए लड़ रहे थे? बात यह है कि सरकार बार-बार उनके खात्मे का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन यह आग फिर कहीं न कहीं सुलग उठती है. आप इतने सारे लोगों को दबाकर उनकी जिंदगियां तबाह नहीं कर सकते; कोई न कोई तो हथियार उठाएगा ही. इसलिए ऐसे सरकारी ऐलानों के तो हम आदी हो चुके हैं.

इमरान खान: लेकिन आप उनके बीच रहने क्यों गई थीं?

अरुंधति राॅय: नहीं, मैं उनके साथ रहने नहीं गई थी. हुआ यह था कि उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी, करीब 2012 या 2013 की बात है. प्रधानमंत्री ने आदिवासियों की जमीनें बड़ी-बड़ी कंपनियों को सौंप दी थीं, ढेरों समझौते (एमओयू) हुए थे. फिर उन्होंने ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ नाम से फौजी कार्रवाई शुरू की. जंगलों में भारी तादाद में सुरक्षा बल उतार दिए गए, गांव के गांव जलाए जा रहे थे, औरतों के साथ ज्यादतियां हो रही थीं. लोग अपने ही घरों में रहने से डरते थे कि कहीं उन्हें घेरकर जिंदा न जला दिया जाए. और मीडिया इन सभी बेबस गरीबों को ‘आतंकवादी’ बता रहा था.

हकीकत यह थी कि जंगल में माओवादी लड़ाके मौजूद थे, और उनकी भर्ती बहुत तेजी से बढ़ रही थी. जब आपके झोपड़े को जंगल के बीच हजार फौजी घेर लेंगे, तो आप क्या करेंगे? लड़ाकों में आधी से ज्यादा तादाद आदिवासी औरतों की थी. हां, वे माओवादी थीं, लेकिन उससे पहले वे अपने घर और गांव को बचाने के लिए लड़ रही आम औरतें थीं. और उन्हें बेरहमी से कुचल दिया गया. मैं वहां इसलिए गई थी क्योंकि मीडिया एकतरफा झूठ परोस रहा था, और मैं उस झूठ को तोड़कर अंदर का सच देखना और सामने लाना चाहती थी.

इमरान खान: आपने हमेशा इस बात को नकारा है कि लेखकों को राजनीति से दूर रहना चाहिए. आपका काम राजनीतिक है, जैसा कि अभी हमने देखा, लेकिन सत्ता में बैठे लोग आपकी कड़ी आलोचना करते हैं. कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग न मानने वाले आपके पुराने बयान की भी याद आती है. इतना बेबाक होने की क्या कोई निजी और दिमागी कीमत चुकानी पड़ती है? आप इससे कैसे निपटती हैं, क्योंकि भारत में यह बहुत ही नाजुक मसला है?

अरुंधति राॅय: देखिए, 2019 के बाद तो कोई ऐसा कह भी नहीं सकता, क्योंकि कानूनन उसे भारत का अटूट हिस्सा बना दिया गया है और संविधान की उस धारा को निष्प्रभावी कर दिया गया है. लेकिन सच कहूं तो मैं लेखकों के लिए कोई नियम तय करने वाली नहीं होती कि उन्हें क्या लिखना चाहिए और क्या नहीं.

मैं बस इतना जानती हूं कि जिस बात से मेरा दिल दहल जाता है, अगर मैं उसके बारे में न लिखूं, तो यह ऐसा होगा जैसे उनके जेल में डालने से पहले मैं खुद को ही किसी कालकोठरी में बंद कर लूं. इसलिए मैं पूरी जिम्मेदारी से लिखती हूं. मैं इसी देश में रहती हूं, खतरों को समझती हूं. जैसा कि मैंने लिखा था, यह बारूदी सुरंगों से भरे फर्श पर नाचने जैसा है – पता नहीं कब कौन सा बम फट जाए. लेकिन जो मुझे करना है, वो मैं करती हूं. और सिर्फ मैं ही नहीं हूं, बहुत से लोग हैं जो बड़ी बहादुरी से डटे हुए हैं और अपने उसूलों की बहुत भारी कीमत चुकाई है. इसलिए मैं यहां खुद को कोई शहीद नहीं साबित करना चाहती.

