-- अमन सेठी
(मजलूमों की मजलूमों के लिए एकजुटता जरूरी है, यही दुनिया की एक उम्मीद है.)
2026 की गर्मियों में भारत के चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने एक बड़े जन-आंदोलन की जमीन खुद तैयार कर दी, जब उन्होंने देश के बेरोजगार नौजवानों को हिकारत से ‘काॅकरोच’ कह डाला. जो बात नौजवानों को अपमानित करने के लिए कही गई थी, वो देखते ही देखते बगावत का नारा बन गई. भारत के नौजवानों ने इस बगावत को एक तेजी से फैलते जन-आंदोलन में बदल दिया. ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी), जिसके इंस्टाग्राम पर दो करोड़ से ज्यादा फाॅलोअर हैं, ने सरकार की प्रोपेगेंडा मशीन के मुकाबले एक बिल्कुल अलग, जनता का अपना मंच खड़ा कर दिया.
भ्रष्ट और लगातार तानाशाही की तरफ बढ़ती मोदी सरकार के सामने, छात्रों, बेरोजगार नौजवानों और उनके साथियों ने मीम्स, तंज और इंस्टाग्राम रील्स के जरिए भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया, सत्ता के दिखावे को तार-तार किया, और जनता को सड़कों पर उतार दिया. 20 जुलाई को संसद मार्च के दिन आंसू गैस, पुलिस की लाठियां, गिरफ्तारियां – सब झेला, लेकिन सड़क नहीं छोड़ी.
इस प्रतिरोध ने साफ कर दिया कि सत्ता सिर्फ डंडे और बंदूक के बल पर नहीं टिकती. यह तस्वीरों, कहानियों, और एक जान-बूझकर गढ़ी गई ‘आम समझ’ पर भी टिकी होती है – जो मेहनतकश जनता को सिखाती है कि किससे डरना है, क्या मान लेना है, किसकी बात चुपचाप सुननी है. संस्कृति को सत्ता के खिलाफ मोड़कर, आंदोलनकारी उसी जमीन पर उतर आए जहां पहचान बनती है, गुस्से को भाषा मिलती है, और निजी तकलीफ सार्वजनिक आक्रोश और सामूहिक प्रतिरोध में बदल जाती है.
खास बात यह रही कि बड़ी तादाद में ऐसे लोग भी पहली बार किसी राजनीतिक प्रदर्शन में शामिल हुए, जो अब तक टीवी और सोशल मीडिया के जरिए सरकार की गढ़ी हुई बातों पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे. आंदोलन ने उन्हें अपने ही अनुभव से यह समझने का मौका दिया कि जिन्हें वे कल तक ‘देशद्रोही’ मानते थे, उनके बारे में फैलाई गई कहानियां कितनी झूठी थीं. जब आम जनता खुद उस दमन का शिकार होती है, तो सत्ता ने जो ‘हम’ और ‘वो’ की दीवार खड़ी की थी, वो अपने आप टूटने लगती है. इस आंदोलन ने दिखा दिया कि जब जनता एक साथ आती है, तो वह एक बिल्कुल अलग सामाजिक और राजनीतिक दुनिया जीती है. भाषा बदलती है, रिश्ते बदलते हैं, और लोग एक-दूसरे के लिए खड़े होना सीखते हैं.
भारत के नौजवानों ने दिखा दिया कि जब एक पूरी पीढ़ी उस पर थोपे गए भविष्य को मानने से साफ इनकार कर देती है, तो क्या मुमकिन हो जाता है. और यह पीढ़ी अकेली नहीं है. दुनिया भर में नौजवानों के बीच उठ रहा यह प्रतिरोध, हिंसा के इस वैश्विक तंत्र के खिलाफ लड़ने की एक साझा भाषा गढ़ रहा है. भले ही अलग-अलग जगहों पर यह आंदोलन अलग-अलग वजहों से भड़के हों, इन सबकी जड़ एक ही है – बढ़ती असमानता, बेरोजगारी, आर्थिक असुरक्षा, भ्रष्टाचार, सेंसरशिप, और सत्ताधारियों का बेशर्म भाई-भतीजावाद.
