बिहार दशकों से बहुआयामी गरीबी का सामना कर रहा है. बिहार जाति आधारित गणना 2023 के मुताबिक, राज्य के 94 लाख परिवार, यानी 34.13% घर, गरीब हैं जिनकी मासिक आमदनी 6 हजार रुपये से कम है. राज्य के एक तिहाई से ज्यादा परिवार रोजाना महज 200 रुपये में गुजर-बसर करते हैं. इनमें सबसे गरीब अनुसूचित जाति के लोग हैं, जिनमें से करीब 44% परिवार इस सीमा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं. करीब 50% परिवार मजबूरी में पलायन (आईआईपीएस, 2020) को मजबूर हैं. ये आंकड़े राज्य में गरीबों की उस आर्थिक मुसीबत को उजागर करते हैं, जहां रोज के बुनियादी खर्चे भी पूरे करना मुश्किल है. संरचनात्मक समर्थन के अभाव, खस्ताहाल सार्वजनिक संस्थानों और सामाजिक सुरक्षा की कमी के चलते, गरीब महिलाएं घर के बुनियादी खर्चों के लिए माइक्रोफाइनेंस कंपनियों पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं.
माइक्रोफाइनेंस को गरीब महिलाओं के जीवन में ‘सशक्तिकरण’ के वादे के साथ लाया गया, लेकिन ऊंचे ब्याज के बोझ ने जल्द ही इसे एक जबरन और शोषणकारी जाल में बदल दिया. उनकी ‘भरोसेमंद ग्राहक’ होने की छवि सशक्तिकरण से नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक कमजोरी से पैदा होती है. कर्ज वसूली के जबरन तरीके सामाजिक हिंसा और सार्वजनिक अपमान पर निर्भर करते हैं, जिसे नृवंशविज्ञानी लामिया करीम “शर्म के स्थानीय बाजार” कहती हैं. आखिर में, यह पितृसत्तात्मक वर्चस्व को और मजबूत करता है.
जीविका से जुड़ी महिलाओं के बयानों से पता चला कि कर्ज ज्यादातर रोजमर्रा के खर्चों जैसे दवा के खर्च, स्कूल की फीस या शादी के खर्च के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. महिला कर्ज लेने वालों ने वसूली एजेंटों द्वारा परेशान किए जाने की बार-बार शिकायत करती रही हैं. एमएफआई एजेंटों द्वारा जबरदस्ती वसूली के तरीके आम हैं जो महिला उधारकर्ताओं की गरिमा और सुरक्षा का गंभीर उल्लंघन करते हैं. कई महिलाओं ने डराने-धमकाने और उत्पीड़न की घटनाओं की रिपोर्ट की, जिनमें एजेंटों का उधारकर्ता के घर जाकर आधी रात तक बैठे रहना, गैस सिलेंडर या छत के पंखे जैसी घरेलू चीजें जब्त करना, महिलाओं और परिवारों को उनके घरों से बाहर ताला लगाकर बुनियादी सुविधाओं से वंचित कर देना, और परिवार के सदस्यों को डराना या आधार कार्ड और सरकारी योजनाओं की पहुंच बंद करने की धमकी देना शामिल है. कर्ज चुकाने से बचने के लिए आत्महत्या और जबरन पलायन की भी कई रिपोर्टें सामने आई हैं.
माइक्रोफाइनेंस की कहानी
भारत में माइक्रोफाइनेंस की शुरुआत पुराने साहूकारी सिस्टम से हुई. फिर वर्ल्ड बैंक की मदद से बने सेल्फ-हेल्प ग्रुप (SHG) आए, उसके बाद बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक से प्रेरित जॉइंट लायबिलिटी ग्रुप मॉडल महिलाओं के लिए अपनाया गया. आगे चलकर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) ने इसे और फैलाया. बिहार का जीविका प्रोजेक्ट (2007 से) ने SHG को रोजगार और छोटे कर्ज से जोड़ कर इसे औपचारिक रूप दिया.
मोहम्मद यूनुस ने 1983 में ग्रामीण बैंक शुरू किया ताकि गरीब महिलाओं को साहूकारों के शोषण से मुक्ति मिल सके. उनका मानना था कि कम ब्याज पर छोटे कर्ज (माइक्रो-क्रेडिट) से महिलाएं धीरे-धीरे महाजन के कर्ज-जाल से निकल सकती हैं. ग्रामीण बैंक सफल हुआ क्योंकि यह कम ब्याज पर जरूरत के मुताबिक कर्ज देता था. गरीब महिलाओं के पास जमानत नहीं होती थी, इसलिए वे आम बैंकों से कर्ज नहीं ले पाती थीं. ग्रामीण बैंक के सॉलिडेरिटी सर्कल या जॉइंट लायबिलिटी ग्रुप ने “सोशल जमानत” का काम किया, जिससे कर्ज वापसी की दर बहुत ऊंची रही और पहली बार वे बैंक से कर्ज ले पाईं.