इमरान खान: लेकिन क्या यह कोई बढ़ता हुआ आंदोलन है? क्या भारत में बुद्धिजीवियों की कोई ऐसी मजबूत आवाज है जिसे सुना जा रहा है, या फिर यह शोर-शराबे वाली राजनीति के नीचे दब गई है?

अरुंधति राॅय: असल में यह आवाज हमेशा से रही है. भले ही 2014 के बाद से काॅरपोरेट घरानों के 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों ने सबको दबाने की पूरी कोशिश की हो, लेकिन फिर भी यह आवाज बहुत मजबूत है. न्यूज चैनल और सत्ता दोनों ही जानते हैं कि यहां के बुद्धिजीवियों में कितनी ताकत और कितनी जिद है. इसीलिए मोदी जब भी चुनाव जीतते हैं, वे बाहर आकर हमें निशाना बनाने लगते हैं. भले ही वे सोचते हों कि हमें कुचल दिया गया है, लेकिन हर कोई जानता है कि यह तबका भारत का जमीर है और यह कहीं जाने वाला नहीं है. चुनाव कोई भी जीते, ये आवाजें जिंदा रहेंगी, और मैं दिल से इन्हें सलाम करती हूं.

इमरान खान: भारत एक ऐसा मुल्क है जहां हर पचास किलोमीटर पर बोली बदल जाती है. जितना घूमो, रंग-ढंग बदलता जाता है. मुझे भारत और पाकिस्तान दोनों जगह सफर करना बहुत पसंद है. लेकिन भारत अब भी दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है. इस बात का जश्न तो मनाया ही जाना चाहिए, या आपको लगता है कि यह लोकतंत्र सिर्फ एक दिखावा है?

अरुंधति राॅय: चोट बिल्कुल वहीं लगी है जहां सबसे ज्यादा दर्द होता है. मोदी सरकार ने चुनाव आयोग के गठन का तरीका ही बदल डाला. उन्होंने अपनी मर्जी का मुख्य चुनाव आयुक्त बिठा दिया, जहां पहले विपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की राय मायने रखती थी, अब उनकी कोई पूछ नहीं रही. और अब 2024 के आम चुनाव से लेकर महाराष्ट्र, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, बिहार और गोवा के चुनावों तक धांधली के गंभीर आरोप सामने आ चुके हैं. हजारों चुनावी अफसरों के हाथ से वोटर डेटा छीनकर सारा नियंत्रण दिल्ली के हाथ में ले लिया गया है. और लाखों की तादाद में अल्पसंख्यक और सरकार-विरोधी वोटरों के नाम चुपचाप काट दिए गए.

इसलिए हम कहते हैं कि सिर्फ चुनाव करा लेना लोकतंत्र की गारंटी नहीं होता. लोकतंत्र के लिए संविधान चाहिए, आजाद संस्थाएं चाहिए, जवाबदेही चाहिए. वे सब तो पहले ही खोखले कर दिए गए थे, अब तो खुद चुनाव की साख पर बट्टा लग चुका है. आप देखिएगा, आने वाले महीनों में और 2029 के चुनाव की तरफ बढ़ते हुए इस देश में भारी उथल-पुथल होने वाली है.

इमरान खान: तो इस वक्त आप क्या सोचती हैं? क्या भारत में सच्चे लोकतंत्र की कोई उम्मीद बाकी है?

अरुंधति राॅय: मेरी एक किताब उन लोगों को समर्पित थी जिन्होंने उम्मीद को तर्क से अलग करना सीख लिया है. इसलिए उम्मीद तो हमेशा रहेगी कि कुछ बदलेगा. मुझे लगता है कि सतह के नीचे कुछ खौल रहा है, कुछ बड़ा होने वाला है. वो कैसे सामने आएगा, मैं नहीं कह सकती, क्योंकि हमारा सामना बेहद बेरहम लोगों से है.