इन सबके बीच एक दूसरा पहलू भी है – दमन और डर के बीच उम्मीद को कैसे जिंदा रखा जाए. जब जनता को जेल, पुलिस हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का डर दिखाकर चुप कराने की कोशिश की जाती है, तब प्रतिरोध सिर्फ सत्ता से लड़ने का सवाल नहीं रह जाता. यह एक-दूसरे के लिए डटकर खड़े होने का और समाज को कायरता और बेबसी की आदत से बाहर निकालने का सवाल बन जाता है.
ऐसे हालात में, लेफ्ट छात्र संगठन ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक, नेहा बोरा से बातचीत खास मायने रखती है – जिन्होंने अपनी भूख हड़ताल खत्म करने के कुछ ही घंटों बाद ‘ओपनडेमोक्रेसी’ से बात की.
यह इंटरव्यू स्पष्टता के लिए हल्के संपादन के साथ प्रस्तुत किया गया है.
अमन सेठी: अभी हमारी बात हो रही है, और आपने अभी-अभी 23 दिन की भूख हड़ताल खत्म की है. यह वक्त ज्यादातर लोगों के लिए सोचने से भी बाहर है.
नेहा बोरा: यह शरीर के बारे में उतना नहीं था, जितना दिमाग के बारे में था. शरीर तो ढल जाता है, एडजस्ट कर लेता है, लेकिन कई बार शरीर बता देता है कि बस बहुत हो गया. अब इसका फायदा क्या?
दिमाग ही है जो आपको आगे बढ़ाता रहता है. हम बायोपाॅलिटिक्स के बारे में पढ़ते हैं कि कैसे इंसान को उसके शरीर तक सीमित कर दिया जाता है. तो वही हमारे साथ भी हुआ. दिन में तीन-चार बार हमारा खून लिया जाता, ब्लड प्रेशर चेक होता, शुगर लेवल देखा जाता. सब कुछ. हम बस कुछ नंबरों में सिमट गए थे. हम बस ऊपर-नीचे होती रीडिंग्स बनकर रह गए थे. हमारी एक साथी, जो पहले 21 दिन बिना खाए बैठी थी, रोज आती और अपनी भूख हड़ताल की कहानियां सुनाती. वो कहती कि यह शरीर से ज्यादा दिमाग का मामला है.
यह एक सार्वजनिक जगह है, तो यहां बैठे हैं तो लोग हमेशा आस-पास रहते हैं, फोटो खींचते रहते हैं. लोग आकर हमें अपना साथ, समर्थन, प्यार, अपनापन देते. यह सब उसी वजह से चला.
अमन सेठी: जरा अपने राजनीतिक सफर के बारे में बताइए. ऐसे वक्त में जब मीडिया, शिक्षण संस्थान और सांस्कृतिक संस्थान, सब पर सरकार का कब्जा हो चुका है. ऐसा कौन सा राजनीतिक और वैचारिक सफर रहा जो आपको दिल्ली की सड़क पर इस सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बिठा दिया?
नेहा बोरा: मुझे लगता है यह सफर वैसा ही रहा जैसा उन सबका होता है जो अपने जीवन की शुरुआत में राजनीति से नहीं जुड़े होते.
मैं राजनीति में थिएटर के रास्ते आई. यूनिवर्सिटी के दूसरे साल में मैं एक थिएटर ग्रुप से जुड़ी, जो असल में एक सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं का समूह था. उसी ने मुझे यह समझने में मदद की कि राजनीति सिर्फ विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों का नाम नहीं है. राजनीति हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में मौजूद है. यह हमारी भाषा में है. हमारे शरीर में है. हम खुद को कैसे व्यक्त करते हैं, कौन-सी भाषा इस्तेमाल करते हैं, किन मुद्दों को उठाते हैं, इन सबमें राजनीति मौजूद है.
थिएटर ने मुझे यह समझाया कि हम चाहे जैसे भी जिएं, चाहे राजनीति को राजनीति कहकर उसे अपनाएं, या लगातार खुद को ‘अराजनीतिक’ बने रहने का दावा करके राजनीति से दूर रहने की कोशिश करें, राजनीति तो हमारे साथ होती ही रहती है. और अगर हमें इसमें कोई दखल चाहिए, तो बेहतर है हम समझें कि हमारे आस-पास हो क्या रहा है.
