आइए, हम डर, नफरत और कट्टरता के फासीवादी राज के खिलाफ साहस, शिक्षा और तर्क की फुले-अंबेडकर ज्वाला फैला दें !
हम भारत के सबसे महान सामाजिक क्रांतिकारियों में से एक, ज्योतिबा फुले के जन्म की दूसरी शतवार्षिकी से बस एक साल दूर हैं. एक ऐसे समाज में जहां शक्तिशाली और विशेषाधिकार प्राप्त लोग सदियों से ज्ञान पर अपना एकाधिकार जमाकर हावी रहे हैं, जरा उस पहलकदमी की कल्पना कीजिए जो शिक्षा को एक हथियार बनाकर जाति-व्यवस्था और पितृसत्ता, दोनों को चुनौती देती है. झूठ और कट्टरता के अंधकारमय राज का मुकाबला करने के लिए सत्य पर आधारित व्यवस्था की कल्पना कीजिए. कर्ज में डूबे लाखों गरीब किसानों की दुर्दशा को समाप्त करने के लिए कल्याणकारी राज्य द्वारा किसानों के अधिकारों की गारंटी के साथ वैज्ञानिक और आधुनिक कृषि की खोज की कल्पना कीजिए. ज्योतिराव फुले के रूप में उन्नीसवीं सदी के भारत ने इस क्रांतिकारी विचार को पनपते हुए देखा था जो सामंती और औपनिवेशिक परिवेश में एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत से तनिक भी कम नहीं था.
इक्कीस वर्ष की आयु में ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई ने अपने दोस्तों फातिमा और उस्मान शेख की मदद से 1848 में पुणे में शूद्र और अतिशूद्र लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला. इसके बाद 1851 में सभी जातियों की लड़कियों के लिए एक और स्कूल खोला गया, और फिर 1855 में कामकाजी लोगों के लिए एक रात्रि-स्कूल शुरू किया गया. इसे सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि 1848 एक ऐसा ऐतिहासिक वर्ष था जब कम्युनिस्ट घोषणापत्र पहली बार सामने आया था, जिसने पूंजीवादी लूट और औपनिवेशिक क्रूरता से मुक्ति के आंदोलनों के लिए वैश्विक मंच तैयार किया था. इसके तुरंत बाद, 1857 में भारतीय जनता के एक बड़े हिस्से ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया, जो भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में विख्यात हुआ.
1850 के दशक में भारत में शिक्षा के लिए यह संघर्ष केवल निरक्षरता के खिलाफ लड़ाई नहीं थी. यह उस सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ एक सीधी चुनौती थी जिसने आम तौर पर महिलाओं और उत्पीड़ित जातियों के लोगों को औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने से रोक रखा था. इस प्रकार, यह एक ऐसे सामाजिक उथल-पुथल की शुरुआत थी जिसके बिना औपनिवेशिक भारत में वास्तव में कोई राजनीतिक जागृति संभव नहीं हो पाती. बंगाल में विद्यासागर की तरह, महाराष्ट्र में फुले भी विधवा पुनर्विवाह के महान समर्थक थे. उन्होंने विधवाओं के जबरिया मुंडन का विरोध करने के लिए नाइयों की हड़ताल भी आयोजित की थी. 1868 में फुले ने उन लोगों के पीने के वास्ते अपने घर का तालाब खोल दिया, जिन्हें ‘अछूत’ कहा जाता था. यह उस समय से लगभग साठ वर्ष पहले की बात है, जब अंबेडकर ने मुक्त सार्वजनिक संसाधन के रूप में पानी पर समान अधिकार का दावा जताने के लिए ‘महाड़ सत्याग्रह’ का नेतृत्व किया था.
1873 में, फुले ने भारत में जाति व्यवस्था के खिलाफ अपनी महत्वपूर्ण कृति ‘गुलामगिरी’ प्रकाशित की, और इस पुस्तक को अमेरिका में दास प्रथा समाप्त करने के लिए लड़े गए गृहयुद्ध के नाम समर्पित किया. उसी वर्ष, उन्होंने और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने जातिगत पदानुक्रम को तोड़ने तथा महिलाओं और उत्पीड़ित जातियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की. अपने विचारों के कारण रूढ़िवादी तबकों की ओर से लगातार हमलों का सामना करने के बावजूद फुले ने हमेशा उन अन्य विद्वानों और सुधारकों का साथ दिया, जिन्हें सामाजिक कलंक और बदनामी का सामना करना पड़ रहा था – चाहे वह नारीवादी लेखन के लिए ताराबाई शिंदे का बचाव करना हो या फिर पंडिता रमाबाई का, जिन्हें ईसाई धार्म अपनाने के कारण भारी आलोचना झेलनी पड़ी थी.
