वर्ष 35 / अंक - 06 / मोहम्मद दीपक को सलाम, प्रतिरोध को सामूहिक बनाइये

मोहम्मद दीपक को सलाम, प्रतिरोध को सामूहिक बनाइये

मोहम्मद दीपक को सलाम, प्रतिरोध को सामूहिक बनाइये

-- शांतम निधि

जनवरी 2026 के अंतिम दिनों में उत्तराखंड के एक छोटे से शहर कोटद्वार में जो हुआ, वह किसी स्थानीय विवाद की कहानी नहीं है. यह उस राजनीतिक व्यवस्था की रोजमर्रा की कार्यप्रणाली को दिखाता है, जिसे आज हम हिंदुत्व फासीवाद के नाम से जानते हैं. मामला एक मुस्लिम स्वामित्व वाली कपड़ों की दुकान से शुरू हुआ, जो स्कूल यूनिफॉर्म और सामान्य वस्त्र बेचती थी. दुकान के नाम में “बाबा” शब्द था. यह कोई नई दुकान नहीं थी. न ही नाम हाल में बदला गया था. यह दुकान वर्षों से चल रही थी, टैक्स देती थी, ग्राहकों की सेवा करती थी, और अब तक किसी विवाद का कारण नहीं बनी थी.

इस दुकान के नाम पर हिंदुत्व संगठनों से जुड़े लोगों, विशेष रूप से बजरंग दल से जुड़े कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई. उनका दावा था कि “बाबा” शब्द हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़ा है और किसी मुसलमान को इसका इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं है. इस दावे का कोई कानूनी आधार नहीं था. भारत के किसी भी कानून में यह नहीं लिखा है कि व्यापार के नाम धर्म के आधार पर तय होंगे. न कोई धोखाधड़ी साबित हुई, न कोई सार्वजनिक नुकसान दिखाया गया. आपत्ति पूरी तरह वैचारिक थी. यह सत्ता दिखाने, सीमा तय करने और अल्पसंख्यकों को सार्वजनिक रूप से अनुशासित करने की कोशिश थी.

इसके बाद जो हुआ, वह आकस्मिक नहीं था. यह एक जाना-पहचाना पैटर्न है. दुकान के पास भीड़ जमा हुई. नारे लगाए गए. दुकानदार और उसके परिवार को डराया गया और दुकान का नाम बदलने का दबाव बनाया गया. माहौल जानबूझकर भयावह किया गया. यह किसी लोकतांत्रिक समाज में विवाद सुलझाने का तरीका नहीं है. यह निगरानी और डर के जरिये राजनीति करने का तरीका है. कानून को दरकिनार कर सड़क पर ताकत दिखाना और यह मानकर चलना कि सामने वाला आखिरकार झुक जाएगा.

इसी दौरान दीपक कुमार, जो उसी इलाके में जिम चलाते हैं, ने हस्तक्षेप किया. जब लोगों से पहचान पूछी जा रही थी और सांप्रदायिक रेखाएं खींची जा रही थीं, तब दीपक ने कहा, “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है.” यह एक साधारण वाक्य नहीं था. यह हिंदुत्व की उस बुनियादी राजनीति का इनकार था, जिसमें मुसलमानों को अकेला छोड़ दिया जाता है, हिंदुओं से चुप रहने की अपेक्षा की जाती है, और भीड़ को बिना रुकावट आगे बढ़ने दिया जाता है.

यह हस्तक्षेप इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंदुत्व फासीवाद पूर्वानुमान पर चलता है. उसे भरोसा होता है कि भीड़ को कोई चुनौती नहीं देगा, आसपास के लोग पीछे हट जाएंगे, और राज्य बाद में केवल कानून-व्यवस्था के नाम पर स्थिति को संभालेगा, दोषियों को नहीं. दीपक ने इस पूरी पटकथा को तोड़ दिया. उन्होंने न तो धर्म पर बहस की, न नैतिक भाषण दिया. उन्होंने बस भीड़ को वह स्पष्टता नहीं दी, जिसके सहारे वह आगे बढ़ती है.

इसके बाद राज्य की भूमिका ने इस राजनीति की गहराई को और उजागर किया. कई एफआईआर दर्ज हुईं. एक अज्ञात लोगों के खिलाफ शांति भंग करने के नाम पर. एक दुकानदार की शिकायत पर. और एक एफआईआर खुद दीपक के खिलाफ. यह उलटाव अब नया नहीं है. डराने-धमकाने की कार्रवाई सामान्य मानी जाती है, जबकि उसके खिलाफ खड़ा होना अव्यवस्था घोषित कर दिया जाता है. एकजुटता को उकसावे के रूप में देखा जाता है.

इस घटना को अलग-थलग करके नहीं समझा जा सकता. इसके पीछे ठोस आंकड़ों से साबित होने वाला एक व्यापक पैटर्न है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े दिखाते हैं कि 2014 के बाद से सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े मामलों में लगातार वृद्धि हुई है, खासकर राजनीतिक रूप से संवेदनशील समयों में. स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक समूहों द्वारा एकत्र किए गए आंकड़े बताते हैं कि 2015 के बाद से गाय के नाम पर या धार्मिक अपमान के आरोपों से जुड़ी मॉब लिंचिंग की घटनाओं में दो-तिहाई से अधिक पीड़ित मुसलमान रहे हैं. इन मामलों में सजा की दर बेहद कम रही है, जिससे अपराधियों को खुली छूट मिलती है.

