वर्ष 34 / अंक-33 / इंडिगो एयरलाइंस संकट की जिम्मेदारी किसकी?

इंडिगो एयरलाइंस संकट की जिम्मेदारी किसकी?

इंडिगो एयरलाइंस संकट की जिम्मेदारी किसकी?

इंडिगो एयरलाइंस की उड़ान रद्द होने की अफरातफरी ने न सिर्फ इस एक विमानन कंपनी, बल्कि भाई-भतीजावादी पूंजीवाद के इस दौर में भारत के उपभोक्ताओं की दयनीय हालत का भी एक एमआरआई स्कैन  किया है. दुनिया भर में एयरलाइन से सफर  करने वाले यात्रियों को कभी-कभार उड़ानों की देरी या उनके रद्द होने जैसी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं, लेकिन ज्यादातर ऐसी वजहों से जो ऑपरेटर के बस में नहीं होतीं : जैसे प्राकृतिक आपदा, खराब मौसम, आतंकी हमले या युद्ध. जबकि इंडिगो का यह संकट पूरी तरह से सोची-समझी चाल थी, जिसमें कंपनी ने यात्रियों को बंधक बनाए रखा जब तक सरकार नियमों में ढील देने पर मजबूर नहीं हो गई. नए एफडीटीएल (फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिट) नियमों में पायलटों के लिए 36 की जगह 48 घंटे की अनिवार्य आराम अवधि तय की गई थी. इस नियम को फरवरी 2024 में ही अधिसूचित कर संबंधित  पक्षों को इसकी सूचना दे दी गई थी. इंडिगो एयरलाइंस निर्धारित समय सीमा के भीतर इस आदेश का पालन करने के करीब भी नहीं थी और सरकार को भी यह हालात बिल्कुल पता था, फिर तो सरकार की इस नाकामी ने इस संकट को और भी आगे बढ़ने और फूटने का मौका दिया जिसका खामियाजा यात्रियों को चुकाना पड़ा.

अत्यधिक देरी से लेकर बिना बताए सैकड़ों उड़ानों को रद्द करने तक, बेबस यात्रियों को कई दिनों तक हर तरह की तकलीफ झेलनी पड़ी. हालात को और भी बदतर बनाने में दूसरी एयरलाइनों में खासकर टाटा समूह की एयर इंडिया और एयरपोर्ट के आसपास के होटलों की बड़ी भूमिका रही, जिन्होंने ‘सर्ज प्राइसिंग’ के नाम पर खुली लूट मचा दी. कई दिनों की इस लूटपाट के बाद जाकर सरकार ने सर्ज प्राइसिंग पर सीमा तय करने का एलान किया. जहां इंडिगो एयरलाइंस सरकारी नियमों का पालन नहीं करने और यात्रियों के प्रति अपनी बिल्कुल गैर-जिम्मेदार और अहंकारी रवैये का अपराधी है, वहीं मोदी सरकार भी अपनी पूरी जिम्मेदारी को छोड़ देने की वजह से इस अपराध में सहभागी है. अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से एफडीटीएल नियम तय करना तभी मायने रखता है जब सरकार उसके पालन के लिए आवश्यक तैयारी भी करे और मजबूत नेतृत्व भी दिखाए. लेकिन इंडिगो की दबंगई के आगे मोदी सरकार ने फिर से घुटने टेक दिए और नियम लागू करने की समयसीमा और आगे बढ़ा दी. इसका मतलब है कि पायलटों की थकान और यात्रियों की सुरक्षा जैसे मुद्दे फिर पीछे छोड़ दिए गए. सवाल यह भी उठता है कि जब सरकार को पता था कि इंडिगो समय पर नियम लागू नहीं कर पाएगी, तो पीक सीजन में इस बड़े संकट को क्यों आने दिया? पहले ही समयसीमा क्यों नहीं बढ़ाई गई? या फिर क्या इस पूरे संकट को इसलिए बढ़ने दिया गया ताकि भारत के विमानन सेक्टर की नए सिरे से ‘पुनर्गठन’ किया जा सके – और कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों को इस सेक्टर में और बड़ा हिस्सा हथियाने का मौका दिया जा सके?

2010 के दशक में भारत की कई सस्ती एयरलाइनों में से एक के तौर पर शुरू हुई इंडिगो एयरलाइंस पिछले दस सालों में बढ़ते-बढ़ते देश की सबसे बड़ी एयरलाइन बन गई है. कोविड महामारी ने पूरे विमानन सेक्टर को हिला दिया था, लेकिन इंडिगो का कारोबार लगातार ऊपर जाता रहा – और इसमें समूह द्वारा चुनावी बॉन्ड की खुलकर की गई खरीद ने शायद बड़ी मदद की. आज इंडिगो की पकड़ इतनी मजबूत है कि इसकी हिस्सेदारी दो-तिहाई से भी ज्यादा हो चुकी है. यह भारत के लगभग 80% रूटों (1,131 में से 900) पर उड़ान भरती है. इन 900 में से 514 रूट ऐसे हैं जहां सिर्फ इंडिगो ही उड़ान चलाती है. एयर इंडिया समूह, जो अब टाटा के हाथ में है, 26% हिस्सेदारी के साथ दूसरे नंबर पर है. यानी इंडिगो और एयर इंडिया मिलकर भारतीय आसमान का 90% से ज्यादा हिस्सा कब्जाए बैठे हैं.

