माननीय सभापति महोदया,
बहुत से सदस्यों ने महात्मा गांधी जी को उद्धृत किया है. मैं भी उन्हीं से आरंभ करना चाहता हूं. वंदे मातरम् पर चर्चा करते समय हमें गांधी जी की बात याद रखनी चाहिए. यह मायने नहीं रखता कि इसका स्रोत क्या था या यह कब और कैसे रचा गया था – वंदे मातरम बंगाल के हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सबसे शक्तिशाली युद्ध घोष बन गया था.
संविधान सभा ने इस विषय पर गहन चर्चा की थी और गीत के पहले दो छंदों को भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया था, जबकि ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान का दर्जा दिया गया था. यह बहस तब सुलझ चुकी थी. आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बहस करें – क्या कंपनी राज्य के पुनर्जन्म और ब्रिटिशों के सांप्रदायिक विभाजनकारी एजेंडे को अनुमति दी जानी चाहिए, या फिर मतदाता सूची में हेरफेर और वैश्विक दबावों के सामने भारतीय जनता की संप्रभुता की रक्षा की जानी चाहिए.
महोदया, यह खेदजनक है कि प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने उस स्टैंजा को उद्धृत नहीं किया जिसे राष्ट्रगान के रूप में लंबे समय से गाया जा रहा है. उन्होंने वंदे मातरम् के अन्य अंशों को उद्धृत किया, लेकिन उस हिस्से को नहीं, जिससे यह बहस पुनः खोलने का प्रयास हुआ. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है.
मोदी जी में यह साहस है कि वे एक ओर बिरसा मुंडा का नाम लेते हैं और दूसरी ओर जंगलों की कटाई कर आदिवासियों को उनके अधिकार से वंचित करते हैं. वे बाबा साहब अंबेडकर का नाम लेते हैं और साथ ही संविधान का उल्लंघन भी करते हैं.
भारतीय राष्ट्रवाद की जड़ें एंटी-ब्रिटिश आंदोलन में हैं. 1857 से पहले देश में अनेक रियासतें थीं – पटियाला, ग्वालियर, सिंधिया आदि. एक राजा दूसरे को हराकर अपने राज्य का विस्तार करता था. लेकिन 1857 का आंदोलन वह मोड़ था जिसने भारतीय राष्ट्र की अवधारणा को जन्म दिया. आज प्रश्न यह है कि क्या हम वर्तमान साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारतीय राष्ट्र को खड़ा कर पा रहे हैं, या फिर वैश्विक शक्तियों के सामने आत्मसमर्पण कर रहे हैं?
बंगाल का इतिहास इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है. बंग-भंग आंदोलन धार्मिक आधार पर हुआ था, लेकिन उसी के खिलाफ बंगाल एकजुट हुआ और विद्रोह में उतरा. वह आंदोलन भाषा और एकता का प्रतीक था. आज भी जब सांप्रदायिक ताकतें देश को बांटने का प्रयास कर रही हैं, बंगाल वंदे मातरम् गाकर एकता का संदेश देगा और उन्हें पराजित करेगा.
अंत में, मैं यह कहना चाहता हूं कि सार्वभौमिक मताधिकार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी उपलब्धि थी. धर्म, भाषा, जाति, लिंग और अन्य पहचान से परे सभी लोग एकजुट थे. संविधान ने स्पष्ट कहा है कि नागरिकों के बीच किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं होगा. यह केवल नेहरू की चिंता नहीं थी, बल्कि आज हमारी भी चिंता है.
देश में सभी समुदायों – हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध – की भावनाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. बहुमत की सरकार चल सकती है, लेकिन बहुमतवाद की सरकार नहीं चलनी चाहिए. लोकतंत्र का अर्थ है कि जाति, धर्म और भाषा सभी की आवाज सुनी जाए. यही फासिज्म के विरुद्ध हमारी लोकतांत्रिक पद्धति है.