अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और संयुक्त किसान मोर्चा के एक वरिष्ठ नेता, कामरेड प्रेम सिंह गहलावत का 3 जुलाई 2026 को अचानक हुए “दयाघात के कारण निधन हो गया. वे भाकपा(माले) केन्द्रीय कमेटी के सदस्य थे. कामरेड प्रेम सिंह गहलावत की मृत्यु झुंझुनू राजस्थान में हुई, जहां वे किसान महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक (2-3 जुलाई 2026) में शामिल होने गए थे. झुंझुनू जाते वक्त 1 जुलाई को लोहारू रेलवे स्टेशन पर ट्रेन बदलने के क्रम में वे गिर गए थे. उसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टर ने उनकी दो पसलियों में हल्का फ्रेक्चर बता उन्हें घर पर आराम करने की सलाह दी थी. लेकिन उन्होंने डॉक्टर और संगठन के साथियों की सलाह न मानते हुए घर जाने के बजाय बैठक स्थल में ही आराम करने का निर्णय लिया. 2 जुलाई की सुबह तक उनकी तबीयत में काफी सुधार आ गया था और वे बैठक के पहले सत्र में 2 घंटो तक शामिल भी रहे.
3 जुलाई को बैठक खत्म होने के बाद दिल्ली वापस आने की तैयारी के दौरान उन्होंने सांस लेने में कुछ तकलीफ बताई. उन्हें तुरंत जीप में बिठा कर संगठन के महासचिव का. राजाराम सिंह, उपाध्यक्ष का. फूलचंद ढेवा, राष्ट्रीय सचिव का. पुरुषोत्तम शर्मा, का. डी हरिनाथ और का. आनंद नेगी बैठक स्थल से मात्रा 5 मिनट की दूरी पर स्थित अस्पताल ले ही जा रहे थे कि मात्रा दो मिनट के भीतर – जीप की अगली सीट पर बैठे-बैठे ही – हृदय गति रुकने से उनकी मृत्यु हो गयी. अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. उन्हें पड़ोस के एक दूसरे अस्पताल भी ले जाया गया. वहां भी डॉक्टरों ने यही बताया. का. प्रेमसिंह गहलावत के पुत्र परमिंदर सिंह गहलावत ने बाद में बताया कि 2015 में का. प्रेम सिंह ने दो बार गंभीर हृदयाघात का सामना किया था और तब उन्हें एक सप्ताह तक वेंटिलेटर पर भी रखा गया था. इस हृदयाघात की वजह से अगले 7 वर्षों (ऐतिहासिक किसान आन्दोलन के दौरान तक) उनकी आवाज लड़खड़ाती रही.
अस्पताल से उनके पार्थिव शरीर को वापस बैठक स्थल (सामुदायिक भवन, झुंझुनू) लाया गया. वहां किसान महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों ने उन्हें संगठन का लाल झंडा ओढ़ा कर श्रद्धांजलि अर्पित की. उसके बाद रात 11 बजे तक उनके पार्थिव शरीर को झुंझुनू से दिल्ली स्थित भाकपा(माले) के संसदीय कार्यालय 21-मीना बाग लाया गया. सुबह 9 से 11 बजे के बीच आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य, किसान महासभा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यगण, दिल्ली पार्टी संगठन और आइसा के तमाम नेताओं-कार्यकर्ताओं के साथ ही संयुक्त किसान मोर्चा के कई नेताओं, वामपंथी पार्टियों के नेताओं और उनके परिजनों ने उन्हें पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी. उसके बाद उनके पार्थिव शरीर को उनके पैतृक घर धीरपुर, दिल्ली ले जाया गया और दिन में 12.30 बजे धीरपुर के शमशान घाट पर उन्हें अंतिम विदाई दी गई. किया गया. एसकेएम और उससे जुड़े कई किसान संगठनों ने कामरेड प्रेमसिंह गहलावत के निधन पर शोक सन्देश भेजे.
उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों में भाकपा(माले) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, संसदीय दल के नेता राजा राम सिंह, सांसद सुदामा प्रसाद, बिहार विधानसभा में भाकपा(माले) विधायक दल के नेता अरुण सिंह, पूर्व सांसद हन्नान मौलाह और पी कृष्णा प्रसाद, अखिल भारतीय किसान सभा के पंडित रविशंकर लेन, अखिल भारतीय किसान सभा (अजय भवन) के अध्यक्ष राजन क्षीरसागर, क्रांतिकारी किसान यूनियन के अर्जुन प्रसाद सिंह, ऑल इण्डिया किसान खेत मजदूर संगठन के आरके शर्मा, एआईयूकेएस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विमल त्रिवेदी, सीपीएम के दिल्ली राज्य सचिव अनुराग शर्मा, भाकपा(माले) के दिल्ली राज्य सचिव रवि राय, इफ्टू और एआइकेएमएस की ओर से राजेश, भाकपा(माले) पोलित ब्यूरो के व वरिष्ठ नेता प्रभात कुमार चौधरी, आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष और जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठी नेहा, आइसा महासचिव प्रसन्नजीत, ऐक्टू के राष्ट्रीय महासचिव राजीव डिमरी, ऐपवा की दिल्ली सचिव श्वेता राज, जसम से प्रो. गोपाल प्रधान, प्रणय कृष्ण, नवारुण के संजय जोशी, शिक्षक नेता उमा राग, पत्रकार भाषा सिंह और महेंद्र मिश्र और एनर्साइं बालाजी और विकास (दिल्ली), राजविंदर सिंह राणा, कंवलजीत सिंह, आयुष (पंजाब व चंडीगढ़) और सुखविंदर सिंह रतिया, ओम प्रकाश आर्या और विनोद (हरियाणा) आदि भाकपा(माले) नेताओं के साथ ही प्रेमसिंह गहलावत के बेटे परमिंदर सिंह गहलावत के साथ ही वहां मौजूद बिहार, यूपी, झारखंड, पंजाब, उड़ीसा, प. बंगाल, आन्ध्र प्रदेश किसान महासभा राज्य इकाइयों के सचिव क्रमशः उमेश सिंह, ईश्वरी प्रसाद कुशवाहा, राजकुमार यादव, गुरनाम सिंह भिखी, अशोक प्रधान, जयतु देशमुख, डी. हरिनाथ और विभिन्न राज्यों से आए अखिल भारतीय किसान महासभा के नेताओं ने श्रद्धांजलि दी.
राजनितिक सफर
भूमि अधिग्रहण के बाद कामरेड प्रेमसिंह गहलावत का परिवार किसान से एक सामान्य शहरी मध्यवर्गीय परिवार में बदल गया था. अपनी आर्थिक स्थितियों को ठीक करने के लिए उन्होंने दिल्ली से सटे यूपी के लोनी कस्बे में दवा की एक छोटी फैक्ट्री खोली थी. उनका सम्पर्क युवावस्था में ही भाकपा(माले) से हो गया था. मेरठ में मेडिकल प्रेक्टिसनर अपने एक मित्र प्रेमसिंह के जरिए वे यूपी के पूर्व राज्य सचिव का. ईश्वरचंद त्यागी के सम्पर्क हुआ था. दिल्ली के ढका गांव निवासी अपने मित्र डॉ. यशपाल राणा के साथ वे अक्सर उनसे मिलने मेरठ जाते थे. का. ईश्वरचंद त्यागी भी इन दोनों से मिलने धीरपुर आते थे.
दिल्ली में पार्टी संगठन से उनका सीधा सम्पर्क 1986 में हुआ. तभी से वे इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) की दिल्ली इकाई से जुड़ कर सक्रिय राजनीति में आ गए. 1986 में मल्कागंज में आयोजित आइपीएफ के दूसरे दिल्ली राज्य सम्मेलन की व्यवस्था संभालने की जिम्मेवारी निभाई और इसके राज्य उपाध्यक्ष बने. उसके बाद 1988 में उन्होंने दिल्ली के शाह आडिटोरियम में हुए आइपीएफ के राष्ट्रीय सम्मेलन की तमाम व्यवस्थाओं से जुड़ी बड़ी जिम्मेदारी को उन्होंने अपने हाथ में लिया था. आरा लोकसभा क्षेत्र से आईपीएफ के बैनर तले चुने गए पहले सांसद का. रामेश्वर प्रसाद के संसदीय कार्यों में भी वे मददगार बने. उसके बाद तो अपनी दवा फैक्ट्री को बंद कर वे पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए.
