वर्ष 35 / अंक - 05 / ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने क...

‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम’ 2026 : हंगामा है क्यूं बरपा?

‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम’ 2026 : हंगामा है क्यूं बरपा?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू कर दिए हैं. यह रेगुलेशन गत 15 जनवरी, 2026 से देशभर के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रभावी है. इस रेगुलेशन की खास बात यह है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में समता समिति की संरचना में एससी, एसटी, महिला और दिव्यांग के साथ ही पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य कर दिया गया है. साल 2026 के नियम सुप्रीम कोर्ट में 2019 और 2016 में कथित जाति आधारित भेदभाव को लेकर पायल तडवी और रोहित वेमुला की माताओं की तरफ से दायर 20 याचिकाओं से आए हैं.नई नियमावली के अनुसार प्रत्येक संस्थान में समान अवसर केंद्र (EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा, जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में समाज के सभी वर्गों के लिए समान अवसर और समावेशन सुनिश्चित करना है.

ईओसी के अंतर्गत इक्विटी कमेटी गठित होगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे. कमेटी में ओबीसी, विकलांग, दलित-आदिवासी और महिला का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा. ईओसीको अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी. इक्विटी कमेटी को वर्ष में कम से कम दो बार बैठकें करनी होगी. प्रत्येक संस्थान को ईओसी की कार्यप्रणाली पर वार्षिक रिपोर्ट यूजीसी को प्रस्तुत करनी होगी. इस नियमावली के आने के बाद सवर्ण समुदाय के संगठनों द्वारा देश भर में  विरोध प्रदर्शन किए गए. इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई और सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इसपर रोक लगा दी है.

इस रेगुलेशन को किसी पृथक नीतिगत हस्तक्षेप के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय विश्वविद्यालयों में लंबे समय से चले आ रहे छात्र आंदोलनों के ऐतिहासिक दबाव के संदर्भ में समझा जाना चाहिए. यह कानून उस संस्थागत संकट की स्वीकारोक्ति है, जिसे रोहित वेमुला की आत्महत्या ने सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला दिया था, और पूरे देश में जातिगत भेदभाव के खिलाफ रोहित एक्ट लागू करने की मांग उठी थी. हालांकि इस रेगुलेशन में रोहित एक्ट के मांगों को पूरी तरह से अमल नहीं किया गया है. उसके बावजूद इसका स्वागत किया गया एवं इसको मजबूत करने की मांग उठी. लेकिन यह लागू होने से पहले ही वर्चस्ववादी ताकतों की दबाव की भेंट चढ़ गया.

यूजीसी की यह पहल उच्च शिक्षा में समानता और न्याय की दिशा में एक सकारात्मक कदम है. फिर भी सवर्ण समुदाय में इसे लेकर जो बेचैनी और आक्रोश दिख रहा है, वह बताता है कि समस्या नियमों में नहीं, बल्कि उनके संभावित प्रभावों में है. दिलचस्प यह है कि मोदी सरकार द्वारा कैंपसों के लगातार अलोकतांत्रिकीकरण, बढ़ती फीस को लेकर, छात्र-विरोधी नई शिक्षा नीति को लेकर खुद को सवर्ण हितों का प्रतिनिधि बताने वाले संगठनों और चेहरों ने कभी कोई विरोध नहीं किया. लेकिन जैसे ही एक ऐसा नियम आया जो कैंपसों में व्याप्त जातिगत भेदभाव को चुनौती देता है, ये लोग अचानक आक्रामक हो गए. यह चयनात्मक आक्रोश अपने आप में बहुत कुछ उजागर करता है.

न तो जातिगत भेदभाव अदृश्य है और न ही अनजाना. फिर भी रेगुलेशन का विरोध हो रहा है, क्योंकि यह विरोध भेदभाव के खिलाफ नहीं, बल्कि वर्चस्व के पक्ष में है. इस रेगुलेशन के विरोध में वे लोग भी उतर आए हैं जो खुद को जात-पांत नहीं मानने वाला या ‘डीकास्ट’ बताते रहे हैं. आज वही लोग इस नियम को ‘जातिवादी’ कह रहे हैं. यह तर्क दिया जा रहा है कि यह रेगुलेशन विश्वविद्यालयों को जातिवाद का अखाड़ा बना देगा.

हकीकत यह है कि विश्वविद्यालय पहले से ही जातिवाद के अखाड़े हैं. बस अब तक यह अखाड़ा सवर्ण वर्चस्व के नियंत्रण में था. इस रेगुलेशन के सख्त और ईमानदार क्रियान्वयन से कैंपसों में मौजूद सवर्ण वर्चस्व को सीधी चुनौती मिलेगी.

यह वर्चस्व नामांकन प्रक्रिया में, हॉस्टल आवंटन में, पीएचडी गाइड के चयन में, परीक्षाओं में दिए गए अंकों और ‘नॉट फाउंड सूटेबल’ तक हर स्तर पर लागू है. इसका सबसे क्रूर उदाहरण है कि पीएचडी के लिए आवेदन करने के बावजूद आरक्षित वर्ग के छात्रों को ‘योग्य ही नहीं’ माना जाता है और यह खेल सिर्फ आरक्षित सीटों पर ही खेला जाता है.

24 जुलाई, 2025 को राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रिक्तियों का ब्योरा दिया. 30 जून 2025 तक की स्थिति के अनुसार केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी के लिए आरक्षित पदों में 80% खाली पड़े हैं. प्रोफेसर के पदों पर ओबीसी के 423 स्वीकृत पदों में से केवल 84 भरे गए, यानी 80% पद खाली. एसटी के 144 स्वीकृत पदों में से केवल 24 भरे गए, यानी 83» पद खाली. एससी के 308 स्वीकृत पदों में से 111 भरे गए, यानी 64 प्रतिशत पद खाली हैं.