ईसाई समुदाय के खिलाफ हिंसा भी इसी ढांचे का हिस्सा है. 2017 के बाद से हर साल सैकड़ों घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें चर्चों पर हमले, प्रार्थना सभाओं को रोकना और शारीरिक हिंसा शामिल है. ये घटनाएं अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में हुई हैं और अक्सर पुलिस की निष्क्रियता या देर से हस्तक्षेप के साथ जुड़ी रही हैं. पैटर्न साफ है. पहले डर. फिर प्रशासनिक अस्पष्टता. और अंत में जवाबदेही का अभाव.

लेकिन हिंदुत्व फासीवाद केवल बड़ी हिंसक घटनाओं से नहीं चलता. उसकी असली ताकत रोजमर्रा की असुरक्षा में है. अल्पसंख्यकों के लिए इसका मतलब है कि सामान्य जीवन भी अस्थायी हो जाता है. दुकान का नाम विवाद बन सकता है. खाने की आदत पर हमला हो सकता है. किराए का मकान लेने के लिए धर्म बताना पड़ सकता है. अंतरधार्मिक रिश्ते निगरानी, गिरफ्तारी और सार्वजनिक अपमान का कारण बन सकते हैं. नागरिकता स्थायी अधिकार नहीं रहती. गरिमा एक शर्त बन जाती है.

आर्थिक असुरक्षा इस प्रक्रिया का केंद्रीय हिस्सा है. छोटे व्यापारी, असंगठित क्षेत्र के मजदूर और रोज कमाने-खाने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. डर के कारण दुकान कुछ दिन बंद हो जाए, तो वर्षों की मेहनत बर्बाद हो सकती है. बहिष्कार के आह्वान, भीड़ की धमकियां और सरकारी देरी बिना किसी आधिकारिक आदेश के सजा का काम करती हैं. यही वह तरीका है जिससे फासीवाद खुद को घोषित किए बिना लागू होता है.

इसका मानसिक असर भी गहरा है. लगातार संदेह, डर और थकान लोगों को सार्वजनिक जीवन से पीछे हटने को मजबूर करती है. लोग खुद पर सीमाएं लगाना सीख लेते हैं. यही वह स्थिति है जिसमें संविधान और चुनाव औपचारिक रूप से मौजूद रहते हैं, लेकिन समाज भीतर से बदल चुका होता है.

यही हिंदुत्व फासीवाद की संरचना है. सड़क पर निगरानी और हिंसा, राज्य की नकारात्मक भूमिका, चुनिंदा कानूनी कार्रवाई और आर्थिक दबाव. यह अव्यवस्था नहीं है. यह एक संगठित राजनीतिक परियोजना है.

इस संदर्भ में मोहम्मद दीपक का हस्तक्षेप हिंदुत्व फासीवाद का एक ठोस जवाब है. यह दिखाता है कि यह परियोजना अजेय नहीं है. यह बताता है कि फासीवाद केवल संगठित नफरत से नहीं, बल्कि आम लोगों की चुप्पी से आगे बढ़ता है. जब यह चुप्पी टूटती है, तो पूरी मशीनरी हिल जाती है.

लेकिन यहाँ रुक जाना राजनीतिक रूप से गलत होगा. व्यक्तिगत साहस महत्वपूर्ण है, लेकिन पर्याप्त नहीं. दीपक का कदम संभावनाएँ दिखाता है, पर उसकी सीमाएँ भी. हिंदुत्व फासीवाद संगठित है. उसके पास कैडर हैं, संसाधन हैं, वैचारिक प्रशिक्षण है और प्रशासनिक संरक्षण है. इसका जवाब अलग-थलग खड़े व्यक्तियों से नहीं दिया जा सकता.

निगरानी और हिंसा के खिलाफ संगठित प्रतिरोध सामूहिक, निरंतर और राजनीतिक होना चाहिए. इसे केवल एनजीओ, कानूनी मदद या कभी-कभार के आक्रोश तक सीमित नहीं किया जा सकता. इसके लिए स्थानीय स्तर पर ऐसे संगठन चाहिए जो तुरंत हस्तक्षेप कर सकें, कानूनी टीमों की जरूरत है जो शुरुआत में ही कदम उठाएँ, और जनसंगठनों की जरूरत है जो सांप्रदायिक हिंसा को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानने से इनकार करें. यह काम जाति और धर्म के पार मेहनतकश लोगों की एकता से ही संभव है, जिन्हें लगातार एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है.

सबसे जरूरी बात यह है कि डर को व्यक्तिगत न रहने दिया जाए. कोई दुकानदार अकेले भीड़ से बात करने को मजबूर न हो. कोई व्यक्ति गरिमा और सुरक्षा के बीच अकेले चुनाव करने को मजबूर न हो. फासीवाद तब आगे बढ़ता है जब डर को निजी बना दिया जाता है. वह तब पीछे हटता है जब प्रतिरोध सामूहिक बनता है.

मोहम्मद दीपक को लाल सलाम. इसलिए नहीं कि उनका कदम अपने आप में पर्याप्त है, बल्कि इसलिए कि उसने यह दिखाया कि इनकार कैसा दिखता है. उनका हस्तक्षेप एक मानक तय करता है और एक चुनौती भी देता है. हिंदुत्व फासीवाद के दौर में तटस्थता कोई मध्य मार्ग नहीं है. वह आत्मसमर्पण है. अगर निगरानी संगठित है, तो एकजुटता भी संगठित होनी चाहिए. इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है.


07 February, 2026