फिर, बाकी युवाओं की तरह, 2019 हमारे जीवन में आया, जब सीएए के खिलाफ आंदोलन हुआ. उस आंदोलन ने आम लोगों को कुछ और बना दिया. लोग वही थे. वही लोग सुबह उठते, धरने पर बैठते, गाने सुनते, एक-दूसरे से बात करते. लेकिन भाषा बदल गई थी. सड़क पर चार-पांच साल के बच्चे दौड़ते हुए भगत सिंह की बातें कर रहे थे.
लोग एक-दूसरे को ज्यादा साथ और अपनापन देने लगे, और बात सिर्फ सीएए प्रोटेस्ट की नहीं थी. बात यह थी कि जब लोग साथ आते हैं, तो एक अलग दुनिया, एक अलग जगह बन सकती है. और मुझे लगता है कि उस पल को जिसने भी अपनी आंखों से देखा, वह फिर पहले जैसा नहीं रह सकता. हम उस अनुभव से पीछे नहीं लौट सकते. हम उस घटना से, उससे मिली सीख से और अपने बारे में तथा जिस दुनिया में हम रहते हैं, उसके बारे में जो समझ पैदा हुई, उससे मुंह नहीं मोड़ सकते.
फिर किसानों का आंदोलन हुआ और अब यह आंदोलन हमारे सामने है.
लोग कहते हैं कि फासीवाद का दौर भयानक दमन का दौर होता है. यह बड़ी क्रूरता, बड़ी नफरत का वक्त होता है. लेकिन इतिहास, यही इतिहास, यह भी बताता है कि जब दमन बहुत बढ़ जाता है, तब नए तरह के प्रतिरोध को जन्म देने वाले दौर भी होते हैं. और इस देश की जनता आज यही कर रही है.
लोग इतने बड़े दमन का सामना कर रहे हैं. उम्रभर जेल में डाल दिए जाने के खतरे का सामना कर रहे हैं. पुलिस की यातनाएं झेल रहे हैं. लोग इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि सच मरने न पाए. और यह हम इंसानों के समाज के लिए बहुत मायने रखता है – कि हम इतना कुछ कर सकते हैं, कि हम अपनी तुरंत की जरूरतों और तुरंत के जज्बातों से कहीं बड़ी कोई चीज कर सकते हैं.
अमन सेठी: जब आप 2019 के सीएए प्रोटेस्ट या 2020 के किसान आंदोलन की बात करती हैं, तो आप एक तरह से पहले के प्रतिरोध से इसका नाता जोड़ रही हैं. [ सीएए प्रोटेस्ट 2019 में एक बहुत बड़ा उभार था, मोदी सरकार के उस कानून के खिलाफ जो भारत के मुस्लिम नागरिकों के हक छीनने के लिए लाया गया था. यह प्रोटेस्ट आखिर में जबरदस्ती, हिंसा से तोड़ दिया गया और कई छात्रों को जेल भेज दिया गया – कुछ अभी भी बिना जमानत जेल में हैं, जबकि उनके केस की सुनवाई तक नहीं हुई है.] इस खास प्रोटेस्ट में ऐसा क्या है जो आपको सबसे अलग लगता है?
नेहा बोरा: मुझे लगता है यह मेरा इस तरह के प्रोटेस्ट का पहला अनुभव है. यहां जो सबसे ज्यादा लोग आ रहे हैं, वो पहली बार किसी प्रोटेस्ट में आए हैं. वो रोज यहां आते हैं, और दर्जनों की तादाद में हमें बताते हैं – ‘यह हमारा पहला प्रोटेस्ट है.’
यह वही लोग हैं जो घर बैठकर हमें ‘देशद्रोही’ कहते थे. [आमतौर पर ] अगर टीवी पर बता दिया जाता कि यहां बैठे लोग किसी लेफ्टटिस्ट गुट के हैं, जाॅर्ज सोरोस की साजिश है या कुछ और – तो ये लोग यकीन कर लेते. लेकिन इसी प्रोटेस्ट ने उन्हें ऐसी बातों पर यकीन न करना सिखाया.