जल्द ही अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसियों ने इसे बढ़ावा दिया. 1980-90 के दशक में माइक्रोफाइनेंस को गरीब महिलाओं को सशक्त बनाने और गांवों में छोटे कारोबार बढ़ाने का तरीका माना गया.
लेकिन समय के साथ ग्रामीण बैंक मुनाफाखोर वित्तीय संस्था बन गया. यह सरकार की सब्सिडी और बाहरी फंड पर निर्भर था, इसलिए कम ब्याज बनाए रखना मुश्किल हुआ. 1970 के बाद से फैले नवउदारवाद (neoliberalism) के दबाव में खुद को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने की होड़ बढ़ी. धीरे-धीरे इसने कारोबार का रूप ले लिया और “दान-परोपकार” के नाम पर मुनाफे का धंधा बन गया. मुनाफा बढ़ाने के लिए ब्याज दरें तेजी से बढ़ीं. अब मकसद गरीबी घटाने के बजाय सिर्फ वित्तीय सेवाएं देने का रह गया. ज्यादा ग्राहक जोड़ने और पुराने ग्राहकों को पकड़े रखने की होड़ में “हार्ड-सेलिंग” यानि जबरदस्ती कर्ज की प्रथाएं शुरू हुई. गरीबों को बार-बार कर्ज लेने के लिए उकसाया गया, जिससे वे और गहरे, स्थायी माइक्रो-कर्ज में फंसते चले गए.
माइक्रोफाइनेंस के पक्ष में कई दलीलें दी जाती हैं, जिनसे इसे आज भी प्रासंगिक बताया जाता है. कहा जाता है कि यह आय बढ़ाने वाली गतिविधियों को सहारा देता है और अंततः गरीबों को गरीबी से निकालने में मदद करेगा. लेकिन सबूत बताते हैं कि माइक्रोफाइनेंस गरीबी को टिकाऊ तरीके से काम नहीं करता, बस थोड़े समय के लिए वित्तीय सहारा दे पाता है. ज्यादातर कमाई उपभोग पर खर्च हो जाती है और बचत के लिए बहुत कम बचता है, जिससे लोग बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए फिर से कर्ज लेने को मजबूर होते हैं. यह भी दावा है कि माइक्रोफाइनेंस महिलाओं को स्वरोजगार और बाजार तक पहुंच के जरिए सशक्त करता है. सरकारें, विश्व बैंक और एनजीओ भी स्वरोजगार को बढ़ावा देते हैं और आय बढ़ाने वाली गतिविधियों के लिए माइक्रो-लोन उपलब्ध कराते हैं. लेकिन 1990 के दशक के मध्य में ग्रामीण बैंक के एक अध्ययन में पाया गया कि 70% कर्ज गैर-आय सृजन कामों में खर्च हुआ. विकास के नजरिए से स्वरोजगार का विचार भी समस्याग्रस्त है, क्योंकि यह बस जीविका के संघर्ष को आदर्श बनाता है, काम को अनौपचारिक करता है और ट्रेड यूनियनों जैसी अधिकार-आधारित संस्थाओं को कमजोर करता है. रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझे गरीब परिवारों के पास सामूहिक प्रयासों के लिए न समय होता है, न ऊर्जा और न ही जरूरी जानकारी.
गैर-सरकारी सेक्टर ने ग्रामीण बैंक जैसे मॉडल और प्राइवेट कंपनियों के जरिए माइक्रोफाइनेंस को बढ़ावा दिया, तो सरकार ने स्टेट रूरल लाइवलीहुड मिशन (SRLM) के तहत सेल्फ-हेल्प ग्रुप (SHG) के माध्यम से अपना मॉडल आगे बढ़ाया. लेकिन महिलाओं की सहकारी समितियों को मजबूत करने या खेती-आधारित उद्योगों में निवेश करने के बजाय, सरकारी नीति का झुकाव बड़े पैमाने पर माइक्रो-लोन बांटने की ओर हो गया है. हाल ही में जीविका ने “जीविका बैंक” शुरू किए हैं, जो 12% ब्याज (यानि लगभग वाणिज्यिक दर) पर 3 लाख रुपये तक का कर्ज दे रहे हैं.
– वंदना प्रभा