एसोसिएट प्रोफेसर के पदों का भी यही हाल है. एससी के लिए 632 स्वीकृत पदों में से 308 भरे गए, यानी 51% पद खाली हैं. इसी तरह एसटी के 307 स्वीकृत पदों में से 108 भरे गए, यानी 65% पद खाली हैं. और ओबीसी के 883 स्वीकृत पदों में से 275 भरे गए, यानी 69% पद खाली हैं. असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों को देखेंं तो एससी के 1,370 स्वीकृत पदों में से 1,180 भरे गए, यानी 14% पद खाली हैं. इसके अलावा एसटी के 704 स्वीकृत पदों में से 595 भरे गए, यानी 15% पद खाली हैं. इसी तरह ओबीसी के 2,382 स्वीकृत पदों में से 1,838 भरे गए, यानी 23% पद खाली हैं. आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी ओबीसी और एसटी कोटे के प्रोफेसर और सहायक प्रोफेसर पदों में 80-83 प्रतिशत रिक्तियां हैं.

साल 2023 में लोकसभा में सरकार के द्वारा दिए गए आंकड़ों में यह बात सामने आई थी कि 2018 से 2023 के बीच एससी व ओबासी के 13,600 से अधिक छात्रों ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) में अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी. यह महज ‘ड्राप आउट’ नहीं है, बल्कि यह ‘पुश आउट’ है. चूंकि ये संस्थान यूजीसी के द्वारा संचालित नहीं होते हैं, इसलिए आवश्यकता है कि यूजीसी के रेगुलेशन के जैसे ही इन संस्थानों में समता समितियों का गठन हो, ताकि एससी, एसटी और ओबीसी के छात्र-छात्राओं के हितों की रक्षा हो सके.

बहरहाल यूजीसी के नए रेगुलेशन की सबसे बुनियादी अंतर्विरोधात्मक विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत गठित की जाने वाली इक्विटी कमेटियों का नेतृत्व संस्थान प्रमुखों के हाथों में सौंपा गया है. विश्वविद्यालयों के संदर्भ में इसका अर्थ है कि कुलपति, जो कि अकादमिक पूंजी, नौकरशाही सत्ता और सामाजिक विशेषाधिकारों के संकेंद्रण का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे ही समानता और सामाजिक न्याय की निगरानी करने वाले निकायों के अध्यक्ष होंगे. यह व्यवस्था राज्य और संस्थान के प्रभुत्वशाली वर्गीय-जातिगत चरित्र को चुनौती देने के बजाय उसे वैधता प्रदान करता है. अतः यह आवश्यक है कि इस कानून को संशोधित कर यह सुनिश्चित किया जाए कि इक्विटी कमेटियों का नेतृत्व आरक्षित वर्गों से आने वाले व्यक्तियों के हाथों में हो, ताकि सत्ता संबंधों के असंतुलन को आंशिक रूप से ही सही, संबोधित किया जा सके.

इसके अतिरिक्त, छात्र प्रतिनिधित्व की संरचना भी इस कानून की लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है. दिशानिर्देशों के अनुसार छात्रा प्रतिनिधियों का चयन चुनाव के माध्यम से नहीं, बल्कि संस्थागत प्राधिकरणों द्वारा शैक्षणिक या खेल ‘योग्यता’ के आधार पर नामांकन के जरिए किया जाना है. यह योग्यता एक तटस्थ श्रेणी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पूंजी और सामाजिक विशेषाधिकारों से निर्मित एक वैचारिक उपकरण है, जिसके माध्यम से दलित-बहुजन छात्रों को संरचनात्मक रूप से बाहर रखा जाता रहा है. इस प्रकार, नामांकन-आधारित प्रतिनिधित्व छात्र समुदाय से कटे हुए, प्रशासन-उत्तरदायी प्रतिनिधि पैदा करता है, न कि समुदाय-उत्तरदायी.

यह व्यवस्था लोकतांत्रिक जवाबदेही की संभावनाओं को समाप्त कर देती है और निर्णय लेने की समस्त शक्ति विश्वविद्यालय प्रशासन के हाथों में केंद्रित कर देती है. इसलिए यह अनिवार्य है कि इक्विटी कमेटियों में छात्रा प्रतिनिधियों का चयन प्रत्यक्ष और लोकतांत्रिक चुनावों के माध्यम से किया जाए, ताकि वे वास्तविक अर्थों में छात्र समुदाय के सामाजिक अनुभवों और राजनीतिक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर सकें.

ऐतिहासिक अनुभव यह दर्शाता है कि जिन संस्थागत तंत्रों में अधीनस्थ समुदायों की वास्तविक भागीदारी और नियंत्रण सुनिश्चित नहीं किया गया, वे अंततः प्रतीकात्मक और निष्प्रभावी बनकर रह गए. एंटी-रैगिंग सेल या महिला उत्पीड़न निवारण के लिए गठित ‘जीएस कैश’ जैसे निकायों का सीमित प्रभाव इसी संरचनात्मक कमजोरी का परिणाम है. यदि यह कानून भी लोकतांत्रिक, प्रतिनिधिक और पुनर्वितरणकारी सिद्धांतों पर आधारित नहीं हुआ, तो इसका भविष्य भी इससे भिन्न नहीं होगा. इसलिए यूजीसी का नया रेगुलेशन तभी प्रभावी सिद्ध हो सकता है जब इसे सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों की जाति-वर्ग आधारित सत्ता संरचनाओं में हस्तक्षेप के रूप में रूपांतरित किया जाए.

31 January, 2026