हम उन्हें बताते हैं: आपको यह समझना होगा कि इससे पहले जिस-जिस को ‘देशद्रोही’ कहा गया, जिसे आपने देशद्रोही मान लिया, जिसका ‘पब्लिक ट्रायल’ आपने टीवी पर देखा और यकीन किया, जिसके ट्रायल में आपने भी हिस्सा लिया, जिसे आपने सोशल मीडिया पर ट्रोल किया – वो सब लोग, आप ही हैं. और अगर आज आप उन बातों पर यकीन नहीं कर रहे जब आपको खुद देशद्रोही कहा जा रहा है, तो शायद वो भी देशद्रोही नहीं थे.
सरकार जिस तरह से हमें ‘दूसरे’ नागरिक को देखना सिखाती है, शायद अब वक्त है कि हम उस पर दोबारा सोचें, क्योंकि आज के दौर में हर परिभाषा फिर से लिखी जा रही है. यह फिर से लिखा जा रहा है कि सरकार आम लोगों के साथ क्या-क्या कर सकती है, यह फिर से लिखा जा रहा है कि किस हद तक की यातना माफी लायक है. मुझे लगता है इजराइल दुनिया के दमनकारी देशों के लिए नई मिसालें और नई परिभाषाएं गढ़ रहा है – कि लोगों के साथ क्या किया जा सकता है, जबकि पूरी दुनिया बस देखती रहती है. और हमारा देश भी यही सीख रहा है. हमारा देश बहुत लंबे समय से इजराइल से सीखता आया है – नाॅर्थ-ईस्ट में, कश्मीर में. सीखता रहा, सीखता रहा, और अब वही अपने ही नागरिकों पर आजमा रहा है. इस प्रोटेस्ट ने यह मुमकिन बनाया है कि अब ऐसा न चले. और यही नई बात है.
अब तक बस गिने-चुने लोग ही बोल पाते थे, बस वही बोलते थे. लेकिन अब यह बात कि आम नौजवान आगे आ रहे हैं और बोल रहे हैं – यह हमारे लिए बहुत मायने रखता है. यही चीज इस आंदोलन को अहम बनाती है, चाहे लोग इसकी जितनी भी आलोचना करें. यही इसे हमारे लिए जरूरी बनाता है.
अमन सेठी: एक तरह का एहसास है कि मोदी सरकार पहले कभी इतनी ताकतवर नहीं थी, लेकिन साथ ही कभी इतनी कमजोर भी नहीं रही. आप इस पल को कैसे देखती हैं?
नेहा बोरा: मैं बिल्कुल वैसे ही देखती हूं जैसे आपने कहा. मेरा मानना है – कोई सरकार जितनी ज्यादा दमनकारी होती है, जितनी क्रूर होती है, अंदर से उतनी ही डरी हुई होती है, क्योंकि उसे पता होता है वो क्या कर रही है. यह बात पहले के सभी दमनकारी, फासीवादी सरकारों पर सच रही है, और इस सरकार पर भी उतनी ही सच है.
सरकार में बैठे जो लोग आज आम नागरिकों पर हिंसा को जायज ठहरा रहे हैं – उन्हें पता है कि आगे उनका क्या इंतजार कर रहा है. उन्हें पता है इतिहास की किताबों में उनके बारे में क्या लिखा जाएगा. उन्हें पता है इतिहास उनके साथ क्या करेगा, जब उनका फैसला होगा तो वो कहां खड़े होंगे.
तो मैं पूरी तरह मानती हूं कि यह सरकार जितनी मजबूत और दमनकारी पहले कभी नहीं थी, उतनी ही कमजोर भी है – इतनी कमजोर कि 23 दिन से भूखे बैठे लोगों से भी आपको डर लगता है. बस इतनी ही कमजोर है आपकी सरकार.
अमन सेठी: ऐसे वक्त में इंसान मकसद और मतलब कैसे ढूंढे? आपने अपना मकसद कैसे ढूंढा?