अंबेडकर द्वारा जाति को राष्ट्र-विरोधी बताने और जाति के विनाश का आह्वान करने से दशकों पहले फुले ने जोर देकर कहा था कि जब तक राजा बलि की धरती के सभी लोग, जैसे शूद्र और अति-शूद्र, भील (आदिवासी) और मछुआरे आदि, सचमुच शिक्षित नहीं हो जाते, अपने लिए स्वतंत्र रूप से सोचने में सक्षम नहीं हो जाते, और समान रूप से एकजुट तथा भावनात्मक रूप से एकीकृत नहीं हो जाते, तब तक कोई भी ‘राष्ट्र’ अपने नाम को सार्थक नहीं कर सकता. जाहिर है, उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में फुले द्वारा व्यक्त की गई राष्ट्रवाद की यह ‘बहुजन’ दृष्टि बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में सावरकर जैसे लोगों द्वारा प्रचारित धर्म-आधारित हिंदुत्व राष्ट्रवाद के बिल्कुल विपरीत है. इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि सत्ता में बैठे सावरकर के वारिस आज फुले को महज एक ‘समाज सुधारक’ तक सीमित करने और उन्हें ईबीसी (आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग) के प्रतीक-पुरुष के रूप में हस्तगत कर लेने के लिए बेताब हैं.
फुले द्वारा दिखाया गया रास्ता भारत की आजादी का मार्ग रोशन करता रहा, विशेष रूप से जातिगत उत्पीड़न और अंधविश्वासी रूढ़ियों से आजादी का मार्ग. 1890 में फुले के गुजरने के ठीक एक साल बाद जन्मे अंबेडकर ने जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के खिलाफ अपने अथक संघर्ष और महिलाओं की शिक्षा व सशक्तीकरण पर अपने एकनिष्ठ केंद्रीकरण के जरिये फुले की विरासत को अपनाया और आगे बढ़ाया. अंबेडकर ने बुद्ध, कबीर और फुले को उन तीन महान गुरुओं के रूप में स्वीकार किया, जिन्होंने उन्हें मानवतावाद और तर्कवाद की दृष्टि प्रदान की तथा स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल मूल्यों को स्थापित करने के उनके मिशन में उन्हें प्रेरित किया. यह एक सुखद संयोग है कि फुले के जन्म की द्वि-शतवार्षिकी, ऐतिहासिक महाड़ सत्याग्रह (20 मार्च 1927) और सामाजिक गुलामी की संहिता ‘मनुस्मृति’ को सार्वजनिक रूप से जलाए जाने (25 दिसंबर 1927) की शताब्दी का भी प्रतीक होगी.
आज फुले और अंबेडकर को याद करना भारत के इतिहास के उन प्रेरणादायक अध्यायों को केवल याद करना भर नहीं है, बल्कि यह फुले-अंबेडकर की विरासत की उस क्रांतिकारी भावना को फिर से जगाने के बारे में है, ताकि आज के भारत में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की लड़ाई को नई ऊर्जा दी जा सके. शिक्षा, जिसे फुले और अंबेडकर दोनों ने तर्क और सामाजिक गतिशीलता का एक बुनियादी साधन माना था, उसे अब फिर से औपनिवेशिक बना दिया गया है, यानी उसे केवल अमीरों और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए सुरक्षित कर दिया गया है, और उसका उपयोग अपनी विचारधारा थोपने, सांस्कृतिक एकरूपता लाने और राजनीतिक नियंत्रण हासिल करने के एक हथियार के रूप में किया जा रहा है. भेदभाव-मुक्त शिक्षण परिसरों की मांग का मजाक उड़ाया जा रहा है, और इसे ‘हमेशा खुद को पीड़ित समझने की लत’ कहकर खारिज किया जा रहा है. फुले-अंबेडकर का वह कल्याणकारी राज्य का सपना, जो भारत के किसानों और मजदूरों के अधिकारों और लाभों की गारंटी देता था, उसे आज एक कॉरपोरेट राज्य द्वारा कुचला जा रहा है, एक ऐसा राज्य जो सारे संसाधनों को लगातार कम से कमतर लोगों के हाथों में सौंप रहा है.
हर नागरिक को समानता के संवैधानिक प्रतीक के रूप में मिली वयस्क मताधिकार की गारंटी, अब कोई सार्वभौमिक मौलिक अधिकार नहीं रह गई है. लाखों लोगों को सुनियोजित तरीके से मताधिकार से वंचित किया जा रहा है और उन्हें घोर अनिश्चितता भरे जीवन में धकेला जा रहा है. और वह भारतीय राष्ट्रीय पहचान, जिसकी वकालत फुले और अंबेडकर ने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के आधार पर की थी – जो जाति, लिंग और पंथ के आधार पर किसी भी विभाजन और भेदभाव से मुक्त थी – उसे अब सुनियोजित तरीके से ब्राह्मणवादी हिंदू वर्चस्व और सांस्कृतिक बहुसंख्यकवाद के आधार पर नए सिरे से गढ़ा जा रहा है. आइए, हम फुले के जन्म की दूसरी शतवार्षिकी और महाड़ सत्याग्रह तथा मनुस्मृति दहन की शताब्दी के इस अवसर को भय, घृणा और कट्टरता के फासीवादी राज के खिलाफ साहस, शिक्षा और तर्क की फुले-अंबेडकर ज्वाला प्रज्वलित करने का अवसर बना दें.