1990 में वोट क्लब पर आयोजित ऐतिहासिक ‘दाम बांधो-काम दो’ रैली से लेकर दिल्ली बोर्डर पर साल भर तक लगे ऐतिहासिक किसान महाजुटान तक – दिल्ली में होने वाले बड़े आयोजनों तक वे सबकी व्यवस्था संभालते रहे. उनके रहते न केवल पार्टी बल्कि संयुक्त किसान मोर्चा भी, दिल्ली में होने वाले सभी बड़े आयोजनों की व्यवस्था के लिए उन पर आंख मूंद कर भरोषा करता था. वे हर कठिन काम को अपने जिम्मे लिया, उसे पूरा किया और कभी भी किसी को निराश नहीं किया.
पार्टी ने 2002 में तब उनको किसान मोर्चे पर जिम्मेदारी दी, जब देश भर में बने राज्य स्तरीय किसान संगठनों को जोड़कर एक राष्ट्रीय समन्वय समिति बनाई जा रही थी. 10 मई 2010 को पटना में एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन कर इसे ‘अखिल भारतीय किसान महासभा’ का रूप दिया गया. का. प्रेमसिंह गहलावत इसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चुने गए और इस पद पर अंतिम सांस तक बने रहे. वे पार्टी के हरियाणा राज्य के प्रभारी भी थे. वे एआइकेएससीसी और सयुंक्त किसान मोर्चा के संस्थापक नेताओं में से एक थे. वे सयुंक्त किसान मोर्चा के राष्ट्रीय समन्वय समिति (एनसीसी) के सदस्य, भूमि अधिकार आन्दोलन की राष्ट्रीय समन्वय समिति के सदस्य और ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम (एआइपीएफ) की राष्ट्रीय समन्वय समिति व सचिवालय के सदस्य थे. भाकपा(माले) केन्द्रीय कार्यालय के संचालन के लिए बनी मुख्यालय टीम के भी वे सदस्य थे. 11वें पार्टी महाधिवेशन (फरवरी 2023, पटना) से वे केंद्रीय कमेटी में स्थाई आमंत्रित सदस्य के बतौर शामिल किए गए थे.
2015 से ही स्वास्थय सम्बन्धी दिक्कतों के बावजूद का. प्रेमसिंह ने पार्टी और किसान आन्दोलन के हर आयोजन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. वे खराब स्वास्थय के बावजूद 2017 से 2019 तक एआइकेएससीसी के नेतृत्व में देश भर में चली 10 हजार किलोमीटर की पूरी ‘किसान मुक्ति यात्रा’ में शामिल रहे.
कामरेड प्रेमसिंह गहलावत के इस जज्बे को सलाम! भारतीय क्रांति में उनका योगदान हमेशा याद रखा जायेगा!