नेहा बोरा: हमारी एक साथी कह रही थीं कि आज जिन हालात का हम सामना कर रहे हैं, उसमें उम्मीद को जिंदा रखने के लिए उसे हर रोज सींचना होगा. यह हमें यूं ही मिलने वाली नहीं. यह हर वक्त, हर जगह मौजूद नहीं रहेगी. हमें इसे छोटी-छोटी चीजों में ढूंढना होगा, इसे रोज सींचना होगा, इसे तराशना होगा, इसे इतना मजबूत बनाना होगा कि यह टूटे नहीं.
तो जब हम देखते हैं कि बराबरी की मांग करने वाले प्रोटेस्टर्स को जेल भेजा जा रहा है, जब हम देखते हैं कि कश्मीर के लोगों को बिना किसी समय-सीमा के जेल में डाला जा रहा है, जब हम फिलिस्तीन और दुनिया भर में लोगों पर होने वाली भयानक यातना देखते हैं, और उससे भी बढ़कर जब हम देखते हैं कि इस यातना और हिंसा पर पूरी दुनिया चुप है, और यहां तक कि इसे जायज भी ठहराया जा रहा है – तब जब हमें उम्मीद नहीं मिलती, तब हम उसे सींचने का काम कर सकते हैं, सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि अपने आस-पास के लोगों के लिए भी.
इस सरकार ने लोगों को कायर बनने की ट्रेनिंग दी है. क्योंकि जब कुछ और दांव पर नहीं होता, तो बस आपकी जान दांव पर होती है. बस आपकी जिंदगी. उससे कम कुछ नहीं. अगर टोपी पहने एक मुसलमान आदमी, जो सड़क पर तरबूज बेच रहा है, उसे सिर्फ इसलिए पीटा जा सकता है क्योंकि वो है – तो समझिए उसे उसके होने की वजह से मारा जा रहा है. तो ये लोग हमें कायर बनने की ट्रेनिंग दे रहे हैं. ये हमें एक जेनोसाइड के लिए तैयार कर रहे हैं. ये हमें सिखा रहे हैं कि जब वो इस देश में सामूहिक हत्याएं करेंगे, तो सब इतने डरे हुए होंगे कि कोई किसी के लिए आवाज नहीं उठाएगा.
और इसीलिए ऐसे आंदोलन बहुत मायने रखते हैं, क्योंकि यह हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि हम कायर नहीं हैं. उन्होंने हमें कायर बनने की ट्रेनिंग दी है, लेकिन जो सिखाया गया है, उसे अनसीखा भी किया जा सकता है. हमें जो भी पल मिले, जो भी मौका मिले, हमें इसे थोड़ा-थोड़ा करके अनसीखना होगा. हमें एक-दूसरे के लिए खड़े होना होगा. यह कोई बड़ी बात होने की जरूरत नहीं. यह सोशल मीडिया पर होने की जरूरत नहीं. यह न्यूज में आने की जरूरत नहीं. लेकिन हमें जितना हो सके, छोटे-छोटे तरीकों से एक-दूसरे के साथ खड़ा होना होगा – और यही एक रास्ता है जिससे उम्मीद जिंदा रह सकती है.
उम्मीद को जिंदा रखना बहुत जरूरी है. मैं थिएटर की छात्रा रही हूँ. ब्रेख्त कहते हैं कि मजलूमों की मजलूमों के लिए एकजुटता जरूरी है, यही दुनिया की एक उम्मीद है.
इसलिए इस देश के लोग – दलित, औरतें, ट्रांसजेंडर, मुसलमान, आदिवासी – वो सब लोग जिन्हें अलग-अलग टुकड़ों में बांट दिया गया है और कहा गया है, ‘तुम अकेले हो, तुम निशाना हो, चुप रहो, वरना तुम भी उन्हीं की जगह होगे’ – हर उस इंसान को, जिसे यह कहा गया है, दूसरे की तरफ हाथ बढ़ाना होगा और ऐसी अटूट एकजुटता बनानी होगी कि सरकार टूट जाए, हमारी एकजुटता नहीं.
https://www.opendemocracy.net/hope-is-a-muscle-neha-bora-on-her-23-day-hunger-strike-at-indias-cockroach-protests/