भारत का घरेलू विमानन बाजार अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार बन चुका है – अमेरिका और चीन के बाद. पिछले दस सालों में देश में हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी हो गई है, लेकिन सुरक्षा, यात्रियों की सुविधा और कंपनियों के सही ढंग से चलने जैसे मुद्दे अब गंभीर संकट बनकर सामने आ गए हैं. भारत में हवाई अड्डों का निजीकरण तेजी से बढ़ रहा है और ज्यादातर एयरपोर्ट अडानी समूह को सौंपे जा रहे हैं. दूसरी ओर एयरलाइंस के मैदान में इंडिगो और टाटा का दबदबा है. सरकार की भूमिका अब एक ऑपरेटर की नहीं, बल्कि सिर्फ ‘सहूलियत देने वाले’ या यूं कहें, मुनाफाखोरी पर आंखें मूंदकर बैठे एक मूक दर्शक की बन गई है – जबकि उसे नियम लागू करने और यात्रियों के हित की हिफाजत करने वाला सक्रिय नियामक होना चाहिए था. निजीकरण और कुछ बड़े घरानों के हाथ में नियंत्रण की यह कहानी अब पूरी अर्थव्यवस्था पर हावी है – जैसे दूरसंचार और पेट्रोकेमिकल में अंबानी का दबदबा है, तो ऊर्जा और बुनियादी ढांचा अडानी के हाथ में. सरकार अब भी बैंकिंग और बीमा क्षेत्रों में दिखती है, लेकिन वहां भी ज्यादातर काम बड़े कॉरपोरेट घरानों को विशाल कर्ज देकर, कर्ज माफ करके और उनके शेयर-बॉन्ड खरीदकर उन्हें लगातार सहारा देने का ही है.

मोदी सरकार भले ही ‘आम आदमी’ की बात करती हो और विमानन को बढ़ावा देने की अपनी योजना का नाम भी UDAN (उड़े देश का आम आदमी) रखती हो, लेकिन आज भी हवाई सफर करने वालों में ज्यादातर वही लोग हैं जो समाज के विशेषाधिकार प्राप्त तबकों – अपर-मध्यम वर्ग और अमीर वर्ग – से आते हैं. अगर ऐसे उपभोक्ताओं को भी इतनी आसानी से हल्के में लिया जा सकता है, तो समझना मुश्किल नहीं कि आम भारतीयों के साथ सरकार और कॉरपोरेट सेक्टर कैसा व्यवहार करता होगा. सच्चाई तो यह है कि देश की आधी आबादी को ‘लाभार्थी’ बनाकर ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ के स्तर पर ला दिया गया है, जिन्हें अब चुनावी शुद्धिकरण के नाम पर चल रहे एसआइआर अभियान के जरिए मनमाने ढंग से मताधिकार से भी वंचित किया जा रहा है.

काफी समय से भारत में यह बहस चलती रही है कि निजी क्षेत्र बड़ा ‘कुशल’ है और सार्वजनिक क्षेत्र की हर नाकामी का ठीकरा सरकार पर फोड़ दिया जाना चाहिए. इसी बहस को आगे बढ़ाकर निजीकरण को ‘आधुनिक सुधार’ बताकर जनता पर थोपा गया. लेकिन इंडिगो संकट ने इस पूरी कहानी का सच सामने रख दिया – यह दिखा दिया कि मोदी निजाम ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर कैसे अपनी जिम्मेदारियां छोड़ दीं और कॉरपोरेट की मनमानी, लापरवाही और नाकामी पर आंखें मूंद लीं. नतीजा है यह भारी अव्यवस्था, जिसकी कीमत जनता चुका रही है जबकि मुनाफा कुछ चुनिंदा कंपनियों की जेब में जा रहा है.

संविधान और संसदीय लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई के साथ-साथ अब हमें भारतीय अर्थव्यवस्था को इस भाई-भतीजावादी कॉरपोरेट-परस्त दलदल से निकालने की लड़ाई भी लड़नी होगी. यह समय है भारत के किसानों, मजदूरों और उपभोक्ताओं, यानी सबसे वंचित और बेबस नागरिकों के बीच चट्टानी एकता बनाने का, ताकि सरकारी संरक्षण में चल रही कॉरपोरेट लूट पर जनता के अधिकार और जनकल्याण को प्राथमिकता दी जा सके.

13 December, 2025