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पुरखे बने थे भूमि अधिग्रहण के पहले शिकार
सन 1906 के करीब अंग्रेजों ने जब दिल्ली को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया और आज भारत की सत्ता के केंद्र बने ‘लुटियन जोन’ के लिए जिन गांवों की जमीनों को अधिग्रहित किया, उनमें का. प्रेम सिंह गहलावत के पुरखों का गांव ‘मालचा’ भी था. एह 1800 एकड़ में फैला एक कृषि प्रधान गांव था. विदेशी दूतावासों से भरी दिल्ली की चाणक्यपुरी मालचा गांव की जमीन पर ही बसी है. 1911 में अंग्रेज अपनी नई राजधानी दिल्ली आ गए. विस्थापन के बाद गांव के ज्यादातर परिवारों ने हरियाणा में जाकर एक नया मालचा गांव बसा दिया था. पर कामरेड प्रेमसिंह के परदादा ने अपने रिश्तेदारों के गांव धीरपुर दिल्ली में ही बसने का निर्णय लिया. यह गांव दिल्ली विश्वविद्यालय के काफी करीब है और आज दिल्ली का हृदय स्थल बना हुआ है. अंग्रेजों ने मालचा के किसानों को भूमि अधिग्रहण के बाद भूमि का पर्याप्त मुआवजा नहीं दिया. मालचा से विस्थापितों की चौथी-पांचवीं पीढ़ी के कुछ लोग अभी भी अपने पुरखों की भूमि के मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे हैं.
रूलदूसिंह और प्रेमसिंह की चर्चित जोड़ी
ऐतिहासिक किसान आंदोलन में चर्चित किसान नेता रूलदू सिंह मानसा (खुण्डे वाले बापू के नाम से मशहूर) और प्रेमसिंह गहलावत की जोड़ी पंजाब-हरियाणा की एकता का प्रतीक बनी हुई थी. पूरे 13 माह के आंदोलन में चाहे हर बार्डर का दौरा करना हो, या सयुंक्त किसान मोर्चा की बैठक हो, सयुंक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि के तौर पर सरकार से वार्ता के लिए जाना हो या किसानों की रैली में जाना हो, रूलदूसिंह मानसा और प्रेमसिंह गहलावत हमेशा एक साथ जाते थे. अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की यह जोड़ी 13 माह तक चले किसानों के ऐतिहासिक दिल्ली बार्डर आंदोलन में एक ही गाड़ी और एक ही कैम्प में रहते थे.
श्रद्धांजलियां
....... उनके बिना कोई भी बैठक उतनी रोचक नहीं होती थी. एआईकेएससीसी के दिनों और उसकी यात्राओं से लेकर संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के विकास तक, वे न केवल एआईकेएम के पक्षों का दृढ़ता से प्रतिनिधित्व करते थे, बल्कि विभिन्न संगठनों द्वारा लिए गए पक्षों का प्रासंगिक, अक्सर विषयांतर करते हुए भी, विश्लेषण प्रस्तुत करते थे, जो सभी के लिए विचार का विषय बन जाता था.
उनका योगदान केवल चर्चाओं तक सीमित नहीं था. विशाल जनसमागमों के दौरान वे घंटों अपने पैरों पर खड़े रहकर व्यक्तिगत रूप से अनगिनत संगठनात्मक व्यवस्थाओं को संभालते थे – एक कठिन जिम्मेदारी, जिसे उन्होंने अपनी बढ़ती आयु के बावजूद उल्लेखनीय दक्षता के साथ निभाया.
– एआइकेएमएस (अखिल भरतीय किसान मजदूर सभा)
...... उनके असमय निधन की खबर ने पार्टी, किसान महासभा और व्यापक लोकतांत्रिक व जन-आंदोलनों को गहरा सदमा पहुंचाया है. इस साल की शुरुआत में 80 साल के होने के बावजूद, कामरेड प्रेम सिंह गहलावत हमेशा की तरह सक्रिय और प्रतिबद्ध बने रहे. वे पार्टी के कार्यक्रमों, संगठनात्मक कार्यों और जन-संघर्षों में पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लेते रहे और अपनी अटूट निष्ठा, सादगी और क्रांतिकारी भावना से साथियों को प्रेरित करते रहे. उनका अचानक जाना आंदोलन के लिए एक अपूरणीय क्षति है.
– केन्द्रीय कमेटी, भाकपा(माले), लिबरेशन
...... कामरेड प्रेम सिंह गहलावत को हम जो सबसे बड़ी श्रद्धांजलि दे सकते हैं, वह सिर्फ उनके लिए दुख मनाना नहीं है, बल्कि उस आंदोलन को मजबूत करना है जिसे उन्होंने बनाने में मदद की.
– भूमि अधिकार आंदोलन