लेकिन आज की दुनिया में इतने सारे समीकरण बदल रहे हैं कि कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. इस काॅकरोच आंदोलन के बाद एक बात तो साफ है कि सरकार के पसीने छूट गए हैं. जो लोग मोदी राज के खौफ से कांपते थे, वे अब अपनी रीढ़ सीधी करके खड़े होने लगे हैं. जगह-जगह विरोध के छोटे-छोटे दायरे बन रहे हैं. और सबसे बड़ी बात यह हुई है कि ‘राजा नंगा है’ वाली बात सरेआम साबित हो गई है. उनका रुतबा जाता रहा है. वे जनता के सामने आने से कतरा रहे हैं, गृह मंत्री बचते फिर रहे हैं. संसद के पूरे सत्र में जब काॅकरोच आंदोलन चल रहा था, दोनों में से कोई झांकने तक नहीं आया. तो फिजा बदल रही है और सत्ताधारी डरे हुए हैं. मैं तीन महीने पहले जितनी मायूस थी, आज उससे कहीं ज्यादा उम्मीद में हूं.

इमरान खान: इस इंटरव्यू से पहले मैं अपने एक लेखक दोस्त से बात कर रहा था, जो इजराइल में रहते हैं. उन्होंने कहा कि आपको अरुंधति जी से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया का हथियार की तरह इस्तेमाल किस तरह लोकतंत्र को निगल रहा है और तानाशाही को बढ़ावा दे रहा है. एआई पर आपकी क्या राय है?

अरुंधति राॅय: मुझे लगता है कि यह इंसानी कोशिशों और हमारी तहजीब का निजीकरण है, और एक तरह से उसका अंत है. जंग के मैदान में, राजनीति में और हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में यह जिस तरह घुसपैठ कर रहा है, और चमक-दमक के पीछे जो स्याह अंधेरा छुपा है, उस पर बहुत गहराई से सोचने की जरूरत है. मैं इस पर लिख भी रही हूं.

इमरान खान: लेकिन यह लिखना कि एआई इंसानी सभ्यता के लिए खतरा है, आपको फिर से भारत सरकार के सामने खड़ा कर देगा, क्योंकि भारत खुद को टेक्नोलाॅजी की महाशक्ति मानता है. यानी एक और नया मोर्चा. आप ये लड़ाइयां कैसे चुनती हैं?

अरुंधति राॅय: मैं लड़ाइयां नहीं चुनती, वे खुद मुझे चुन लेती हैं. यह कोई लड़ाई नहीं है, यह तो बस अपनी राय रखना है. एक लेखक के तौर पर जो चीजें मुझे कचोटती हैं, मैं उन पर बोलती हूं. मैं सरकार से कोई झगड़ा मोल नहीं ले रही, बस दुनिया को लेकर अपना नजरिया रख रही हूं. अब सरकार इसे लड़ाई मान ले, तो उनकी मर्जी.

इमरान खान: हमने बहुत सारे मुद्दों पर बात की और आपकी सोच वाकई लाजवाब रही. लेकिन क्या आज के भारत या दुनिया में कोई ऐसी चीज है जो आपको सचमुच उम्मीद देती है?

अरुंधति राॅय:  बिल्कुल. जैसा कि मैंने पहले भी कहा, भारत का इतिहास बगावत, लीक से हटकर सोचने और सवाल उठाने की अनूठी रिवायत से भरा पड़ा है. नौजवानों को देखिए... मुझे याद है 2002 में जब मैंने अमेरिका में फिलिस्तीन और इजराइल पर बात की थी, तो लोग कहते थे कि यहां इसका नाम भी मत लो. और आज देखिए, सड़कों पर नौजवान उतर आए हैं – चाहे यहूदी हों, मुसलमान हों, गोरे हों या काले – सब नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. तो भला कोई उम्मीद कैसे छोड़ सकता है? यह देखना बहुत सुकून देता है.

इमरान खान: लेकिन क्या यह उम्मीद उन बुनियादी मुद्दों पर कोई ठोस बदलाव ला पा रही है जिनकी आपको परवाह है?

अरुंधति राॅय: शायद अभी तुरंत न दिखे, लेकिन मुझे लगता है कि दुनिया में ताकत का संतुलन बदल रहा है, एक बहुध्रुवीय दुनिया उभर रही है.

( https://youtu.be8l9g4OeiVVc?si=dGMuzBIyYx5R8TRo )

10 October, 2026